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ABG banking fraud: 15 साल पहले गुजरात में CAG रिपोर्ट से लेकर 28 बैंकों से चीटिंग तक... देश के सबसे बड़े बैंकिंग फ्रॉड में अबतक क्या-क्या हुए खुलासे

ABG Shipyard Bank Fraud Case: 1985 में शुरू हुई एबीजी शिपयार्ड पर देश के 28 बैंकों से 22,842 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप है. इस मामले में SBI ने पहली बार नवंबर 2019 में CBI में शिकायत दर्ज कराई थी. CBI ने 7 फरवरी 2022 को केस दर्ज किया है.

एबीजी शिपयार्ड पर लोन की रकम का गलत इस्तेमाल करने का आरोप है. (फाइल फोटो-Pixabay) एबीजी शिपयार्ड पर लोन की रकम का गलत इस्तेमाल करने का आरोप है. (फाइल फोटो-Pixabay)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 15 फरवरी 2022,
  • अपडेटेड 12:01 PM IST
  • 28 बैंकों से 22,842 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी
  • एबीजी शिपयार्ड कंपनी पर घोटाले का आरोप

ABG Shipyard Bank Fraud Case: देश के 28 बैंकों से 22 हजार 842 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का मामला सामने आया है. इसे देश का सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला कहा जा रहा है. इस मामले में CBI ने 7 फरवरी को FIR दर्ज की है, जिसमें एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड के चेयरमैन ऋषि कमलेश अग्रवाल (Rishi Kamlesh Agarwal), एमडी संथान मुथुस्वामी के अलावा कंपनी के तीन डायरेक्टर को आरोपी बनाया है. ये FIR देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक SBI की शिकायत पर दर्ज की गई है. 

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बैंकिंग इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला सामने आने के बाद सियासत भी शुरू हो गई है. कांग्रेस ने जहां देरी से FIR दर्ज होने पर सरकार को घेरा है तो वहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) का कहना है कि बैंकों ने कम समय में इस घोटाले को पकड़ा है. 

सभी आरोपियों के खिलाफ CBI ने आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के केस दर्ज किए हैं. 1985 में शुरू हुई एबाीजी शिपयार्ड जहाज बनाने और मरम्मत का काम करती है.

15 साल पहले CAG रिपोर्ट में हुआ था अहम खुलासा

- 15 साल पहले यानी 2007 में कम्प्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की एक रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि एबीजी शिपयार्ड को अक्टूबर 2007 में 1.21 लाख स्क्वायर मीटर की जमीन आधे दाम में दी गई थी.

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- रिपोर्ट में कहा गया था कि इस जमीन की कीमत 1400 रुपये प्रति स्क्वायर मीटर थी, लेकिन एबीजी शिपयार्ड को ये 700 रुपये प्रति स्क्वायर मीटर की दर से दी गई. इससे राज्य सरकार को 8.46 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. 

- जिस वक्त ये जमीन देने का मामला सामने आया था, उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी के सीएम रहते जमीन सस्ते दाम पर दी गई. एबीजी शिपयार्ड के चेयरमैन ऋषि अग्रवाल सूरत के रहने वाले हैं और उन्हें नरेंद्र मोदी का करीबी भी माना जाता है.

ये भी पढ़ें-- ABG shipyard Explainer: देश के सबसे बड़े बैंकिंग फ्रॉड की जानिए पूरी कहानी, 28 बैंक कैसे हो गए शिकार?

ऐसे सामने आया धोखाधड़ी का मामला

- कोई भी कर्ज फ्रॉड कब होगा, इसका फैसला बैंकों की फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है. जनवरी 2019 में 28 बैंकों के कंसोर्टियम ने फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट पर चर्चा की.

- इस बैठक में सामने आया कि एबीजी शिपयार्ड ने अप्रैल 2012 से जुलाई 2017 के बीच अलग-अलग 28 बैंकों से कारोबार के नाम पर 22,842 करोड़ रुपये का कर्ज लिया. 

- एबीजी शिपयार्ड ने जिन बैंकों से धोखाधड़ी की है, उसमें 6 बैंकों के ही 17,734 करोड़ रुपये बकाया हैं. इसमें 7 हजार 89 करोड़ रुपये ICICI बैंक, 3 हजार 634 करोड़ IDBI, 2 हजार 925 करोड़ SBI, 1 हजार 614 करोड़ बैंक ऑफ बड़ौदा, 1 हजार 244 करोड़ PNB और 1 हजार 228 करोड़ इंडियन ओवरसीज के बकाया हैं.  

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- खराब परफॉर्मेंस के कारण एबीजी शिपयार्ड के बैंक खातों को नवंबर 2013 में पहली बार NPA यानी नॉन परफॉर्मिंग असेट्स घोषित कर दिया गया था. लेकिन उसके बाद फिर इसे हटाया गया और 30 जुलाई 2017 को फिर से NPA घोषित किया गया. किसी बैंक खाते को NPA तब घोषित किया जाता है जब बैंक को कर्ज की किश्त या ब्याज 90 दिनों तक नहीं मिलती है.

नवंबर 2019 में शिकायत, फरवरी 2022 में FIR

- 28 बैंकों के इस कंसोर्टियम को ICICI बैंक लीड कर रहा था, लेकिन शिकायत SBI ने दर्ज कराई. SBI ने 8 नवंबर 2019 को पहली बार CBI को इस धोखाधड़ी की शिकायत की. 

- 12 मार्च 2020 को CBI ने कुछ मसलों पर सफाई मांगी. इसके बाद 25 अगस्त 2020 को SBI ने दोबारा से शिकायत दर्ज कराई.

- करीब डेढ़ साल तक CBI ने जांच की और 7 फरवरी 2022 को इस धोखाधड़ी के मामले में FIR दर्ज की. 

कांग्रेस का सवाल- पीएम चुप क्यों हैं?

बैंक घोटाले को लेकर कांग्रेस मोदी सरकार पर हमलावर हो गई है. सोमवार को कांग्रेस प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि पीएम मोदी को बताना चाहिए कि ये धोखाधड़ी कैसे हुई और वो इस पर चुप क्यों हैं? गौरव वल्लभ ने कहा कि धोखाधड़ी के बारे में सरकार को 5 साल पहले जानकारी मिल गई थी, लेकिन सरकार ने 5 साल तक कोई कार्रवाई नहीं की. 

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