
बीजेपी से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस और एनसीपी के साथ एक अप्रत्याशित गठबंधन बनाने का साहसिक दांव खेलने वाले उद्धव ठाकरे शनिवार को महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी की हार को समझने के लिए संघर्ष कर रहे थे. उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से वह केवल 20 सीटें जीत सकी. एमवीए और अपनी पार्टी के इस निराशाजनक प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा, 'मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि जिन मतदाताओं ने केवल पांच महीने पहले लोकसभा चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को हराया था, उनका मन अचानक कैसे बदल गया.'
उद्धव की पहचान करिश्माई और फायरब्रांड हिंदूवादी नेता रहे शिवसेना संस्थापक दिवंगत बाला साहेब ठाकरे के शर्मीले बेटे की रही है. वहां से लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने तक उन्होंने एक लंबा सफर तय किया. बाला साहेब ठाकरे के देहांत के बाद उन्होंने शिवसेना की कमान संभाली. शिवसेना के दिग्गज नेता नारायण राणे और अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की बगावत से वह पार्टी को टूटने से बचाने में कामयाब रहे. नवंबर 2019 में विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद भाजपा के साथ दशकों पुराने गठबंधन को समाप्त करके कांग्रेस और एनसीपी के साथ एमवीए में शामिल हुए और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने.
पार्टी में पनप रहे असंतोष से अनभिज्ञ रहे उद्धव
कोरोना महामारी के दौरान उनके नेतृत्व ने उन्हें प्रशंसा दिलाई, उद्धव ठाकरे पार्टी के एक बड़े वर्ग में पनप रहे असंतोष के बारे में अनभिज्ञ रहे. शिवसेना के अधिकांश विधायक कांग्रेस और राकांपा के साथ गठबंधन से नाराज थे. उनका मानना था कि ये दोनों पार्टियां शिवसेना की वैचारिक विरोधी रही हैं और भाजपा से उनका नैचुरल एलायंस था. महाराष्ट्र की जनता ने बीजेपी और शिवसेना गठबंधन को 2019 में जनादेश दिया था, लेकिन उद्धव ठाकरे के फैसले के कारण एनसीपी और कांग्रेस अपरोक्ष रूप से महाराष्ट्र में सरकार चला रही थीं.
जून 2022 में एकनाथ शिंदे के विद्रोह ने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया, जिससे उनकी सरकार गिर गई और पार्टी में विभाजन हो गया. हालांकि, उद्धव नहीं डगमगाए. वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर हमला करते रहे और एकनाथ शिंदे समेत बगावत करने वाले सभी नेताओं को 'गद्दार' कहकर संबोधित किया. उनकी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से 21 पर चुनाव लड़ा, जो महा विकास अघाड़ी के सहयोगियों में सबसे अधिक है, लेकिन 9 सीटें जीतीं. तब सीट-बंटवारे की बातचीत के दौरान उनके अड़ियल रुख के लिए उनकी आलोचना की गई थी.
उद्धव के काम करने के तरीके पर भी उठे सवाल
उन पर कम सुलभ होने का भी आरोप लगाया गया. यह आरोप 2022 में उनके खिलाफ विद्रोह करने वाले विधायकों ने लगाया था. उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव के कार्यकाल के दौरान उनके घर से काम करने को लेकर भी कटाक्ष किया और यहां तक कि उनके सहयोगी शरद पवार ने भी इस पर टिप्पणी की. अच्छी बात यह है कि उद्धव ठाकरे को मुसलमानों और दलितों सहित समाज के उन वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ, जो पहले शिवसेना के साथ असहज थे. इन वर्षों में, उन्होंने भाषण देने का कौशल भी विकसित किया. उनकी शैली उनके पिता के उग्र भाषणों से अलग है, लेकिन वह अपने विरोधियों के प्रति उतने ही तीखे हैं.
सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना-राकांपा गठबंधन ने महाराष्ट्र चुनाव में प्रचंड जीत हासिल की, तो मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि नतीजों से यह मुद्दा सुलझ गया है कि असली शिवसेना कौन सी है. इस चुनाव में बड़ी हार के बाद अब 64 वर्षीय उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे के सामने अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं एकजुट रखने की चुनौती होगी. क्योंकि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों से साबित हो गया है कि अविभाजित शिवसेना के कोर वोटर्स ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में विश्वास जताया है. यह साबित हो गया है कि शिंदे के नेतृत्व वाली सेना- जिसे बाल ठाकरे की पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह पहले ही मिल चुका है- असली शिवसेना है. लोकसभा चुनावों में भी शिंदे गुट वाली शिवसेना का स्ट्राइक रेट उद्धव गुट की शिवसेना से बेहतर रहा था.