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राजस्थान के 'राइट टू हेल्थ' बिल में ऐसा क्या है जिसे लेकर हफ्तेभर से हड़ताल पर हैं डॉक्टर?

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने 21 मार्च को विधानसभा में राइट टू हेल्थ बिल पास किया. लेकिन इस बिल का विरोध शुरू हो गया है. करीब हफ्तेभर से राज्य में डॉक्टर हड़ताल पर हैं. डॉक्टरों ने इस बिल को असंवैधानिक बताया है और इसकी वापसी की मांग कर रहे हैं. ऐसे में जानना जरूरी है कि इस बिल में ऐसा क्या है, जो इसका इतना विरोध हो रहा है?

प्रदर्शनकारी डॉक्टर राइट टू हेल्थ बिल की वापसी पर अड़े हैं. (फाइल फोटो-PTI) प्रदर्शनकारी डॉक्टर राइट टू हेल्थ बिल की वापसी पर अड़े हैं. (फाइल फोटो-PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 27 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 7:17 PM IST

राजस्थान विधानसभा में स्वास्थ्य को लेकर एक अहम बिल पास हुआ है. ये बिल राज्य के सभी नागरिकों को स्वास्थ्य का अधिकार देता है. पर इस बिल का विरोध भी शुरू हो गया है. 

राज्य के डॉक्टरों ने बिल के विरोध में हड़ताल शुरू कर दी है. हफ्तेभर से डॉक्टर सड़कों पर हैं. इस बिल के खिलाफ राजस्थान के डॉक्टरों को अब बाकी शहरों के डॉक्टरों का साथ भी मिल रहा है. मुंबई के निजी डॉक्टरों का कहना है कि ये बिल 'गलत आइडिया' है और ये डॉक्टरों को प्रैक्टिस करने से 'डिमोटिवेट' करेगा.

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इस बिल के खिलाफ मुंबई के डॉक्टर भी सोमवार को कैंडल मार्च निकाल रहे हैं. बॉम्बे हॉस्पिटल के डॉ. गौतम भंसाली ने कहा, 'हम सभी मरीजों को फ्री में इलाज कैसे दे सकते हैं. इन्फ्रास्ट्रक्चर में पैसा खर्च होता है. जांच में पैसा खर्च होता है. डॉक्टरों और स्टाफ की सैलरी में पैसा खर्च होता है. और अगर हम फ्री इलाज देंगे तो सैलरी के लिए पैसा कहां से लाएंगे.'

इसी बीच, राजस्थान सरकार के इस बिल का विरोध अब तक तो निजी डॉक्टर कर रहे थे, लेकिन अब उन्हें सरकारी डॉक्टरों का भी साथ मिल गया है. ये डॉक्टर 'राइट टू हेल्थ बिल' को वापस लेने की मांग पर अड़े हैं. 

पर ऐसा है क्या इस बिल में?

- राजस्थान विधानसभा में ये बिल 21 मार्च को पास हो चुका है. गजट नोटिफिकेशन जारी होते ही ये कानून बन जाएगा. 

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- इस बिल में राज्य में रह रहे सभी लोगों को स्वास्थ्य का अधिकार दिया गया है. बिल में प्रावधान है कि कोई भी अस्पताल या डॉक्टर मरीज को इलाज के लिए मना नहीं कर सकता.

- बिल में प्रावधान है कि इमरजेंसी में आए मरीज को कोई भी अस्पताल या डॉक्टर इलाज के लिए मना नहीं कर सकता. ऐसी स्थिति में मरीज का पहला इलाज किया जाएगा. 

- ये बिल अगर कानून बनता है तो अस्पताल आने पर मरीज को बगैर कोई डिपॉजिट किए ही इलाज मिल सकेगा. अब तक ऐसा होता है कि जब तक मरीज के परिजनों से और फीस नहीं दी जाती है तब तक इलाज शुरू नहीं होता है, लेकिन कानून के बाद डॉक्टर इसके लिए मना नहीं कर सकेंगे.

