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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा देने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई

सात जजों की संविधान पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं के वकील राजीव धवन ने दलील दी कि शुरुआत से ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का चरित्र अल्पसंख्यक यानी खास कर मुस्लिम प्रधान रहा है. उसके स्थापत्य से लेकर शिक्षा के पाठ्यक्रम और प्रशासन और कुलपति के साथ साथ फैकल्टी में भी मुस्लिमों का ही योगदान या बाहुल्य रहा है.

फाइल फोटो फाइल फोटो
संजय शर्मा
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  • 09 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 6:15 PM IST

सात जजों की संविधान पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं के वकील राजीव धवन ने दलील दी कि शुरुआत से ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का चरित्र अल्पसंख्यक यानी खास कर मुस्लिम प्रधान रहा है. उसके स्थापत्य से लेकर शिक्षा के पाठ्यक्रम और प्रशासन और कुलपति के साथ साथ फैकल्टी में भी मुस्लिमों का ही योगदान या बाहुल्य रहा है. यहां आधुनिक के साथ पारंपरिक इस्लामी शिक्षा भी दी जाती है.

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ये शुरुआत से ही मुस्लिम और इस्लामिक प्रभुत्व वाला संस्थान रहा है. जब संविधान अस्तित्व में आया तो भी इस पर किसी को आपत्ति नहीं थी. चीफ जस्टिस की अगुआई में सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की संविधान पीठ में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेबी पारदी वाला, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा हैं. पीठ इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही है कि क्या केंद्र सरकार से मिल रही आर्थिक मदद से चलने वाला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (ए प्राथमिक) अल्पसंख्यक दर्जे का दावा कर सकता है?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस संदर्भ में मेरी प्रारंभिक जिज्ञासाएं हैं. सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने अपने अलग अंदाज में बहस शुरू करते हुए कहा कि मुझे अपनी दलीलें रखने दें. हम आपके सभी सवालों का उत्तर देंगे. इस मामले पर बहस करने के लिए मुझे समुचित समय की आवश्यकता होगी. सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि हम आपकी बात तन्मयता से सुनेंगे. आप समय सीमा की चिंता न करें.

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धवन ने कहा कि किसी को भी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के दर्जे पर सन 2005 तक कोई आपत्ति नहीं थी. यहां तक कि अज़ीज़ पाशा मामले में भी उन्होंने इस क़ानून का खंडन किया था. लेकिन अब शासन में बदलाव आने से उसके रुख में भी बदलाव आ गया है. इसलिए इस पर गौर करने की जरूरत है.

सीजेआई ने कहा कि आपके मुताबिक यह संस्थान एक प्राचीन चरित्र रखता है उदाहरण के लिए ये एक इंजीनियरिंग कॉलेज भी हो सकता है. मैं बताता हूं कि अज़ीज़ बाशा के मुद्दे पर हम अपनी पसंद कैसे बनाते हैं. पहला - बाशा का कहना है कि विश्वविद्यालय में अल्पसंख्यक हो सकते हैं, दूसरा - बाशा का कहना है कि इस संस्थान के निर्माण में एक की भूमिका और पृष्ठभूमि को पहचाना जाता है और कहा जाता है कि यह स्पष्ट रूप से मुस्लिम है और तीसरा यह कि यह अधिनियम के पूरी तरह अनुकूल है.

इसका उद्देश्य सभी स्तरों पर रेक्टर और चांसलर के पास सलाहकारी शक्ति है कि वह अल्पसंख्यक प्रवेश में हस्तक्षेप नहीं करेगा. 2005 में, एएमयू ने अल्पसंख्यक संस्थान होने का दावा करके मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 50% सीटें आरक्षित कीं. इसे डॉ. नरेश अग्रवाल बनाम भारत संघ मुकदमे के जरिए 2005 में चुनौती दी गई थी. 

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याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क देने के लिए एस. अज़ीज़ बाशा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया कि एएमयू एक अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है. संघ और विश्वविद्यालय ने तर्क दिया कि एस. अज़ीज़ बाशा के मामले के बाद इसे 1981 के संशोधन से रद्द कर दिया था. इसलिए, यह मुस्लिम छात्रों के लाभ के लिए प्रावधान कर सकता है. 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आरक्षण नीति को रद्द कर दिया और माना कि एएमयू में विशेष आरक्षण नहीं हो सकता क्योंकि एस. अज़ीज़ बाशा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार यह अल्पसंख्यक संस्थान नहीं था.

2006 में केंद्र सरकार और यूनिवर्सिटी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 24 अप्रैल 2006 को जस्टिस केजी बालाकृष्णन और जस्टिस डीके जैन की पीठ ने एएमयू की आरक्षण नीति पर रोक लगा दी. आरक्षण नीति की संवैधानिकता पर निर्णय लेने के लिए इसे बड़ी पीठ के पास भेजने की सिफारिश की गई. केंद्र में 2014 में आई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने 2016 में यह कहते हुए अपील वापस ले ली कि वह विश्वविद्यालय की अल्पसंख्यक स्थिति को स्वीकार नहीं करती है. 

12 फरवरी 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने एस. अज़ीज़ बाशा मामले में फैसले को सात-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष पुनर्विचार के लिए भेजा. इसके ठीक आठ महीने बाद 12 अक्टूबर 2023 को ये मामला सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था. 

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उन्होंने ये आठ याचिकाएं सुनवाई के लिए अपनी ही अगुआई में बनाई जस्टिस एसके कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की सात न्यायाधीशों वाली पीठ का गठन किया था. अब इस पीठ में जस्टिस एसके कौल की जगह जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस गवई की जगह जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा हैं.

पीठ को विचार करना था कि संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत किसी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा देने के मानदंड क्या हैं? क्या संसदीय क़ानून द्वारा निर्मित कोई शैक्षणिक संस्थान संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त कर सकता है?

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