
भारतीय नौसेना के रिटायर्ड कमांडर अभिलाष टॉमी ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ में शिरकत की और बताया कि कैसे समुद्र की लहरों में उन्होंने मुश्किल हालात का सामना किया. 'एक खतरनाक रोमांस: गहरे समुद्र के साथ मेरी मुलाकात' विषय पर आयोजित सत्र में शिरकत करते हुए कमांडर अभिलाष ने एक हादसे का जिक्र किया और बताया, 'मैं दुर्घटना के बाद लहरों में वापस जाना चाहता था. मैं एक एल्यूमीनियम पोल पर गिर गया और मेरी रीढ़ की हड्डी टूट गई. ..'
रिटायर कमांडर अभिलाष टॉमी ने कहा, "मेरी पत्नी का नाम उर्मिमाला है जिसका अर्थ है समुद्र की लहरों की एक श्रृंखला, तो समझ सकते हैं वह कैसे एक नाविक को समुद्र में जाने से कैसे रोक सकती है. प्रशिक्षण बेहद कठिन था.' खुद के साथ हुई दुर्घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 'जब मैं चल पाने की हालत में नहीं था और मेरा इलाज चल रहा था. मेरी मां और मेरे परिवार ने साथ दिया था. मेरी मां चाहती थी कि मैं रेस में वापस जाऊं.'
अपने सपने के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया, 'मैंने एक विदेशी फिल्म देखी... समुद्र पर विजय पाना मेरी कोशिश नहीं है. मेरी कोशिश है मैं खुद पर विजय प्राप्त करूं. मैं खुद को समझने की कोशिश कर रहा हूं. मैं एक टीम तैयार करने की कोशिश कर रहा हूं, जो पूरे विश्व का चक्कर लगाएगी.जिसमें कुछ भारतीय तो कुछ विदेशी होंगे.. फिलहाल ये मेरा सपना है.' अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए कमांडर अभिलाष ने बताया कि रेस के लिए दो साल का समय लगा.. नॉर्थ से साउथ अटलांटिक की यात्रा के दौरान मेरी नाव क्षतिग्रस्त हो गई थी. लेकिन मैं काफी समय तक समुद्र में फंसा रहा.'
हाल ही में रिटायर्ड कमांडर अभिलाष टॉमी ने गोल्डन ग्लोब रेस 2022 को सफलतापूर्वक पूरा किया था. गोल्डन ग्लोब रेस और समुद्र के जरिए विश्व का भ्रमण का जिक्र करते हुए अभिलाष ने बताया, 'बिना रुके परिभ्रमण सबसे कठिन साहसिक गतिविधि माना जाता है जिसे आप कर सकते हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो आपके पास एवरेस्ट पर चढ़ने वाले 10,000 लोग हैं, अंतरिक्ष में जाने वाले 600 लोग हैं, लेकिन समुद्र की परिक्रमा करने वालों की संख्या 200 से भी कम है. यह तब और मुश्किल हो जाती है जब आप एक छोटी नाव में, बिना जीपीएस के, बिना इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के, बिना सैटेलाइट इंटरनेट के, बिना कंप्यूटर कैलकुलेटर के, बिना संचार के रहते हैं. इसे और भी कठिन बनाने के लिए आप इसे रेस कहते हैं. यही गोल्डन ग्लोब रेस है.'
गोल्डन रेस का जिक्र करते हुए अभिलाष ने बताया, '30 हजार नॉटिकल मील के रेस में बिना किसी से संपर्क किए, बिना किसी की मदद और 1968 की टेक्नोलॉजी का प्रयोग करते हुए गोल्डन ग्लोब रेस को पूरा करना अपने आप बहुत चुनौतीपूर्ण है.अगर आप इस रेस में थोड़ा सा भी रूके तो आप डिसक्वालिफाई हो सकते हैं.'
