Advertisement

सिक्किम में तबाही की मुख्य वजह बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, भारी वर्षा और बढ़ता प्रदूषण: वैज्ञानिक

पर्यावरण विशेषज्ञ अंजल प्रकाश ने बताया कि कमजोर क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण कई हिमनद झीलें तेजी से बढ़ रही हैं. विशेषज्ञ जीएलओएफ को पिघलते ग्लेशियरों के लिए जिम्मेदार मानते हैं.

सिक्किम में बाढ़ की फाइल फोटो सिक्किम में बाढ़ की फाइल फोटो
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 22 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 4:51 PM IST

सिक्किम में तबाही की मुख्य वजह बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, भारी वर्षा, अनियंत्रित निर्माण और प्रदूषण है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन का कई गुना बढ़ना भी इसका एक बड़ा कारण है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हिमालय में हिमानी झीलों की संख्या में वृद्धि के साथ ऐसी और आपदाएं हो सकती हैं. .

इस महीने की शुरुआत में सिक्किम में अचानक आई बाढ़ से हजारों लोग विस्थापित हुए, प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाएं नष्ट हो गईं और बड़ी संख्या में लोग मारे गए. विशेषज्ञों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर सहित अन्य हिमालयी राज्य भी इसी तरह के खतरे में हैं. जीएलओएफ एक विनाशकारी बाढ़ है जो हिमनद झील वाले मोराइन बांध की विफलता के कारण उत्पन्न हुई है.

Advertisement

पर्यावरण विशेषज्ञ अंजल प्रकाश ने बताया कि कमजोर क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं, जहां जलवायु परिवर्तन के कारण कई हिमनद झीलें तेजी से बढ़ रही हैं. विशेषज्ञ जीएलओएफ को पिघलते ग्लेशियरों के लिए जिम्मेदार मानते हैं, जो क्षेत्र में मानव-प्रेरित प्रदूषण और अनियंत्रित निर्माण के कारण बढ़ते तापमान का परिणाम है. भूकंप और ब्लैक कार्बन उत्सर्जन जैसे कारक भी भूमिका निभाते हैं. पर्यावरण इंजीनियर मोहम्मद फारूक आजम के मुताबिक जलवायु परिवर्तन दो तरह से काम कर रहा है.

उन्होंने समझाया, 'सबसे पहले, ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप ग्लेशियर की बर्बादी हो रही है जो हिमालय क्षेत्र में 2000 के बाद अधिक स्पष्ट है. घटते ग्लेशियर जहां समाप्त होते हैं वहां अवसाद छोड़ रहे हैं. ये अवसाद पिघले पानी से भरे होते हैं और प्रो-ग्लेशियर झीलों का निर्माण करते हैं, जो अक्सर नाजुक प्राकृतिक बांधों द्वारा हो जाते हैं. ये झीलें ग्लेशियर की बर्बादी को बढ़ाती हैं और लगातार ग्लोबल वार्मिंग के कारण इनका आकार और संख्या दोनों बढ़ रही हैं.

Advertisement

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-इंदौर के एसोसिएट प्रोफेसर आजम ने कहा, 'इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण भी चरम मौसम की स्थिति पैदा हो रही है.

अत्यधिक वर्षा और गर्मी की लहरों की आवृत्ति बढ़ रही है, जिससे झीलें टूटने के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई हैं. आजम ने कहा, 2013 की केदारनाथ आपदा में यही स्थिति थी, जहां चोराबाड़ी प्रो-ग्लेशियल झील पूरी तरह से टूट गई थी और शायद सिक्किम में भी यही हुआ था.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement