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संसद में स्थापित हुआ तो DMK ने किया था विरोध, अब खुद 'सेंगोल' थामे नजर आए उदयनिधि

संसद में जब सेंगोल को स्थापित किया गया था तो सपा, डीएमके समेत कई राजनीतिक दलों ने इसे राजशाही का प्रतीक बताते हुए इसका विरोध किया था. डीएमके ने भी इसका विरोध करते हुए कहा था कि लोकतंत्र में संविधान की बात होनी चाहिए.

हाथ में 'सेंगोल' थामे नजर आए उदयनिधि. (सोशल मीडिया) हाथ में 'सेंगोल' थामे नजर आए उदयनिधि. (सोशल मीडिया)
प्रमोद माधव
  • नई दिल्ली,
  • 30 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 8:03 AM IST

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि को राज्य के डिप्टी सीएम पद की जिम्मेदारी मिली है. 2026 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव से पहले इसे डीएमके के बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है. उदयनिधि को मिली इस जिम्मेदारी के बाद देशभर के नेता उन्हें बधाई दे रहे हैं. लेकिन इसी बीच एक तस्वीर ने सभी का ध्यान खींचा जब उदयनिधि हाथ में सेंगोल थामे नजर आए. ये तस्वीर इसलिए खास है क्योंकि उदयनिधि और डीएमके सेंगोल को राजशाही का प्रतीक मानती हैं और इसका विरोध करती रही हैं.

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हाथ में सेंगोल थामे नजर आए उदयनिधि

डीएमके के यूथ विंग के उप सचिव Thoothukudi S.Joel ने उदयनिधि को ये सेंगोल दिया है. सेंगोल पर चर्चा इसलिए भी लाजमी है क्योंकि जब संसद में इसे स्थापित किया गया था तो खूब सियासत हुई थी. कई राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया था. विरोध करने वालों में तमिलनाडु की डीएमके भी थी. हालांकि, सेंगोल का इतिहास तमिलनाडु से ही जुड़ा हुआ है.

क्यों होता है सेंगोल का विरोध

संसद में जब सेंगोल को स्थापित किया गया था तो सपा, डीएमके समेत कई राजनीतिक दलों ने इसे राजशाही का प्रतीक बताते हुए इसका विरोध किया था. डीएमके ने भी इसका विरोध करते हुए कहा था कि लोकतंत्र में संविधान की बात होनी चाहिए. लेकिन सेंगोल राजशाही का प्रतीक है. कई दलों ने सेंगोल को संसद से हटाने की भी मांग की थी.

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क्या होता है सेंगोल

सेंगोल संस्कृत शब्द "संकु" से लिया गया है, जिसका अर्थ है "शंख". शंख हिंदू धर्म में एक पवित्र वस्तु थी, और इसे अक्सर संप्रभुता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. राजदंड भारतीय सम्राट की शक्ति और अधिकार का प्रतीक था. यह सोने या चांदी से बना था, और इसे अक्सर कीमती पत्थरों से सजाया जाता था. सेंगोल राजदंड औपचारिक अवसरों पर सम्राट द्वारा ले जाया जाता था, और इसका उपयोग उनके अधिकार को दर्शाने के लिए किया जाता था. सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक भी माना जाता है. 

आजादी और नेहरू से जुड़ा इतिहास 

सेंगोल का इतिहास काफी पुराना है. आजाद भारत में इसका बड़ा महत्व है. 14 अगस्त 1947 में जब भारत की सत्ता का हस्तांतरण हुआ, तो वो इसी सेंगोल द्वारा हुआ था. एक तरह कहा जाए तो सेंगोल भारत की आजादी का प्रतीक है. आजादी के समय जब लॉर्ड माउंट बेटन ने पंडित नेहरू से पूछा कि सत्ता हस्तांतरण के दौरान क्या आयोजन होना चाहिए? नेहरूजी ने अपने सहयोगियों से चर्चा की. सी गोपालाचारी से पूछा गया. गोपालाचारी ने सेंगोल प्रक्रिया के बारे में बताया. इसके बाद इसे तमिलनाडु से मंगाया गया और आधी रात को पंडित नेहरू ने स्वीकार किया. इसका तात्पर्य था पारंपरिक तरीके से ये सत्ता हमारे पास आई है.

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यह भी पढ़ें: तमिलनाडु में उदयनिधि को डिप्टी सीएम बनाने का DMK का दांव कितना असरदार, क्या 2026 में मिलेगा फायदा?


तमिलनाडु से खास कनेक्शन 

सेंगोल चोल साम्राज्य से जुड़ा हुआ है. जब इसे नेहरू को सौंपा गया था, तब तमिलनाडु के पुजारियों द्वारा इसमें धार्मिक अनुष्ठान किया गया था. फिर 1971 में तमिल विद्वान ने इसका जिक्र किया और किताब में इसका जिक्र किया. सेंगोल राजदंड का पहला ज्ञात उपयोग मौर्य साम्राज्य (322-185 ईसा पूर्व) द्वारा किया गया था. मौर्य सम्राटों ने अपने विशाल साम्राज्य पर अपने अधिकार को दर्शाने के लिए सेंगोल राजदंड का इस्तेमाल किया. गुप्त साम्राज्य (320-550 ईस्वी), चोल साम्राज्य (907-1310 ईस्वी) और विजयनगर साम्राज्य (1336-1646 ईस्वी) द्वारा सेंगोल राजदंड का भी इस्तेमाल किया गया था. सेंगोल राजदंड आखिरी बार मुगल साम्राज्य (1526-1857) द्वारा इस्तेमाल किया गया था. 

मुगल बादशाहों ने अपने विशाल साम्राज्य पर अपने अधिकार को दर्शाने के लिए सेनगोल राजदंड का इस्तेमाल किया. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (1600-1858) द्वारा भारत पर अपने अधिकार के प्रतीक के रूप में सेनगोल राजदंड का भी उपयोग किया गया था.

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