
सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट डेवलपर्स की मनमानी पर नकेल कसते हुए एक अहम फैसला सुनाया है. रियल एस्टेट परियोजनाओं से परेशान उपभोक्ताओं के पक्ष में अहम फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिल्डर अगर पजेशन देने में देरी करते हैं तो उपभोक्ता अदालत ग्राहक को मुआवजा देने का आदेश जारी कर सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया है कि एक उपभोक्ता अदालत को परियोजना को पूरा करने में देरी और उपभोक्ता को निर्धारित समय में कब्जा नहीं देने के मसले पर मुआवजे का आदेश जारी करने का अधिकार है.
न्यायमूर्ति यूयू ललित और विनीत सरन की पीठ ने अपने फैसले में कहा 'रेरा कानून की धारा-79 किसी भी तरह उपभोक्ता संरक्षण कानून के प्रावधानों के तहत आयोग या फोरम को किसी शिकायत की सुनवाई करने से रोक नहीं सकती है.' कोर्ट ने यह भी कहा कि साल 2013 में साइन किए गए बिल्डर और बायर्स एग्रीमेंट में वादा किया गया था कि 42 महीने में निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा, वादे में उल्लेखित समय सीमा पहले ही बीत चुकी है.
पीठ ने कहा है कि यदि अनुबंध के नियमों को तोड़ा गया है तो होमबॉयर्स के अधिकारों को केवल इसलिए स्थगित नहीं किया जा सकता क्योंकि रेरा के तहत पंजीकरण की अवधि अभी भी जारी है. यह फैसला रियल एस्टेट डेवलपर M/S Imperia Structures Ltd द्वारा दायर एक मामले में पारित किया गया. इस कंपनी ने गुड़गांव 13 सी में एक आवास परियोजना शुरू की थी. होमबॉयर्स ने 2017 में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाय था कि इस परियोजना पर 4 साल बाद भी कोई निर्माण शुरू नहीं हुआ था.
कोर्ट ने कहा कि अगर रियल एस्टेट डेवलपर समय पर परियोजना पूरी नहीं करता और उपभोक्ता को परेशानी का सामना करना पड़ता है यो यह विषय उपभोक्ता अदालत के दायरे का है.
बता दें कि रियर एस्टेट का कारोबार फिलहाल मंदी के दौर से गुजर रहा है. ऐसे में ग्राहकों और डेवलपर्स के बीच विवाद के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खरीदारों को राहत मिली है.