Advertisement

बिहार में खराब प्रदर्शन के बाद बंगाल-तमिलनाडु में बढ़ सकती हैं कांग्रेस की मुसीबतें

बिहार में महागठबंधन की हार के पीछे कांग्रेस पार्टी को दोषी ठहराया जा रहा है. महागठबंधन में सबसे खराब प्रदर्शन कांग्रेस का ही रहा जो 70 सीटों पर चुनाव लड़ी और 27% की स्ट्राइक रेट के साथ सिर्फ 19 सीटें जीतने में कामयाब हो पाई. इस खराब प्रदर्शन ने सहयोगी नेताओं को कांग्रेस पर उंगलियां उठाने के लिए प्रेरित किया.

बिहार में खराब परिणाम के बाद कांग्रेस के लिए आगे की राह और मुश्किल (फाइल-पीटीआई) बिहार में खराब परिणाम के बाद कांग्रेस के लिए आगे की राह और मुश्किल (फाइल-पीटीआई)
आनंद पटेल
  • नई दिल्ली,
  • 12 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 11:58 PM IST
  • बिहार में 70 सीटों में से 19 सीटों पर ही जीत सकी कांग्रेस
  • यूपी में भी 114 सीटों में से महज सात सीटें ही जीत सकी थी
  • महाराष्ट्र में 147 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन 44 सीट ही जीती

बिहार चुनाव में कांग्रेस के खराब स्ट्राइक रेट के कारण उन राज्यों में पार्टी की मुसीबत बढ़ सकती है जहां आने वाले कुछ महीनों में चुनाव होंगे. बिहार का असर पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण में तमिलनाडु तक, उन राज्यों में ज्यादा होगा जहां कांग्रेस पार्टी को एक मजबूत गठबंधन की दरकार है.

पश्चिम बंगाल में वाम दलों के साथ कांग्रेस के गठबंधन की घोषणा पहले ही की जा चुकी है. लेकिन तमिलनाडु में डीएमके के साथ कांग्रेस पार्टी के सामने ज्यादा बाधाएं आ सकती हैं.

Advertisement

बिहार में महागठबंधन की हार के पीछे कांग्रेस पार्टी को दोषी ठहराया जा रहा है. महागठबंधन में सबसे खराब प्रदर्शन कांग्रेस का ही रहा जो 70 सीटों पर चुनाव लड़ी और 27% की स्ट्राइक रेट के साथ सिर्फ 19 सीटें जीतने में कामयाब हो पाई. इस खराब प्रदर्शन ने सहयोगी नेताओं को कांग्रेस पर उंगलियां उठाने के लिए प्रेरित किया.

बिहार के अनुभवी नेता और कटिहार से पांच बार के लोकसभा सांसद तारिक अनवर ने माना, 'हमें स्वीकार करने की आवश्यकता है कि राज्य में कांग्रेस पार्टी के कमजोर संगठन की वजह से महागठबंधन की हार हुई. हमें नुकसान के कारणों पर विचार करने की आवश्यकता है.’

खराब स्ट्राइक रेट
कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन का ये ट्रेंड चिंताजनक है कि उसने जिन राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, उन्हें नुकसान ही पहुंचाया.

Advertisement

उत्तर प्रदेश में पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा और 114 सीटों में से सिर्फ सात सीटें जीतीं यानी 6.14% का बेहद खराब स्ट्राइक रेट रहा.

पिछले साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी 147 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. कांग्रेस की सहयोगी एनसीपी उससे कम 121 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन एनसीपी 54 सीटें जीती, जबकि कांग्रेस ने 29.93% स्ट्राइक रेट के साथ सिर्फ 44 पर जीत दर्ज की.

‘डीएमके के लिए अहम चुनाव’
बिहार चुनाव के नतीजों का असर तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस के गठबंधन पर पड़ने की संभावना है. 2016 में यहां कांग्रेस ने 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 19.51% के स्ट्राइक रेट के साथ सिर्फ 8 सीटें जीत पाई थी. इसे AIADMK की जीत और DMK की हार का कारण बताया गया था.

विशेषज्ञों का मानना है कि डीएमके उस गलती को दोहराना नहीं चाहेगी और कांग्रेस उस हालत में नहीं होगी कि अपने आप को बहुत ज्यादा आगे रख सके.

राजनीतिक विश्लेषक सुमंत सी रमन ने इंडिया टुडे टीवी से कहा, ‘डीएमके की समस्या ये है कि आगामी चुनाव उसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिसमें वह हार नहीं सकती. वे 10 साल से सत्ता से बाहर हैं, इसलिए वे सुनिश्चित करना चाहेंगे कि हर वोट उनकी झोली में आए.’

