
अंग्रेजों के जमाने के बनाए गए और ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की पहचान बने भारतीय दंड संहिता-1860, की जगह पर केंद्र सरकार भारतीय न्याय संहिता अधिनियम लेकर आई है. इसके प्रस्तावों पर संसदीय समिति विधेयक की समीक्षा कर रही है. यह संभावना है कि समिति, दुष्कर्म को अपराध मानने वाले एक लिंग-तटस्थ प्रावधान को शामिल करने का सुझाव देगी. संसदीय समिति औपनिवैशिक काल की दण्ड संहिता को बदलने के लिए एक विधेयक की समीक्षा कर रही है.
अडल्ट्री को दंडित किए जाने के प्रावधान की सलाह
विशेषज्ञों के के अनुसार, समिति सलाह दे सकती है कि, प्रावधान ऐसा हो, जिसमें अडल्ट्री को दण्डित किया जाए और ऐसा प्रावधान भी हो, जो पुरुषों, महिलाओं, या ट्रांसपर्सन्स के बीच असहमति से बने यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखता हो. समिति आजीवन कारावास जैसे शब्दों के लिए बेहतर परिभाषाएं सुझा सकती है. इस तैयार रिपोर्ट को केंद्रीय गृह मंत्रालय के सामने रखा जाएगा. हालांकि इन प्रस्तावों को मानने के लिए गृह मंत्रालय बाध्य नहीं है. बता दें कि यह विधेयक भारत के आपराधिक न्याय तंत्र को सुधारने का प्रयास कर रहा है.
497 जैसे क्राइम के लिए जेंडर न्यूट्रल प्रावधान बनाने की सलाह
इसी पैनल ने आईपीसी की धारा 497 पर भी विचार किया, जो कि एडल्ट्री को क्राइम मानता है. पैनल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे असंवैधानिक और पुरातनपंथी बताते हुए रद्द कर दिया था. पैनल के विचार में आईपीसी की धारा 497 के तहत विवाहेतर संबंधों को अपराध घोषित किया गया था लेकिन यह प्रावधान अपने-आप में महिला विरोधी था. दरअसल, इसके तहत किसी पुरुष को किसी दूसरे व्यक्ति की पत्नी से पति की इजाजत के बिना संबंध बनाने की इजाजत नहीं है, हालांकि, पति की इजाजत से संबंध बनाए जाने पर यह अपराध नहीं रहेगा. ऐसे मामलों में केवल पुरुष को अपराधी माना गया है, महिला को नहीं. इसलिए, समिति के अनुसार, प्रावधान को जेंडर न्यूट्रल बनाए जाने की सिफारिश करेगी. समिति यह भी मान रही है कि भारत में विवाह संस्कृति महत्वपूर्ण है और इसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए.
धारा-377 पर भी हुई चर्चा
पैनल में इसके साथ ही धारा 377 को लेकर भी चर्चा हुई और इस पर भी संसदीय समिति अपना विचार रखेगी. धारा 377 भी ब्रिटिश काल का प्रावधान है, जिसने समलैंगिकता को अपराध घोषित करार दिया था. समिति ने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले के बाद भी, कानून के प्रावधान गैर-सहमति वाले यौन संबंध के मामलों में लागू रहेंगे, लेकिन भारतीय न्याय संहिता द्वारा धारा 377 के किसी भी संदर्भ को हटाने के बाद, "पुरुषों, महिलाओं, ट्रांसजेडर्स और पाशविक कृत्यों या इनसे जुड़े यौन अपराधों के लिए कोई प्रावधान नहीं था. इसलिए, पैनल सरकार को आईपीसी की धारा 377 को शामिल करने के लिए कह सकता है.
बीएनएस तीन विधेयकों का हिस्सा था - भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा विधेयक, 2023 अन्य दो - लोकसभा में मानसून सत्र के अंतिम दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा पेश किए गए. साथ में, वे क्रमशः ब्रिटिश-युग के आईपीसी, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), और भारतीय एविडेंस एक्ट को बदलकर एक बड़ा बदलाव लाना चाहते हैं. इसके बारे में सरकार का कहना है कि यह भारत के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को बदल देगा.
मृत्युदंड पर भी की चर्चा
पैनल ने मृ़त्युदंड पर भी चर्चा की है. बीएनएस के तहत, 15 अपराधों में मृत्युदंड हो सकता है, आईपीसी के तहत 11 से ऊपर - पैनल की सिफारिशें इस मुद्दे को सरकार पर निर्णय लेने के लिए छोड़ देंगी, छोटे अपराधों के लिए सजा के तौर पर कम्यूनिटी सर्विस को शुरू किया जाना भारतीय न्याय संहिता की ओर से किया जाने वाला बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. अदालतें अक्सर सामुदायिक सेवा का आदेश देने के लिए अपने विवेक का प्रयोग करती हैं, लेकिन आईपीसी में यह निर्धारित नहीं किया गया है. लेकिन, विचार-विमर्श के बाद पैनल यह सुझाव दे सकता है कि कम्यूनिटि की अवधि और प्रकृति को परिभाषित किया जाना चाहिए.
साउथ से आई हिंदी पर पाबंदी
पैनल ने प्रस्तावित कोड के नाम पर भी आपत्ति जताई - बीएनएस के पेश होने के बाद, कुछ राजनेताओं, विशेष रूप से दक्षिण के नेताओं ने हिंदी नामकरण पर आपत्ति जताई थी. समिति यह सुझाव दे सकती है कि चूंकि विधेयक का पाठ अंग्रेजी में है, इसलिए इसने संविधान के अनुच्छेद 348 का उल्लंघन नहीं किया है. समिति नए ड्राफ्ट कोड के बारे में कई सकारात्मक बातों पर भी प्रकाश डालेगी. इसमें आईपीसी की धारा 124ए या देशद्रोह को हटाना भी शामिल है. BNS की धारा 150 के तहत राजद्रोह के लिए आजीवन कारावास या 3 साल की सजा को बढ़ाकर आजीवन कारावास या 7 साल की सजा की गई है. इतना ही नहीं जिन धाराओं में 7 साल से ज्यादा की सजा है, वहां पर फॉरेंसिक टीम को सबूत जुटाने होंगे. पैनल की अगली बैठक 27 अक्टूबर को होगी.