प्रदर्शन करते डॉक्टर. (फाइल फोटो-PTI)

किस पर लागू होगा ये कानून?

- राजस्थान सरकार का ये कानून न सिर्फ सरकारी अस्पतालों, बल्कि निजी अस्पतालों पर भी लागू होगा. इतना ही नहीं, किसी भी तरह के हेल्थ केयर सेंटर पर भी लागू होगा. 

तो फिर फीस कौन देगा?

- बिल में जैसा कि प्रावधान किया गया है कि कोई भी अस्पताल या डॉक्टर मरीज को फ्री में इलाज मुहैया कराएगा. इसके लिए मरीज या उसके परिजनों से पहले कोई फीस नहीं ली जाएगी.

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- इलाज के बाद ही मरीज और उसके परिजनों से फीस ली जा सकती है. लेकिन अगर मरीज फीस देने में असमर्थ होगा तो फिर बकाया फीस सरकार चुकाएगी या फिर मरीज को किसी और दूसरे अस्पताल में शिफ्ट कर देगी.

इलाज करने से मना करने पर क्या होगा?

- इस बिल में प्रावधान किया गया है कि कोई भी अस्पताल या डॉक्टर फीस न देने पर मरीज का इलाज करने से मना नहीं कर सकता.

- लेकिन अगर ऐसा होता है तो पहली बार में 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा. दूसरी बार भी ऐसा ही होता है तो 25 हजार रुपये का जुर्माना वसूला जाएगा.

डॉक्टरों की क्या है मांग?

- डॉक्टरों राइट टू हेल्थ बिल को वापस लेने की जिद पर अड़े हैं. उनका कहना है कि जब तक इस बिल को वापस नहीं लिया जाता, तब तक उनका प्रदर्शन जारी रहेगा.

- इसके अलावा डॉक्टरों का ये भी कहना है कि अगर ये कानून बनता है तो इससे निजी अस्पतालों के कामकाज में ब्यूरोक्रेट्स का दखल बढ़ जाएगा. 

सरकार का क्या है कहना?

- डॉक्टर इस बिल को वापस लेने की जिद पर अड़े हैं तो सरकार भी साफ कर चुकी है कि इसे वापस नहीं लिया जाएगा. हालांकि, सरकार हड़ताल पर बैठे डॉक्टरों से बातचीत जरूर कर रही है.

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- रविवार को मुख्य सचिव उषा शर्मा और बाकी दूसरे अधिकारियों ने डॉक्टरों के साथ मीटिंग की. इसमें उन्होंने कहा कि ये बिल राज्य में लोगों के स्वास्थ्य अधिकारों को मजबूत करता है. मुख्य सचिव ने ये भी कहा कि सरकार डॉक्टरों के सुझावों पर चर्चा करने को तैयार है.

- हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि जब तक बिल वापस नहीं होता, तब तक कोई चर्चा नहीं होगी. प्राइवेट हॉस्पिटल एंड नर्सिंग होम सोसायटी डॉ. विजय कुमार ने कहा कि ये बिल असंवैधानिक है और इसकी वापसी के बाद ही चर्चा की जाएगी.

- इसी बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बार फिर से डॉक्टरों से हड़ताल खत्म करने की अपील करते हुए कहा कि ये जनहित में नहीं है. आधिकारिक सूत्रों ने न्यूज एजेंसी को बताया कि मुख्यमंत्री जयपुर जाकर इस मामले में अधिकारियों के साथ बैठक करने वाले हैं.

जयपुर में डॉक्टरों का प्रदर्शन जारी है. (फाइल फोटो-PTI)

आखिर में बात, मरीज के क्या होते हैं अधिकार?

भारत में मरीज और उसके परिजनों के क्या अधिकार होते हैं? इस लेकर 2018 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक चार्टर जारी किया था. इसमें मरीजों के सारे अधिकार बताए गए थे.

