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तेलंगाना: सिविल जज की भर्ती में उर्दू भाषियों को भी करें शामिल, असदुद्दीन ओवैसी ने उठाई मांग

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तेलंगाना के कानून मंत्री को पत्र लिखकर राज्य में होने वाली सिविल जज की भर्ती में उर्दू भाषियों को भी शामिल करने की मांग की है. उन्होंने पत्र लिखकर कहा है कि उर्दू राज्य की आधिकारिक भाषा है इसलिए तेलुगू के अलावा उर्दू को भी प्रशासनिक कामों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

असदुद्दीन ओवैसी (File Photo) असदुद्दीन ओवैसी (File Photo)
अब्दुल बशीर
  • हैदराबाद,
  • 20 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 4:49 PM IST

ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने तेलंगाना के कानून मंत्री को पत्र लिखकर न्यायपालिका से जुड़ी भर्तियों में उर्दू भाषियों को भी शामिल करने की मांग की है. ओवैसी ने कहा कि तेलंगाना उर्दू भाषा का जन्म स्थान है. उर्दू राज्य की आधिकारिक भाषा भी है. 

ओवैसी ने राज्य के कानून मंत्री बी जनार्दन रेड्डी को लिखे खत में कहा कि राज्य ने 2021 और 2022 के लिए सिविल जज के 50 पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है. नोटिफिकेशन में अप्लाई करने वाले शख्स के लिए तेलुगू भाषा लिखने और पढ़ने की अनिवार्यता रखी गई है. इसके साथ ही 100 मार्क के अंग्रेजी के पेपर में तेलुगू से अंग्रेजी ट्रांसलेशन की बात भी कही गई है.

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नियमों के मुताबिक 2017 से उर्दू को तेलंगाना में आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला हुआ है. इतना ही नहीं उर्दू राज्य की दूसरी ऑफिशियल लैंग्वेज है. इसलिए राज्य के सभी प्रशासनिक कार्यों के लिए तेलुगू के साथ-साथ उर्दू का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए. ओ

AIMIM चीफ ने आगे लिखा कि 2018 से पहले तक राज्य के सभी स्कूलों में तेलुगू भाषा की अनिवार्यता नहीं थी. इससे पहले तक ऐसा नहीं था. इसलिए ये उम्मीद करना बेकार है कि आवेदन करने के इच्छुक सभी उम्मीदवार तेलुगू के जानकार होंगे. 

तेलंगाना का इतिहास कई समृद्ध भाषाओं से भरा पड़ा है. उर्दू 1966 से संयुक्त आंध्र प्रदेश में तेलंगाना क्षेत्र की आधिकारिक भाषा रही है. यह बात गौर करने लायक है कि 2020 से पहले तक राज्य में तेलुगू की अनिवार्यता को लेकर कोई शर्त नहीं रही है. इसलिए सिविल जज की भर्ती के लिए तेलुगू के साथ-साथ उर्दू का भी विकल्प शामिल किया जाए.

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बता दें कि कर्नाटक में खड़े हुए हिजाब विवाद पर भी ओवैसी जमकर बयानबाजी करते रहे हैं. हाल ही में इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था. कोर्ट के दोनों जजों की राय इसको लेकर अलग-अलग थी. जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक सरकार के शिक्षण संस्थानों में हिजाब बैन को सही ठहराया था तो वहीं जस्टिस सुधांशु धूलिया ने हिजाब पहनने पर लगाई गई पाबंदी को गलत बताया था. इस फैसले के बाद ओवैसी ने कहा था,' हमें उम्मीद थी कि अदालत से हिजाब के पक्ष में एक सर्वसम्मत फैसला आएगा, लेकिन अगर दोनों जज इससे सहमत नहीं हैं तो कोई बात नहीं.'

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