
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों और गांव-गरीबों के मसीहा कहे जाने वाले पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने का ऐलान कर दिया है. मोदी सरकार के इस फैसले के बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश और समाजवादी नेताओं ने खुशी जाहिर की है. चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने के कई मायने निकाले जा रहे हैं. अब हम आपको इस मौके पर चौधरी चरण के के पश्चिमी यूपी से किसान नेता के रूप में शुरू हुए राजनीतिक से लेकर प्रधानमंत्री पद पर आसीन हो और भारत रत्न मिलने तक के दिलचस्प सफर के बारे में बता रहे हैं.
1979 में बने पीएम
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की राजनीति से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री पद पर आसीन होकर इतिहास रच दिया. उन्होंने 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक भारत की बागडोर संभाली थी.
चौधरी चरण का जन्म 23 दिसंबर, 1902 को बाबूगढ़ छावनी के पास उस वक्त के नूरपुर तहसील हापुड़, गाजियाबाद के एक जाट परिवार में हुआ था. चौधरी चरण सिंह के जन्म के 6 वर्ष बाद उनके पिता नूरपुर से जानी खुर्द के पास भूपगढी आकर बस गए. यहीं के परिवेश में उनके मन में गांव-गरीब और किसानों के शोषण के खिलाफ संघर्ष का विचार पैदा हुआ. उन्होंने कॉलेज में पढ़ाई के दौरान किसानों के मुद्दों पर अपनी आवाज को मुखरता से उठाना शुरू कर दिया था.
चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत
दिया था अजगर का फॉर्मूला
चौधरी चरण सिंह ने अपने वक्त में कांग्रेस के कद्दावर नेताओं को धूल चटाने के लिए अजगर फॉर्मूला दिया था. इस फॉर्मूले का अर्थ जातियों से था. उन्होंने अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत के मिल जाने को अजगर का नाम दिया था. चौधरी चरण सिंह का ये फॉर्मूला पश्चिम यूपी ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में सफल रहा था.
क्या कहते हैं समीकरण
आपको बता दें कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जाट बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 26 लोकसभा सीटों में से 19 पर जीत हासिल की थी, जबकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन को सात सीटें मिली थीं. इस बार बीजेपी उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटें जीतने की रणनीति पर काम कर रही है.
क्या है जाटलैंड की ताकत?
वैसे तो जाट समुदाय की आबादी पंजाब, हरियाणा, राजस्थान समेत कई राज्यों में प्रभावी है लेकिन खासकर यूपी के पश्चिमी जिलों में स्थिति बेहद मजबूत है. यूपी में जाट प्रभाव वाले जिले हैं- मेरठ, मथुरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, आगरा, बिजनौर, मुरादाबाद, सहारनपुर, बरेली और बदायूं. भले ही पूरे यूपी में जाट समुदाय की आबादी 4 से 6 फीसदी के बीच हो लेकिन जाटलैंड की इतनी चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि पश्चिमी यूपी के कुल वोटों में करीब 17 फीसदी हिस्सेदारी जाट समुदाय की है.
इस इलाके की 120 विधानसभा सीटों और 18 लोकसभा सीटों पर जाट वोट बैंक असर रखता है और इनमें से 30 विधानसभा सीटों पर तो जाट वोटबैंक निर्णायक स्थिति में है. संसदीय चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव... जाट बिरादरी के वोट काफी हद तक सत्ता का रुख तय करते हैं. खेती के लिहाज से काफी उपजाऊ इस इलाके को किसान लैंड के साथ-साथ जाटलैंड भी कहा जाता है.