
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राजनीतिक दलों को फंडिंग मुहैया कराने वाली इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा. मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पांच सदस्यीय पीठ ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम की वैधता को चुनौती देने वाली चार याचिकाओं पर 31 अक्टूबर को बहस शुरू की थी.
इनमें कांग्रेस नेता जया ठाकुर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) सहित याचिकाएं भी शामिल हैं. सरकार ने इस स्कीम को 2 जनवरी, 2018 को अधिसूचित किया था. इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने और राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले कैश डोनेशन के विकल्प के रूप में पेश किया गया था. अदालत ने निर्वाचन आयोग से 2 सप्ताह के अंदर सील बंद लिफाफे में 2019 के बाद बॉन्ड्स के जरिए मिले राजनीतिक चंदे का ब्यौरा मांगा है.
'भ्रष्टाचार रोकना है, तो चुनावी बॉन्ड तुरंत बंद हों'
एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने रिजॉइंडर में कहा, 'कॉरपोरेट सत्तारूढ़ दल को बड़ा चंदा देते हैं, अन्य दलों को मामूली. सरकार से वे फायदा उठाते हैं. पावर एंजॉय करते हैं. ये भी एक तरह का भ्रष्टाचार है. अगर भ्रष्टाचार खत्म करना है तो इस स्कीम को फौरन बंद करना जरूरी है. वोट का अधिकार तो गुप्त है, लेकिन राजनीतिक चंदा देने वाले की जानकारी सबको होनी चाहिए. सत्तारूढ़ दल के साथ अन्य दलों को भी होनी चाहिए.'
सिब्बल ने अपनी दलील में कहा, 'इलेक्टोरल बॉन्ड्स और चुनाव प्रक्रिया के बीच कोई संबंध नहीं है, जहां उम्मीदवार को हर चीज का खुलासा करना होता है. वे (सरकार) कहते हैं कि इससे पारदर्शिता आती है- पारदर्शिता कहां है? मतदाता को क्यों नहीं पता होना चाहिए? ऐसा क्या तर्क है जो राजनीतिक चंदा किसने और कितना दिया, यह विपक्षी राजनीतिक दल को नहीं पता होगा? एसजी ने स्वीकार किया कि कुछ मामलों में बदले की भावना से काम लिया जा सकता है.'
उन्होंने कहा, 'मैं कभी भी अदालत नहीं जा पाऊंगा! आप (इलेक्टोरल बॉन्ड में गोपनीयता वाली शर्त) भ्रष्ट लेन-देन से सुरक्षा की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि मुझे स्रोत का कभी पता नहीं चलेगा! मैं एफआईआर दर्ज नहीं करा पाऊंगा, अदालत नहीं जा सकूंगा, क्योंकि मेरे पास कोई डेटा नहीं होगा.' कपिल सिब्बल ने शीर्ष अदालत से कहा, यदि आप भ्रष्टाचार से निपटना चाहते हैं तो सबसे पहले इस योजना को रद्द करना होगा. यह राजनीतिक स्थायित्व का सबसे सुरक्षित तरीका है. दूसरा, वे कहते हैं कि ईबी एक वित्तीय/आर्थिक नीति है--ऐसा नहीं है. यह चुनावी मुद्दा है.'
'चुनावी बॉन्ड ने लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों को बदला'
कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, 'इसने (इलेक्टोरल बॉन्ड) लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों को बदल दिया है. वोट देने का अधिकार गुप्त है, राजनीतिक डोनेशन गुप्त नहीं हो सकता. दानदाताओं की पहचान उपलब्ध नहीं होने का एकमात्र कारण योजना की संरचना है क्योंकि आपने इसे इसी तरह बनाया है? यहां कौन सा जनहित साधा जा रहा है? आप किसकी रक्षा कर रहे हैं? आप वास्तव में अपनी सुरक्षा कर रहे हैं क्योंकि आप जानते हैं कि आपको किसने दान दिया है. दानदाताओं की पहचान की रक्षा करने में सार्वजनिक हित, मतदाता के जानने के अधिकार में सार्वजनिक हित से अधिक कैसे हो सकता है? काले धन से छुटकारा पाना असंभव है, लेकिन आप सरकार को यह बता सकते हैं कि यह कोई रास्ता नहीं है.'
'काले धन को रोकना असंभव है, यह दावा सही नहीं है'
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कपिल सिब्बल की दलीलों पर सरकार का पक्ष रखा. उन्होंने कहा, 'मैं इस दावे से असहमत हूं कि काले धन को खत्म करने का कोई तरीका नहीं है. डिजिटलीकरण पर बहुत जोर दिया गया है. हम काले धन को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. चुनावी बॉन्ड योजना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बढ़ावा देती है, यह कैश डोनेशन को बैंकिंग चैनलों में ट्रांसफर करती है.' अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि चुनावी बॉन्ड योजना सभी दानकर्ताओं के साथ समान व्यवहार करती है. उन्होंने कहा, 'दानकर्ताओं की गोपनीयता महत्वपूर्ण है.'
इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम क्या है, कौन खरीद सकता है?
चुनावी बॉन्ड योजना के प्रावधानों के अनुसार, इसे भारत के किसी भी नागरिक या भारत में स्थापित कंपनी द्वारा खरीदा जा सकता है. कोई भी व्यक्ति अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ संयुक्त रूप से चुनावी बॉन्ड खरीद सकता है. केवल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत राजनीतिक दल और जिन्हें लोकसभा या राज्य विधान सभा के पिछले चुनाव में कम से कम 1 प्रतिशत वोट मिले हों, वे चुनावी बॉन्ड प्राप्त करने के पात्र हैं.
अदालत ने 2019 में रोक लगाने से किया था इनकार
अधिसूचना के अनुसार, चुनावी बॉन्ड को किसी पात्र राजनीतिक दल द्वारा केवल अधिकृत बैंक के खाते के माध्यम से इनकैश कराया जा सकता है. शीर्ष अदालत ने अप्रैल 2019 में चुनावी बॉन्ड योजना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और यह स्पष्ट कर दिया था कि वह याचिकाओं पर गहन सुनवाई करेगी, क्योंकि केंद्र और चुनाव आयोग ने 'महत्वपूर्ण मुद्दे' उठाए थे जिनका 'देश में चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर जबरदस्त प्रभाव' था.