
'किसी तीर्थ यात्रा को आसान बनाने की आवश्यकता नहीं है, तीर्थयात्रा में तपस्या का एक तत्व अवश्य रहना चाहिए.'
यह लाइन महाराष्ट्र सरकार को लिखे तुषार गांधी के पत्र का हिस्सा है जो विकास की रेस में भागे जा रहे समाज को कुछ पल ठहरकर सोचने को विवश करती है.
असल में, महाराष्ट्र के वर्धा में महात्मा गांधी के ‘सेवाग्राम आश्रम’ को राज्य सरकार ने पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने का फैसला किया है. इसके लिए सेवाग्राम आश्रम तक नौ किलोमीटर तक रास्ते को चौड़ा करने का फैसला लिया गया है. इसकी वजह से सड़क निर्माण के लिए रास्ते में पड़ने वाले पेड़ों को काटा जा रहा है जिसका स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं. इस संबंध में महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने महाराष्ट्र सरकार को एक पत्र भी लिखा है.
पूरे मामले को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटने की जरूरत है. गुजरात के अहमदाबाद में साबरमती आश्रम महात्मा गांधी के कार्यों का हेडक्वार्टर था. लेकिन 1930 में डांडी यात्रा के बाद वह फिर साबरमती आश्रम कई वर्षों तक वापस नहीं लौटे. उनका कहना था कि जब तक देश आजाद नहीं हो जाता, वापस नहीं आऊंगा.
1934 में वर्धा आए गांधी
वर्ष 1934 में उद्योगपति जमनालाल बजाज के आमंत्रण पर महात्मा गांधी महाराष्ट्र के वर्धा में रहने आए. अप्रैल 1936 में बापू ने वर्धा के एक गांव सेगांव को अपना ठिकाना बनाया. एक दशक से ज्यादा का समय यहीं गुज़ारा. इसी जगह का नाम बाद में ‘सेवाग्राम आश्रम’ पड़ा. महात्मा गांधी के नाम के चलते बड़ी संख्या में देश-विदेश से पर्यटक यहां आते हैं.
महाराष्ट्र सरकार ने पर्यटन को ध्यान में रखते हुए वर्धा के मगांवड़ी (बापू कुटी) से सेवाग्राम आश्रम के नौ किलोमीटर के रास्ते को चौड़ा करने का प्लान तैयार किया है. सरकार का कहना है कि गांधीजी की 151वीं जयंती के अवसर पर आगामी 2 अक्तूबर को आने वाले पर्यटकों को आवागमन में सहूलियत होगी.
सड़क चौड़ी करने के लिए बीच में पड़ने वाले पेड़ काटने की जरूरत पड़ी. सरकार के इस फैसले का वर्धा और आश्रम के आसपास के करीब 4,000 स्थानीय लोग विरोध करने लगे. उनका कहना था कि ये पेड़ बापू के लगाए हुए हैं. पर्यटन के लिहाज से भी ये न केवल मगांवड़ी से सेवाग्राम आश्रम आने वाले सैलानियों को छांव मुहैया कराएंगे बल्कि वातावरण में ठंडक बनाए रखते हैं.
सरकार ने शुरू में गांव वालों और आश्रम के निवासियों के विरोध पर कहा कि वो किसी भी तरह से पेड़ काटने के पक्ष में नहीं है. लेकिन कोरोना लॉकडाउन के दौरान सरकार ने करीब 70 बड़े पेड़ों को गिरा दिया. 27 जुलाई को वन विभाग ने आदेश दिया कि सड़क चौड़ी करने के लिए 160 पेड़ और गिराने की योजना है. इससे आहत होकर तुषार गांधी ने यह पत्र महाराष्ट्र सरकार को लिखा था.
