
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के हंगा गांव में रहने वाली बुजुर्ग महिला हीरा बाई साठे की कहानी सुनकर बिहार के दशरथ मांझी जेहन में आ जाते हैं. वहीं ‘माउंटन मैन’दशरथ मांझी जिन्होंने हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले दम पर पहाड़ को काट कर सड़क बना डाली थी. उन्हीं की तर्ज पर हीरा बाई और कई ने पत्थर पर फूल उगाने जैसा काम किया है. जी हां, इन्होंने पूरी तरह बंजर जमीन पर जी-तोड़ मेहनत कर उसे फूलों की खेती के लायक बना डाला. फूलों से होने वाली कमाई ने हीरा बाई के साथ उनके परिवार का भी मुकद्दर बदल डाला.
65 साल की हीरा बाई का गांव हंगा प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के गांव रालेगांव सिद्धि से महज 35 किलोमीटर की दूरी पर है. उनके परिवार में पति गंगाधर साठे और तीन बेटे हैं. 76 साल के गंगाधर महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम में ड्राइवर रह चुके हैं.
कुछ साल पहले हीरा बाई ने गांव से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित परिवार की 7 एकड़ की जमीन पर कुछ करने का फैसला किया. लेकिन ये जमीन पूरी तरह बंजर थी, ऐसे में वहां कुछ उगाया भी जाए तो कैसे? हीरा बाई ने उसी जमीन को उपजाऊ बनाने का फैसला किया. हीरा बाई ने उस जमीन पर काम करना शुरू किया तो जो भी देखता, वो मखौल उड़ाता. दिमाग ठनक जैसी बातें करता.
लेकिन हीरा बाई ने इसकी परवाह नहीं की और अपने मिशन में जुटी रहीं. वो सादी मिट्टी, गोबर और नदी की गीली मिट्टी के टोकरे सिर पर लाद-लाद कर बंजर जमीन पर ढालती रहीं. हीरा बाई बिना थके लंबे समय तक यही काम करती रहीं. कितने टोकरे उन्होंने सिर पर उठाए, इसकी गिनती भी नहीं की जा सकती.
हीरा बाई के तीन बेटे हैं- नितिन, जतिन और सचिन. जतिन नासिक में फर्म में नौकरी करता है. हीरा बाई के बाकी दोनों बेटों ने मां के मिशन में पूरा साथ दिया. साठे परिवार की मेहनत आखिर रंग लाई. एक वक्त ऐसा भी आया कि जमीन सपाट और बीज डालने लायक बन गई. हीरा बाई ने बंजर जमीन को खेती लायक बनाने के साथ यह भी ध्यान रखा कि बारिश के वक्त पास वाली पहाड़ी से तेज बहाव के साथ आने पानी के लिए रास्ता खेत से दूर रहे.
हीरा बाई की सोच थी कि अगर ज्यादा बारिश होती है तो पहाड़ी से आने वाला पानी खेत की उपजाऊ जमीन को नुकसान न पहुंचा सके.
हीरा बाई ने सात एकड़ खेत में सिर्फ डेढ़ एकड़ जमींन पर फूल के बीज बोये गए. बाकी जमीन पर प्याज, और हरी सब्जियां उगाई गई. 2019 में शेवंती फूलों की खेती की गई. ये फूल सुगंध वाले होते हैं और पूजा-अर्चना में काम आते हैं. शुरू में ज्यादा कुछ हाथ नहीं आया. नौ महीने की फसल पर 40 हजार रुपये का मुनाफा ही हुआ.
इस साल हीरा बाई के बड़े बेटे नितिन ने एस्टर फूलों को उगाने की सलाह दी. इन फूलों की डेकोरेशन में खासी मांगी रहती है. अपने बड़े बेटे की पढ़ाई और अनुभव पर भरोसा कर हीरा बाई ने डेढ़ एकड़ खेत में सिर्फ गुलाबी एस्टर के फूल के बीज बोए. दूसरे बेटे जतिन जिसने बागवानी में बीएससी की है तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई.
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महाराष्ट्र के पश्चिमी जिलों में इस साल बहुत बारिश हुई. इसमें अहमदनगर जिला भी शामिल है. यहां पारंपरिक फसलों को बहुत नुकसान पहुंचा. हंगा गांव के किसानों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. उनकी फसले में काफी हद तक बर्बाद हो गईं. मोगरा, शेवंती और झंडू के फूल खराब हो गए. लेकिन हीरा बाई के खेत में लहराते गुलाबी एस्टर फूल जस के तस रहे. और अब जब बारिश थम चुकी है और त्योहारी सीजन शुरू हो चुका है तो हीरा बाई परिवार ने लगभग चार लाख रुपये के फूल एक महीने में ही बेच दिए. हिरा बाई के बड़े बेटे नितिन गांव में कृषि केंद्र भी चलाते हैं.
हीरा बाई का जो लोग किसी वक्त मखौल उड़ाया करते थे अब वही उनकी सूझबूझ और मेहनत की तारीफ करते नहीं थकते. कुछ लोग तो हीरा बाई के लिए ये भी कहते हैं उन्होंने जो किया उससे छत्रपति शिवाजी महाराज के राज के समय की हिम्मती महिला हीरकणी की याद आ जाती है.
कहा जाता है कि हीरकणी रायगढ़ किले के दरवाजे बंद होने पर फिसलन वाली चट्टान से रात के अंधेरे में नीचे उतर गई थीं. उन्हें अपने नवजात बच्चे तक पहुंचने की जल्दी थी, जिससे वो भूखा न रहे. अब हीरा बाई ने परिवार के लिए बंजर जमीन को उपजाऊ बना कर दिखा दिया. अब हीरा बाई के खेतों के साथ उनके परिवार में भी खुशियों के फूल खिले दिखाई देते हैं. (अहमदनगर से रोहित वाल्के के इनपुट्स के साथ)