
मुंबई की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 'बिजली आपूर्ति बंद करना एक महिला को उसकी बुनियादी सुविधा से वंचित करने के समान है, जिससे उसे संभवतः घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. इसी आधार पर अदालत ने एक अलग रह रहे पति को निर्देश दिया कि वह अपने उस घर की बिजली आपूर्ति बहाल करे, जहां उसकी पत्नी और बेटा रह रहे हैं.
मजिस्ट्रेट डीएम माटा ने कहा कि बिजली जीवन का एक आवश्यक हिस्सा है. इसके बिना सुरक्षित और खुशहाल जीवन संभव नहीं है. चूंकि पति का यह कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी और बेटे की देखभाल करे, इसलिए उसे शेयरिंग घर की बिजली आपूर्ति काटने का अधिकार नहीं है.
यह मामला घरेलू हिंसा (DV) अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था. महिला ने आरोप लगाया कि 1994 में शादी के बाद से ही उसे प्रताड़ित किया जा रहा था, जबकि पति के अवैध संबंध थे. महिला दक्षिण मुंबई में रह रही थी.
महिला के वकील भक्ति देशपांडे, तुषार हलवाई और मिताली कामदार ने अदालत में तर्क दिया कि यह घर पति और उसकी बहनों की पुश्तैनी संपत्ति है. हालांकि, महिला को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित करने और उसे घर से निकालने के इरादे से पति और उसकी बहनों ने बिजली आपूर्ति काट दी थी. महिला 17 सितंबर 2024 से बिना बिजली वाले घर में रह रही है, क्योंकि बिजली विभाग ने आपूर्ति बंद कर दी थी. इसलिए उसने अंतरिम राहत के रूप में बिजली बहाल करने की मांग की.
वहीं, पति ने इस याचिका का विरोध किया और कहा कि महिला कई वर्षों से अलग रह रही थी और मई 2023 में जबरन घर में घुस आई, जो कानूनी रूप से उसकी बहन के नाम पर है. उसने खुद को पीड़ित बताते हुए कहा कि असल में उसे ही अपनी बहन के घर से बाहर कर दिया गया था.
हालांकि अदालत ने ये मानते हुए कि महिला को शेयरिंग घर में रहने का अधिकार है, क्योंकि यह उसका वैवाहिक घर है. ये आदेश दिया कि बिजली की आपूर्ति बहाल की जाए, ताकि उसके रहने के अधिकार को प्रभावी और सार्थक बनाया जा सके.