तुषार गांधी के पिता और महात्मा गांधी के पोते अरुण गांधी कहते हैं कि ये पेड़ खुद महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी ने लगाए हैं. वो जब सेवाग्राम आश्रम आए थे तो यहां की जमीन बिल्कुल बंजर थी. बापू और बा ने मिलकर अपना जीवन इन पेड़ों को दिया है. इसीलिए इन वृक्षों का पर्यटन के हिसाब से भी अपना महत्व है. इन्हें केवल सड़क को चौड़ा करने के लिए काटना बिल्कुल ही गलत होगा. तुषार और अरुण गांधी के अलावा गांधी परिवार के अन्य सदस्यों ने भी महाराष्ट्र सरकार को इस संबंध में पत्र लिखे हैं.
इस विषय पर पर्यावरण विशेषज्ञ, पत्रकार ,‘जल-थल-मल’ के लेखक और गांधी-वादी चिंतक सोपान जोशी ने अपनी चिंता जाहिर की. वो कहते हैं, अगर गांधी जी को बड़ी सड़क और औद्योगिक विकास जमता तो क्या वो वर्धा में जाकर ग्रामीण इलाके में अपना आश्रम बनाते? यह कोई मुख्य सड़क है भी नहीं.
सोपान जोशी कहते हैं गांधी जी पिछली सदी के सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति हैं. उन्होंने आश्रम बहुत ध्यान से बनाया. ये नियम था कि आसपास नौ किलोमीटर के दायरे में जो सामान मिले, उसी से आश्रम बनेगा. उन्होंने शुरू में 100 रुपया दिया था कि इतने में ही बनेगा. आज हम करोड़ों रुपये खर्च करने को तैयार हैं, उनके विचार से उल्टा जा रहे हैं. इससे बचना चाहिए. गांधी जी किसी भी औद्योगिक विकास के पक्ष में नहीं थे. गांधी जी का कहना था ये हमें और ग़ुलाम बनाएगा.
सोपान जोशी का कहना है कि जो आश्रम स्वराज्य को एक देसी स्वरूप देने के लिए बनाया गया था, उसके आसपास ग़ुलामी का विकास करने का क्या औचित्य? इस तरह का औद्योगिक विकास, कंक्रीट और शीशा लगाना, ये गांधी जी के विचार के साथ नहीं है. ऐसे अगर हम गांधी जी को याद करेंगे, तो फिर हम मान सकते हैं कि हमने उनको पहले ही भुला दिया. वह कहते हैं कि आजकल सामाजिक कार्यकर्ता जो भी करना चाहते हैं उनकी सामाजिक चिन्ताएं सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती के सामने खड़ी ही नहीं हो पातीं.
सोपान जोशी के कहने पर ही हमने आलोक बांग से बात की. आलोक इकॉलजिस्ट हैं. परिस्थिति विज्ञान का अध्ययन करते हैं. IIC बेंगलुरु से पीएचडी हैं. पिछले तीन साल से IISER पुणे में पोस्ट-डॉक्टर साइंटिस्ट हैं. और वो इस पूरे घटनाक्रम के पर्यावरण और परिस्थिति विज्ञान को बहुत अच्छे से जानते हैं.
आलोक बांग कहते हैं, 168 पेड़ कटने के लिए मंजूरी मिल चुकी है जिनमें से 70 पेड़ पहले ही कट चुके हैं. 6 और 7 अगस्त को. 100 और काटे जाने वाले थे. लेकिन हमने ये पूरा आंदोलन खड़ा किया. इस वजह से ऐसा लगता है कि अब वो नहीं काटे जाएंगे. लोकल कलेक्टरेट और पीडब्ल्यूडी डिपार्टमेंट ने अभी इस पर स्टे लाया हुआ है. हम नहीं जानते कब वो फिर से शुरू कर दें. अभी तक तो 100 पेड़ बचे हुए हैं लेकिन ये कभी भी काटे जा सकते हैं.
