
केंद्र की राजनीति में दशकों का सफर तय करने वाले दिग्गज राजनेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का आज सोमवार को निधन हो गया. सत्तर के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी प्रणब मुखर्जी को सियासत में लाईं थीं. प्रणब मुखर्जी जुलाई 2012 से जुलाई 2017 तक देश के राष्ट्रपति रहे. इसके पहले उन्होंने वित्त, रक्षा और विदेश जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभाली थी. साल 2004 से 2012 तक केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में उन्हें प्रमुख 'संकटमोचक' माना जाता था.
इंदिरा गांधी कैबिनेट में वित्त मंत्री
प्रणब मुखर्जी ने 1969 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उंगली पकड़कर राजनीति में एंट्री ली थी. तब वे कांग्रेस टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए. 1973 में वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए और उन्हें औद्योगिक विकास विभाग में उपमंत्री की जिम्मेदारी दी गई. इसके बाद वह 1975,1981,1993,1999 में फिर राज्यसभा के लिए चुने गए. उनकी लिखी आत्मकथा में स्पष्ट है कि वो इंदिरा गांधी के बेहद करीबी थे और जब आपात काल के बाद कांग्रेस की हार हुई तब इंदिरा गांधी के सबसे विश्वस्त सहयोगी बनकर उभरे थे.
1980 में वे राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता बनाए गए. इस दौरान मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा और प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे. प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी की कैबिनेट में वित्त मंत्री हुआ करते थे. 1984 में यूरोमनी मैगजीन ने प्रणब मुखर्जी को दुनिया के सबसे बेहतरीन वित्त मंत्री के तौर पर सम्मानित किया था.
इंदिरा की हत्या के बाद नहीं बन सके PM
वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश बताते हैं कि प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के ऐसे नेता थे, जो प्रधानमंत्री बनने के सारे गुण रखते थे. उनके राजनीतिक जीवन में ऐसे कई मौके आए जब यह लग रहा था कि कांग्रेस उन्हें पीएम बनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका है. साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था. वे पीएम बनने की इच्छा भी रखते थे, लेकिन कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने प्रणब को किनारे करके राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया. इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो राजीव गांधी और प्रणब मुखर्जी बंगाल के दौरे पर थे, वे एक ही साथ विमान से आनन-फानन में दिल्ली लौटे.
प्रणब मुखर्जी का ख्याल था कि वे कैबिनेट के सबसे सीनियर सदस्य हैं इसलिए उन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन राजीव गांधी के रिश्ते के भाई अरुण नेहरू ने ऐसा नहीं होने दिया. उन्होंने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का दांव चल दिया. पीएम बनने के बाद राजीव गांधी ने जब अपनी कैबिनेट बनाई तो उसमें जगदीश टाइटलर, अंबिका सोनी, अरुण नेहरू और अरुण सिंह जैसे युवा चेहरे थे, लेकिन इंदिरा गांधी की कैबिनेट में नंबर-2 रहे प्रणब मुखर्जी को मंत्री नहीं बनाया गया था.
नाराज प्रणब दा ने छोड़ी कांग्रेस
राजीव कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से दुखी होकर प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और अपनी अलग पार्टी बनाई. प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया था, लेकिन अपनी पार्टी के जरिए कोई खास असर नहीं दिखा सके. हालांकि, जब तक राजीव गांधी सत्ता में रहे प्रणब मुखर्जी राजनीतिक वनवास में ही रहे. इसके बाद 1989 में राजीव गांधी से विवाद का निपटारा होने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया.
साल 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो प्रणब मुखर्जी का कद बढ़ा. राव उनसे सलाह-मशविरा तो करते रहे, लेकिन फिर भी कैबिनेट में जगह नहीं दी गई. हालांकि, राव ने उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया और वे पांच साल तक इस पद पर रहे. नरसिम्हा राव के सत्ता में रहते हुए ही प्रणब मुखर्जी ने धीरे-धीरे कांग्रेस में अपना सियासी आधार मजबूत करना शुरू कर दिया था.
सोनिया के साथ खड़े रहे
पीएम नरसिम्हा राव के सामने कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह राजनीतिक चुनौती पेश करने लगे थे. ऐसे में अर्जुन सिंह की काट से लिए राव ने प्रणब मुखर्जी को 1995 में विदेश मंत्री बनाने का दांव चला. हालांकि, राव सरकार का यह आखिरी साल था. इसके बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो 9 साल तक सरकार में वापसी नहीं हो सकी. हालांकि, 1998 में कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी ने संभाली तो प्रणब मुखर्जी उनके साथ मजबूती के साथ खड़े रहे.
साल 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. 2004 में सोनिया गांधी ने विदेशी मूल का व्यक्ति होने की चर्चाओं के बीच घोषणा कर दी कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनेंगी. ऐसे में प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चाएं तेज हो गई थी, लेकिन सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को पीएम बनाने का फैसला किया. इससे प्रणब मुखर्जी के हाथ से पीएम बनने का मौका एक बार फिर निकल गया.
हालांकि, इस दौरान प्रणब मुखर्जी ने वित्त से लेकर विदेश मंत्रालय तय का कार्यभार संभाला और पार्टी के संकट मोचक भी भूमिका में रहे. इसके बाद साल 2012 में कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया और वो देश के राष्ट्रपति चुने गए थे.