
17 सितंबर 2020. ये वो तारीख थी जब संसद में खेती से जुड़े तीनों कानून पास हो गए थे. ये वही कानून हैं जिनके विरोध में पिछले साल नवंबर से शुरू हुआ किसानों का आंदोलन (Farmers Protest) अब तक जारी है. इस बीते एक साल में क्या-क्या हुआ? आइए जानते हैं...
क्या हैं वो तीन कानून...?
- पहला कानूनः कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 है. इसके मुताबिक किसान मनचाही जगह पर अपनी फसल बेच सकते हैं. बिना किसी रुकावट के दूसरे राज्यों में भी फसल बेच और खरीद सकते हैं.
- दूसरा कानूनः मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक सशक्तिकरण एवं संरक्षण अनुबंध विधेयक 2020 है. इसके जरिए देशभर में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है. फसल खराब होने पर उसके नुकसान की भरपाई किसानों को नहीं बल्कि एग्रीमेंट करने वाले पक्ष या कंपनियों को करनी होगी.
- तीसरा कानूनः आवश्यक वस्तु संशोधन बिल- 1955 में बने आवश्यक वस्तु अधिनियम से अब खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू जैसे कृषि उत्पादों पर से स्टॉक लिमिट हटा दी गई है.
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ऐसे शुरू हुआ किसानों का आंदोलन...
पिछले साल संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम दिनों में 14 सितंबर को ये कृषि सुधार अध्यादेश वित्त विधेयक के तौर पर संसद में लाए गए. 17 सितंबर को लोकसभा ने इसे पारित कर दिया. पंजाब, हरियाणा और हिमाचल जैसे राज्यों में किसानों के बीच 3 नवंबर से सुगबुगाहट शुरू हुई. कृषि मंडियों, जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तरों और सड़कों पर छुटपुट प्रदर्शनों और विरोध का सिलसिला शुरू हुआ. 25 नवंबर को दिल्ली कूच करने का ऐलान हुआ और किसान चल पड़े दिल्ली की सीमा पार करने.
दिल्ली की सरहदों पर पश्चिम की ओर से पंजाब, हरियाणा और पूरब की ओर से यूपी, उत्तराखंड के किसानों ने सीमा पर डेरा डाला. इस बीच सरकार की ओर से बातचीत की पेशकश भी हुई. बातचीत के चार दौर चले भी. लेकिन किसान नेता इन कानूनों में संशोधन का सुझाव देने या उन पर चर्चा करने की बजाय तीनों कानूनों को वापस लेने पर ही अड़े रहे. बातचीत के सभी दौर फेल रहे.
सुप्रीम कोर्ट ने समिति बनाने का आदेश दिया
इसी बीच 7 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दायर की गईं. कोर्ट ने विशेषज्ञों की समिति बनाई. समिति में किसानों के नुमाइंदे के तौर पर किसान नेता जीएस मान को भी शामिल किया गया. मान ने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि सभी सदस्य सरकार और कृषि कानूनों के समर्थक हैं.
भारत बंद का ऐलान किया गया, जिसका पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में छिटपुट असर दिखा. फिर आई 26 जनवरी. किसान प्रदर्शनकारियों का ट्रैक्टर मार्च. पहले ऐलान हुआ लाल किले तक ट्रैक्टर परेड निकालने का. पुलिस और प्रशासन ने इजाजत नहीं दी तो बीच का रास्ता निकाला गया. इस बात पर किसानों ने सहमति जताई कि प्रदर्शनकारी किसान ट्रैक्टरों से हरियाणा और यूपी की सीमा से दिल्ली में बस घुसने की सांकेतिक घोषणा कर वापस अपने-अपने राज्यों में लौट जाएंगे.
लेकिन पुलिस को चकमा देते हुए गणतंत्र दिवस की सुबह ही प्रदर्शनकारी दिल्ली में घुस आए. फिर दिल्ली की सड़कों पर जो तांडव हुआ वो इतिहास ने दर्ज कर लिया. लाल किले पर सिख निशान लहराया गया. तोड़ फोड़ और आंसू गैस की गोलीबारी हुई. पुलिस वालों को प्रदर्शनकारियों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा. एक युवक की मौत भी हुई.
उधर सुप्रीम कोर्ट ने गणतंत्र दिवस से पहले ही विशेषज्ञों की समिति बनाई. हालांकि 20 मार्च को समिति ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी है. लेकिन अब तक रिपोर्ट न तो सार्वजनिक हुई और न ही इस पर कोई बात आगे बढ़ी. रिपोर्ट सार्वजनिक करने के लिए समिति के सदस्य अनिल धनवत ने चीफ जस्टिस को चिट्ठी भी लिखी थी. अभी भी दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का जमावड़ा सांकेतिक तौर पर ही सही लेकिन है.