आलोक बांग का कहना है कि ये सिर्फ़ चुनिंदा ‘गांधीवाधियों’ या ‘लिबरल एलिट्स’ का ऑपरेशन नहीं है. हम लोगों के बीच गए, उनका क्या मूड है, वो क्या सोचते हैं, ये हमने जाना. लगभग 4,000 घरों में हम गए. उन सब लोगों से बात की. चार हजार लोगों का सिग्नेचर कैंपेन हमने लोकल से लेकर स्टेट अथॉरिटी, सबको सबमिट किया है. ये लोग ही इस आंदोलन का चेहरा हैं. ये लोग यही कह रहे हैं, हमारी अनुमति नहीं ली गई, हमें इस रास्ते की कोई भी जरूरत नहीं लगती. शासन कहता है ट्रैफिक 15-20 साल बाद बढ़ेगा. लेकिन जब सड़क इन्हीं लोगों को इस्तेमाल करनी है तो इनकी मर्ज़ी भी होनी चाहिए.
पेड़ क्यों नहीं काटे जाने चाहिए, इस सवाल पर आलोक कहते हैं कि इसके मूलतः दो एंगल हैं- हिस्टोरिकल और कल्चरल. ये गांधी जी के समय के लगाए हुए पेड़ हैं, उस वक्त ‘नई तालीम’ में जो बच्चे पढ़ रहे थे, उसमें से 3-4 बच्चे अभी भी सेवग्राम में हैं. उनसे पता चला है कि ये 1940 के दशक में लगाए गए थे. मतलब इनकी उम्र कम से कम अस्सी वर्ष है. तो ये गांधी के डिसाइपल्स तीन लोग, प्रभाकर जोसेफ़, आर्यनायकम, अन्ना साहेब सहस्त्रबुद्धे इन तीनों ने मिलकर नई तालीम के बच्चों के साथ ये पेड़ लगाए थे.
आलोक बांग आगे कहते हैं, दूसरी बात 80 साल पुराने पेड़ हैं तो निश्चित रूप से इनकी एक पर्यावरणीय मूल्य है. अव्वल तो रास्ता चौड़ा करने की जरूरत नहीं है. क्योंकि वर्धा के इर्द-गिर्द बहुत सारे नेशनल और स्टेट हाइवेज हैं. लिहाजा इसकी जरूरत नहीं है. दूसरी बात, इट गोज़ विद हार्ट ऑफ़ दी सिटी. जितने रेज़िडेंशियल एरियाज़ हैं, और स्कूल्स-कॉलेजेज़ हैं, तो जरूरत नहीं हैं.
वैकल्पिक रास्ता सुझाते हुए आलोक कहते हैं कि सड़क चौड़ा करने का विकल्प भी है. इनमें पेड़ों को बचाया जा सकता था. 200 पेड़ कट रहे हैं. इसकी बिल्कुल भी जरूरत नहीं है. हमारी टीम में सिविल इंजीनियर्स हैं. जिन्होंने कुछ विकल्प भी सुझाए हैं, जिनके चलते ये पेड़ बच सकते हैं. जाहिर है, सड़क सबकी जरूरत है. लेकिन विकास, पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए. ऐसी बहुत सी मॉडर्न टेक्नोलॉजी है, जो रोड भी बना सकती है, और इर्द गिर्द के पेड़ों को भी बचा सकती है. विदेशों में ट्रांसप्लांट करने की भी तकनीक आई है. दिक्कत सिर्फ़ काटे जा रहे पेड़ों तक ही सीमित नहीं.
आलोक बांग कहते हैं कि सड़क चौड़ा करने का काम चल रहा है. इस वजह से टेक्निक्ली तो काफ़ी सारे पेड़ खड़े तो रहेंगे, पर उनके इतने करीब ये सब कन्स्ट्रक्शन होगा कि आने वाले महीनों या सालों में अंततः वो भी मर जाएंगे. हम तब नहीं जान पाएंगे कि ऐसा क्यों हुआ. क्योंकि अगर किसी भी पेड़ का ‘क्रिटिकल रूट जोन’ हम बहुत डिस्टर्ब कर देते हैं तो उनकी हानि होना निश्चित है. इस वजह से ये जो 200 पेड़ कह रहे हैं, ये 200 नहीं, कई सौ की तादात में होंगे. एक एक्सपर्ट, एक ईकोलॉजिस्ट के तौर पर मैं निश्चित रूप से ऐसा कह सकता हूं.
