
लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) में बीते कई दिनों से मचे बवाल के बीच चिराग पासवान ने दावा किया है कि पार्टी एकजुट है. चिराग ने 'आजतक' से खास बातचीत में कहा है कि पार्टी की परिभाषा देखें तो वह संगठन से बनती है. महासचिव, प्रकोष्ठों के अध्यक्षों आदि से पार्टी बनती है. सांसद-विधायक तो आते-जाते रहते हैं. दुनिया की शायद ही कोई ऐसी पार्टी होगी, जिसमें से लोग गए नहीं होंगे. यहां पर यह दुख हुआ कि अपनों ने धोखा दिया.
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद चिराग पासवान ने कहा कि दो प्रदेश अध्यक्ष के अलावा, दूसरे गुट में और कोई भी नहीं गया. दिल्ली और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर बाकी सभी इस बैठक में शामिल थे. जो यहां नहीं आ सका, वह वर्चुअली मीटिंग में शामिल हुआ. उन्होंने विश्वास जताया कि एलजेपी का सिंबल वही जीतेंगे. उन्होंने कहा, ''पार्टी के सिंबल की लड़ाई है ही नहीं, मुझे पूरा विश्वास है कि वह मेरे ही पक्ष में आएगा. अब पार्टी नई ऊंचाइयों पर जाएगी, यह मेरा विश्वास है.
उन्होंने कहा कि कुछ समय बात इस बात की जानकारी दी जाएगी कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कितनी संख्या में लोग मौजूद रहे. 90 फीसदी से ज्यादा लोग यहां मौजूद रहे. सभी के नाम, परिचय और वीडियो रिकॉर्डिंग मेरे पास है, जब भी चुनाव आयोग यह मांगेगा, हम उन्हें उपलब्ध करवाएंगे. चिराग ने बातचीत में कहा कि जब आप सच्चाई के रास्ते पर चलते हैं तो आपको डरने की जरूरत नहीं है. जनता हमारे साथ है.
चिराग पासवान ने चाचा पशुपति पारस के समर्थक गुटों को लेकर कहा कि अभी स्थिति स्पष्ट करने की उन लोगों को जरूरत है कि वे लोग कहां पर हैं और किस पार्टी में हैं या फिर निर्दलीय हैं. मालूम हो कि चाचा पशुपति पारस द्वारा अलग गुट बनाए जाने के बाद चिराग पासवान ने रविवार को एलजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई थी. उधर यह जानकारी मिलते ही पशुपति पारस ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी को भंग करते हुए नई कार्यकारिणी की घोषणा की थी.
मालूम हो कि एलजेपी में कुछ दिनों पहले तब बवाल शुरू हुआ था, जब चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस समेत पांच सांसदों ने अलग रुख अपना लिया था. पार्टी के सांसद चिराग से अलग होते हुए पशुपति पारस के समर्थन में आ गए थे. इसके बाद, पशुपति पारस को संसदीय दल का नेता भी चुन लिया गया था. हालांकि, चिराग पासवान ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा था कि यदि चाचा बोलते तो उन्हें खुद ही संसदीय दल का नेता बना देता. दोनों ही गुटों ने चुनाव आयोग का रुख किया है.