
महाराष्ट्र में मंगलवार को ग्राम पंचायत चुनाव (Maharashtra Gram Panchayat Election) का रिजल्ट घोषित हुआ. इस चुनाव में रत्नागिरि की गुहागर तालुका में ग्राम पंचायत सदस्य के लिए मां-बेटी एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतरी थीं. इस चुनाव में मां सुवर्णा ने बेटी को 50 वोटों से हरा दिया है.
दरअसल, महाराष्ट्र में 7,682 ग्राम पंचायतों के लिए 18 दिसंबर को मतदान हुआ था. मंगलवार 20 दिसंबर को चुनाव का रिजल्ट आया. इसी चुनाव में आरे वाकी पिंपलवाट ग्राम पंचायत के वार्ड नंबर दो से 70 वर्षीय मां सुवर्णा भोसले और बेटी प्राजक्ता प्रसाद देवकर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में थीं.
नतीजे सामने आने के बाद सुवर्णा और उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई. वहीं, बेटी प्राजक्ता को मायूसी हाथ लगी. जीत के बाद सुवर्णा ने कहा कि मैनें बेटी को कहा था कि वह इस बार चुनाव में नहीं उतरे, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी.
सुवर्णा बोलीं- कभी नहीं कहा कि बेटी को वोट मत दो
जीत के बाद मां सुवर्णा ने कहा कि बेटी और मैं एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे. जनसंपर्क के दौरान मैंने कभी किसी ने नहीं कहा कि बेटी प्राजक्ता को वोट नहीं दो. मैं मेरे पैनल को वोट करने के लिए कहती थी.
सुवर्णा ने कहा, ''मैं लोगों के लिए दौड़ रही थी और मुझे परिणाम भी मिला. चुनाव में मेरी जीत हुई. मैं हमारे विधायक भास्कर जाधव, उनके बेटे जिला परिषद के पूर्व अध्यक्ष विक्रांत जाधव के हमारे गांव में किए कामों को लोगों के सामने रखी थी."
ठाकरे गुट का व्यक्ति बना सरपंच
गुहागर तालुका में आरे वाकी पिंपलवट ग्राम पंचायत सरपंच समित घाणेकर को चुना गया है. शिवसेना ठाकरे गुट के समित घाणेकर ने भाजपा+शिंदे गुट के प्रत्याशी को मात दी.
विदेश से आकर लड़ा चुनाव, बनीं सरपंच
महाराष्ट्र के सांगली में 21 साल की एक ऐसी लड़की ने सरपंच पद का चुनाव जीता है, जो विदेश में रहकर डॉक्टर की पढ़ाई कर रही थी. छात्रा का नाम यशोधरा शिंदे है, जो जार्जिया में मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी. अब उसका लक्ष्य गांव में महिलाओं की स्थिति को बेहतर और उन्हें शिक्षित बनाना है.
चरवाहा बना सरंपच
महाराष्ट्र के चंद्रपुर में बल्लारपुर तहसील के बामनी गांव में चरवाहा सरपंच चुना गया. 55 साल के प्रल्हाद बुधाजी आलाम आदिवासी समाज से आते हैं. गांव के लोगों ने उन्हें अपना सरपंच चुना है. उसके सामने राष्ट्रीय पार्टियों उम्मीदवार थे. मगर, निर्दलीय चुनाव लड़ने वाला प्रल्हाद बुधाजी को सबसे ज्यादा वोट मिले. उनको चुनाव जिताने के लिए साइकिल से प्रचार किया गया था और चंदा भी जोड़ा गया था.
(इनपुट- राकेश गुडेकर)