Advertisement

रमन ने कहा, ‘फिलहाल राज्य में कांग्रेस के पास 4 से 5 प्रतिशत वोट है, डीएमके बहुत सावधानी से ये देखेगी कि कांग्रेस कितना फायदा/नुकसान पहुंचा सकती है और उसी हिसाब से उसे न्यूनतम सीटें देगी.’

एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक आर मणि का मानना है कि डीएमके सतर्क रुख अपनाएगी. उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि बिहार चुनाव के नतीजों से प्रभावित होकर डीएमके 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से छुटकारा ले लेगी. हालांकि, अगर डीएमके सत्ता में आ जाती है और कांग्रेस की बदकिस्मती जारी रहती है तो 2024 के लोकसभा चुनाव में जरूर वह कांग्रेस से छुटकारा लेना चाहेगी.’

मणि ने कहा, ‘तमिलनाडु में कम से कम 35-40 सीटें हैं जहां पर कांग्रेस के पास करीब 7000 से ज्यादा समर्पित वोट बैंक है. कम से कम 12 सीटों पर कांग्रेस के पास 12 से 15 हजार वोट हैं. मोटे तौर पर मैं कह सकता हूं कि कांग्रेस के पास 234 सीटों में से करीब 35 से 40 सीटों पर 7 से 15 हजार वोट हैं और कम से कम 20 से 25 सीटें हैं जहां पार्टी को करीब 5000 वोट मिलते हैं. कांग्रेस अपने दम पर एक भी सीट निकालने की स्थिति में नहीं है.

'लेकिन इसमें एक पेंच है. अगर कांग्रेस सभी 234 सीटों पर लड़ती है तो डीएमके को वह कम से कम 40 सीटों पर तगड़ा नुकसान पहुंचा सकती है. पिछले चुनाव में डीएमके जो सीटें 100 से लेकर 5000 तक के बेहद कम अंतर हारी है, वहां आप कल्पना कर सकते हैं कि डीएमके अगर कांग्रेस से अलग होती है तो उसे नुकसान ही होगा.'

Advertisement

फिलहाल डीएमके खामोश
डीएमके के नेता अभी कुछ बोलने की हालत में नहीं हैं. पार्टी के एक सदस्य ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि गठबंधन पर फैसला सिर्फ पार्टी आलाकमान करेगा. इस बार पार्टी जीतने पर ध्यान केंद्रित करेगी और सर्वश्रेष्ठ रणनीति बनाई जाएगी. हालांकि, कांग्रेस पार्टी के नेताओं को लगता है कि बिहार के नतीजों के आधार पर राष्ट्रीय स्तर का अनुमान लगाना बेवकूफी होगी.

देखें: आजतक LIVE TV

तमिलनाडु से पार्टी के लोकसभा सांसद और तेलंगाना के AICC सचिव मनिक्कम टैगोर ने इंडिया टुडे को बताया, 'हर चुनाव अलग होता है, संगठन की मजबूती, प्रत्याशियों का चुनाव जैसे कई लोकल फैक्टर होते हैं जो अहम भूमिका अदा करते हैं. तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके की अगुवाई वाले गठबंधन का अहम हिस्सा है जिसने लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया. जमीन पर हमारा मजबूत गठबंधन है और विधानसभा चुनाव में एंटी मोदी और एंटी पलानीसामी भावनाएं बहुत बड़ी भूमिका निभाएंगी. बिना योजना के लॉकडाउन ने छोटे और मझौले उद्योगों को ध्वस्त कर दिया है और ग्राउंड पर लोगों का रुख देखा जा सकता है.'

बंगाल के वामपंथियों में कानाफूसी
बिहार में पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे सीमांचल क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. इसका असर अगले साल बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है.

Advertisement

बिहार में ‘महागठबंधन’ में शामिल वाम दलों ने कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया और महागठबंधन की हार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार भी ठहराया है. अब ऐसी चर्चाएं हैं कि हाल ही में वाम-कांग्रेस गठबंधन की घोषणा होने जा रही है और बिहार के नतीजे इस पर असर डाल सकते हैं.

2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 92 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 47% की स्ट्राइक रेट के साथ 44 सीटें जीतने में सफल रही थी. पार्टी के पश्चिम बंगाल मामलों के प्रभारी जितिन प्रसाद ने इंडिया टुडे से कहा, 'ऐतिहासिक कारणों से वाम दलों ने 200 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा था और सिर्फ 33 सीटें जीत पाए. हमारा स्ट्राइक रेट बेहतर था. गठबंधन अंतत: विचारधारा और कॉमन लक्ष्यों के आधार पर बनेगा.' (चेन्नई से अक्षया नाथ के इनपुट के साथ)

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement