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'राज्य को फिर से कानून बनाने का नहीं दे सकते निर्देश', महाराष्ट्र कैसीनो एक्ट से जुड़ी याचिका पर बोला बॉम्बे HC 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को महाराष्ट्र कैसीनो (कंट्रोल एंड टैक्स) अधिनियम, 1976 को पुनर्जीवित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि कानून को कभी लागू नहीं किया गया और 2023 में इसे निरस्त करना विधायिका के अधिकार के अंदर था.

बॉम्बे हाईकोर्ट. (फाइल फोटो) बॉम्बे हाईकोर्ट. (फाइल फोटो)
विद्या
  • मुंबई,
  • 06 मार्च 2025,
  • अपडेटेड 12:34 AM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र कैसीनो (कंट्रोल एंड टैक्स) अधिनियम, 1976 को पुनर्जीवित करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है और कहा कि कानून को कभी लागू नहीं किया गया और 2023 में इसे निरस्त करना विधायिका के अधिकार के अंदर था.

न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति अद्वैत एम. सेठना की पीठ ने द्युतभूमि होटल्स एंड रिसॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अधिनियम को निरस्त करने को चुनौती दी गई थी और इसके लागू होने की मांग की गई थी. जबकि कहा गया था कि कानून कभी लागू नहीं किया गया था और 2023 में इसका निरस्तीकरण विधायिका के अधिकार के अंदर था.

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'कभी लागू नहीं हुआ कैसीनो अधिनियम'

अदालत ने फैसला सुनाया, 'महाराष्ट्र कैसीनो अधिनियम, 1976 के तहत याचिकाकर्ता के किसी भी अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता है, जिससे याचिकाकर्ता को निरसन अधिनियम से पीड़ित कहा जा सके, क्योंकि महाराष्ट्र कैसीनो अधिनियम, 1976 को कभी लागू ही नहीं किया गया था. यह अधिनियम 'नवजात' था.'

आतिथ्य व्यवसाय से जुड़े और कैसीनो खोलने के इच्छुक याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि राज्य सरकार कानून को लागू करने के बारे में फैसला लेने के लिए 2015 के हाईकोर्ट के निर्देश पर कार्रवाई करने में फेल रही. 

हालांकि, पीठ ने कहा, "किसी विशेष कानून को लागू करना और ऐसे कानून को निरस्त करना पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में है. वह एक विशेष कानून बनाए और इस तरह के कानून को निरस्त करें.'

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इस तर्क को खारिज करते हुए कि निरस्तीकरण असंवैधानिक था, अदालत ने कहा, 'विधानसभा के किसी अधिनियम को केवल तीन स्थापित मापदंडों पर ही अल्ट्रा वायरस घोषित किया जा सकता है. विधायी क्षमता, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन, या स्पष्ट मनमानी है. वर्तमान मामले में इनमें से कोई भी आकर्षित नहीं होता है.'

'रिट जारी नहीं की जा सकती'

पीठ ने ये मानते हुए कि याचिका स्पष्ट रूप से गलत है और याचिका को खारिज कर दिया. और कहा, 'अदालत विधानसभा या विधायिका को इसे खत्म करने या फिर से कानून बनाने के लिए रिट जारी नहीं की जा सकती.'

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