सितंबर 2018 में, कमांडर अभिलाष टॉमी की नाव तूफान की चपेट में आने के बाद दक्षिणी हिंद महासागर के बीच में फंस गई थी और वो बहुत गंभीर रूप से घायल हुए थे.अब पांच साल बाद भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी ने वही दौड़ पूरी की.
अपनी यात्रा के बारे में बात करते हुए, कमांडर अभिलाष टॉमी ने कहा, 'मैंने जीजीआर 2018 में भाग लिया था. 1968 में आयोजित हुई इस रेस में 9 लोगों में से केवल 1 ही इसे पूरा कर पाया था. अगले 50 वर्षों के लिए, दौड़ आयोजित नहीं की गई थी. 2018 में, मैं कोशिश करना चाहता था और मुझे एक विशेष निमंत्रण मिला. इसलिए मैंने भारत में एक नाव का निर्माण किया, इसे एक रेस के लिए लिया और तीन महीने के बाद मैं तीसरे स्थान पर था तभी मैं एक बहुत ही भयानक तूफान की चपेट में आ गया. मैं 5-9 मीटर उछलकर मैं एल्युमीनियम के खंभे पर गिरा, मेरी रीढ़ की हड्डी टूट गई और मेरे लिए रेस खत्म हो गई.'
उन्होंने बताया, 'जब मुझे एहसास हुआ कि मेरे लिए रेस खत्म हो गई है और मुझे बचाने के लिए किसी को आने में 3-4 दिन लगेंगे. इसके बाद मेंने यह पता लगाना शुरू कर दिया कि आगे क्या करना है और सबसे स्वाभाविक बात थी दौड़ में फिर से प्रयास करना. मैंने यह पता लगाना शुरू कर दिया कि किस तरह की टीम होनी चाहिए, कौन सी नाव खरीदनी है, प्रायोजकों से कैसे संपर्क करना है. मैंने तब अपनी दौड़ की योजना बनाना शुरू किया.'
आपको बता दें कि अभिलाष के लिए 21 सितंबर, 2018 की तारीख दिल तोड़ देने वाली थी. वो दक्षिणी हिंद महासागर में कहीं फंसे हुए थे. तभी एक जोरदार तूफान आया. हिम्मत नहीं हारी, वो अकेले थे, बावजूद इसके तूफान से भिड़ गए. वो जहाज के पाल पर अपनी कलाई वाली घड़ी के सहारे लटके रहे. उन्होंने स्थिति को कंट्रोल करने की कोशिश की लेकिन तभी दूसरी बार तूफान ने हमला कर दिया. तब अभिलाष अकेले ही तूफान से भिड़ रहे थे. जैसे तैसे नाव सीधी हुई, तब तक वो 9 मीटर ऊपर हवा में टंगे हुए थे. कुछ देर बार धड़ाम से नीचे गिर गए. आधा घंटा बीत चुका था. उन्होंने उठने की कोशिश की, मगर पैरों ने साथ छोड़ दिया.
उन्होंने काफी कोशिश की ठीक होने की मगर कोई फायदा नहीं हो रहा था. तब उन्होंने अपने पास मौजूद एक डिवाइस से मैसेज कर मदद मांगी. मैसेज था- ROLLED. DISMASTED. SEVERE BACK INJURY. CANNOT GET UP. इसके बाद इंटरनेशनल रेस्क्यू मिशन शुरू हुआ. भारत, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के नौसैनिक जहाज अभिलाष की तलाश में जुट गए. दो दिन और दो रातों के बाद उन्हें ढूंढ निकाला गया. फिर वो विशाखापट्टनम लाए गए. इतनी गंभीर हालत के चलते कहा गया कि शायद वो नहीं बच पाएंगे. लेकिन अभिलाष ठहरे जिद्दी, वो कहां मानने वाले उनकी जिद के आगे मौत को उलटे पांव कर वापस लौटना पड़ा. तब उन्हें ठीक करने के लिए शरीर में ऑपरेशन कर टाइटेनियम की हड्डियां लगाई गईं.