सरकार की इस बात पर कि ‘हर काटे गए पेड़ की एवज में कई और पेड़ लगाए जाएंगे.’ आलोक बांग कहते हैं कि एक गैर-जानकर भी जानता है कि 50 साल पुराने पेड़ की भरपाई 5-10 साल पुराने पेड़ नहीं कर पाएंगे.
वर्धा और विदर्भ जिस भौगोलिक एरिया में हैं, ये सॉल्ट रीज़न है. ये बहुत बुरे मौसमों का साक्षी रहा है. गर्मियां बहुत गर्म और जाड़े बहुत ठंडे. ऐसे माहौल में भी जो पेड़ बचे हुए हैं, वो इन सभी दिक़्क़तों से गुज़र चुके हैं. ये एक तरह से ‘फिटेस्ट ऑफ़ दी लॉट हैं. मतलब सबमें से सबसे योग्य, सबसे मज़बूत हैं. ऐसे पेड़ों को काट कर 5 साल पुराने पेड़ लगाएंगे, उनमें से सारे मरने ही हैं.
आलोक बांग कहते हैं कि ये बहुत जल्दबाजी और बिना भविष्य की सोचे लिया गया निर्णय है. शासन इसे समाधान बता रहा है. नई डेवलपमेंट के बारे में आलोक ने बताया कि महाराष्ट्र के PWD मिनिस्टर ने पिछले कुछ हफ़्तों की, ख़ासकर पिछले हफ़्ते की गतिविधियों के चलते (जैसे गांधी परिवार के सदस्यों के पत्र लिखने के चलते) स्टेटमेंट दिया. उन्होंने कहा है कि इस पूरे प्रोजेक्ट का रीएसेसमेंट किया जाएगा.
आलोक कहते है कि इसमें अभी जितने पेड़ काटने का प्रस्ताव है, वो भी न कटें, ऐसा वो री-सर्वे करेंगे. लेकिन ये सिर्फ़ बयान है और अभी ऑफ़िशियल कॉपी देखना बाकी है. मुझे नहीं पता रीएसेसमेंट का क्या मतलब होगा, लेकिन जो कहा जा रहा है कि शुरुआत से ही पेड़ नहीं कटने वाले थे, ये बात पूर्णतः ग़लत है.
आलोक ने इन पेड़ों के काटे जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया. उन्होंने बताया कि कोई भी पेड़ काटने की एक ऑफिशियल प्रक्रिया होती है, जमीन, जिस भी ग्राम पंचायत या शहर की हद में होती है उससे नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी एनओसी लेना जरूरी है. ये रास्ता चार ग्राम पंचायतों से होकर जाता है, तीन ग्राम पंचायतों से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट लिया ही नहीं गया था. एक और ग्राम पंचायत के सिर्फ सरपंच से एनओसी लिया गया था. वहां भी बाकी सदस्य इसमें सहभागी नहीं थे. तो उस ग्राम पंचायत का प्रमाण पत्र अमान्य हो जाता है. यह पूरी प्रक्रिया खामी से भरी हुई है.
अंत में आलोक बांग गांधी के एक वाक्य का जिक्र करते हैं. गांधी जी कहते थे, ‘रोड बनाने की जरूरत नहीं है. जब कोई भी यात्री सेवाग्राम आए, तो उनके लिए वर्धा से सेवाग्राम का ये रास्ता चलना ज़रूरी है. ये एक तरह की पिनेंस (तपस्या) है.’