- हर मरीज का ये अधिकार है कि उसे उसकी बीमारी और उसके इलाज के बारे में सारी जानकारी दी जाए. ये जानकारी मरीज को ऐसी भाषा में दी जाए जो उसके समझ में आए. इसके साथ ही मरीज को उसके इलाज में होने वाले अनुमानित खर्च की भी सही जानकारी दी जानी चाहिए.

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- किसी भी मरीज या उसके परिजनों का अधिकार है कि अस्पताल उसे केस से जुड़े सारे कागजात दें. ये कागजात अस्पताल में भर्ती होने के 24 से 72 घंटे में दे दिए जाने चाहिए. डिस्चार्ज होने के बाद डिस्चार्ज समरी भी देना जरूरी है, जिसमें छुट्टी के बाद क्या-क्या ख्याल या सावधानियां बरतनी हैं, उसकी जानकारी हो. अगर मरीज की मौत हो जाती है तो डेथ समरी और जांच की सारी ऑरिजिनल रिपोर्ट परिजनों को सौंपी जाएगी.

- अगर कोई व्यक्ति नाजुक स्थिति में अस्पताल पहुंचता है तो ये अस्पताल और डॉक्टरों की जिम्मेदारी है कि उसे तुरंत डॉक्टरी मदद दी जाए. चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, कोई भी अस्पताल मरीज को मेडिकल इमरजेंसी केयर देने से मना नहीं कर सकता. जान बचाने और सारी जरूरी सुविधाएं देने के बाद ही अस्पताल मरीज से पैसे मांग सकते हैं और आगे की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं.

- कोई भी टेस्ट, सर्जरी, इलाज या थैरेपी करने से पहले मरीज की लिखित अनुमति लेना जरूरी है. अगर मरीज की अनुमति के बिना उसका इलाज किया जाता है या कोई दवा दी जाती है या टेस्ट किया जाता है, तो ये अपराध माना जाएगा.

- हर मरीज के पास निजता का अधिकार है और डॉक्टर की ये जिम्मेदारी है कि वो उसकी निजता को बनाए रखें. डॉक्टर अपने मरीज की बीमारी या इलाज से जुड़ी कोई जानकारी तब तक साझा नहीं कर सकता, जब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला न हो. अगर महिला मरीज की जांच कोई पुरुष डॉक्टर कर रहा है, तो उस समय एक महिला डॉक्टर या नर्स या अटेंडेंट का होना जरूरी है.

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-हर मरीज के पास दूसरी राय लेने का अधिकार है. अगर मरीज को लगता है कि जो डॉक्टर उसका इलाज कर रहा है, वो सही नहीं है तो वो किसी दूसरे डॉक्टर से राय ले सकता है. इसके लिए डॉक्टर या अस्पताल उसके सारे मेडिकल रिकॉर्ड बिना किसी कीमत के और बिना देरी किए उपलब्ध कराएंगे.

- हर मरीज के पास बिना किसी भेदभाव के इलाज पाने का अधिकार है. कोई भी डॉक्टर या अस्पताल मरीज की बीमारी, उसकी जाति, धर्म, लिंग, रंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता.

- कोई भी अस्पताल या डॉक्टर किसी मरीज को किसी खास दुकान से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. इसी तरह से मरीज अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी भी लैब से जांच करा सकता है.

- अगर किसी मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में रेफर या ट्रांसफर किया जा रहा है, तो मरीज और उसके परिजनों को ये जानने का अधिकार है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है?

- हर मरीज को डिस्चार्ज होने का अधिकार है. कोई भी अस्पताल या डॉक्टर बिल न चुकाने या किसी भी तरह का विवाद होने पर मरीज को डिस्चार्ज करने से मना नहीं कर सकता. इसी तरह अगर मौत हो गई है तो भी बिल न चुकाने या किसी विवाद की स्थिति में शव को देने से इनकार नहीं किया जा सकता. अगर कोई अस्पताल या डॉक्टर ऐसा करता है तो एक साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है.

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