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72 घंटे बारूदी सुरंगें हटाते रहे, टैंकों का रास्ता बनाते रहे... 'परमवीर' राम राघोबा राणे की कहानी

First Living Recipient of Param Vir Chakra: देश के पहले भारतीय फौजी जिन्हें जीवित रहते हुए परमवीर चक्र से नवाजा गया. क्योंकि उन्होंने 3 दिन बिना खाए-पीए पाकिस्तानी फौजियों को पीछे धकेला. पीछे आ रही टैंकों और भारतीय जवानों के लिए रास्ता तैयार किया ताकि नौशेरा के आगे का हिस्सा घुसपैठियों के कब्जे से छुड़ाया जा सके. आइए जानते हैं इस महावीर की कहानी...

Major Ram Raghoba Rane ने बिना खाए-पिए लगातार भारतीय सेना के लिए रास्ता तैयार किया. (फोटोः विकिपीडिया) Major Ram Raghoba Rane ने बिना खाए-पिए लगातार भारतीय सेना के लिए रास्ता तैयार किया. (फोटोः विकिपीडिया)
ऋचीक मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 06 मई 2022,
  • अपडेटेड 3:05 PM IST
  • नौशेरा से राजौरी तक बनाया रास्ता
  • इनकी वजह से मारे गए 500 दुश्मन

10 जुलाई 1940 को 22 वर्षीय राम राघोबा राणे ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी ज्वाइन की. ये शुरुआत थी जोश से भरी एक नौकरी करने की. लेकिन देशभक्ति कहीं से कम नहीं थी. द्वितीय विश्व युद्ध में उनकी वीरता देखने को मिली, जब उन्होंने बर्मा की सीमा पर जापानियों को पस्त कर दिया. लेकिन 1948 में पाकिस्तानी की तरफ से हुए कबिलाई हमले में वो वीर से परमवीर हो गए. ऐसी बहादुरी, ऐसी देशभक्ति, बेहतरीन रण कौशल और हिम्मत कि दुश्मन 72 घंटे प्रयास करता रहा, लेकिन राणे को हिला नहीं पाया. 

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नौशेरा सेक्टर के झांगर पर 18 मार्च 1948 को भारतीय सेनाओं ने वापस हासिल कर लिया था. दिक्क्त ये थी कि उसके आगे राजौरी के पोस्ट कैसे हासिल किए जाएं. 8 अप्रैल 1948 को चौथी डोगरा बटालियन राजौरी की तरफ आगे बढ़ी. इस दौरान बटालियन ने बरवाली रिज से पाकिस्तानियों को भगाया और उसपर कब्जा किया. ये जगह नौशेरा से 11 किलोमीटर दूर थी. लेकिन आगे रास्ते में कई ब्लॉक्स बनाए गए थे. बारूदी सुरंगे बिछाई गई थीं. न सैनिक बढ़ पा रहे थे. न ही टैंक्स. तब 37वीं असॉल्ट फील्ड कंपनी के एक सेक्शन के कमांडर राम राघोबा राणे डोगरा रेजिमेंट की मदद के लिए आए. 

पाकिस्तान के साथ युद्ध के समय राम राघोबा राणे सेकेंड लेफ्टिनेंट थे. (फोटोः विकिपीडिया)

राम न होते तो रास्ता साफ न होता

राम राघोबा राणे अपनी टीम के साथ रास्ते को क्लियर करने लगे. रोड ब्लॉक्स और बारूदी सुरंग हटाने लगे. इस दौरान पाकिस्तानियों ने मोर्टार दागे. इसमें राणे के दो साथी शहीद हो गए और पांच जख्मी. राणे भी जख्मी हुए. लेकिन राणे और उनकी टीम रुकी नहीं. जवाबी हमला करते हुए बारूदी सुरंग शाम तक हटा दी. इससे टैंक्स को आगे बढ़ने का रास्ता मिल गया. लेकिन रास्ता सुरक्षित नहीं था. उसे टैंकों के चलने लायक बनाना था. राणे ने रात भर में टैंकों के लिए रास्ता बनाया. अगले दिन फिर उनके सेक्शन ने लगातार 12 घंटे काम किया. बारूदी सुरंगें हटाते रहे. रास्ता बनाते रहे.

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जख्म मिले पर जज्बा कम नहीं हुआ

जहां रास्ता सही होता था, वहां पर वो डायवर्जन बनाते थे. राणे और उनकी टीम पाकिस्तानी गोलियों की बौछार और मोर्टारों के हमलों के बावजूद काम करती रही. 10 अप्रैल को राम राघोबा राणे अल सुबह उठे और रास्ता क्लियर करने में लग गए. दो घंटे में उन्होंने काफी बड़ा रास्ता साफ कर दिया. इस दौरान पाकिस्तानी लगातार मोर्टार और मशीन गन से हमला करते रहे. राणे के इस काम की वजह से चौथी डोगरा बटालियन 13 किलोमीटर और आगे बढ़ पाई. राणे और उनकी टीम बारूदी सुरंगे हटाने, रास्ता साफ करने और उन्हें ठीक करने का काम कर रही थी. डोगरा रेजिमेंट और टैंक पाकिस्तानियों को करारा जवाब दे रहे थे. 

तीन दिन लगातार काम करके बनाया रास्ता

लेकिन पाकिस्तानी ऊंचाई पर बैठकर सड़क पर सीधे हमला कर रहे थे. तब राम राघोबा राणे ने एक टैंक के पीछे छिपकर रोड ब्लॉक को ब्लास्ट करके हटाया. यह काम उन्होंने रात होने से पहले खत्म कर दिया था. अगले दिन 11 अप्रैल को राणे और उनकी टीम ने फिर 17 घंटे काम किया. अब ये लोग चिंगास तक पहुंच गए थे. यानी नौशेरा और राजौरी का मिड-वे. यह पुराना मुगलकालीन मार्ग था. 8 से 11 अप्रैल के बीच जो रास्ते बनाए उनकी वजह से भारतीय सेना राजौरी तक पहुंच पाई. इस दौरान 500 से ज्यादा पाकिस्तानी मारे गए. हजारों की संख्या में घायल हुए. 

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देश के पहले राष्ट्रपित राजेंद्र प्रसाद से सम्मान हासिल करते राम राघोबा राणे. (फोटोः विकिपीडिया)

21 जून 1950 को सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे को परमवीर चक्र से नवाजा गया. उससे कुछ महीने पहले ही उन्हें लेफ्टिनेंट बनाया गया था. 1954 में कैप्टन बनाया गया. 25 जनवरी 1968 को राणे मेजर के पद से रिटायर हुए. 1994 को पुणे के कमांड हॉस्पिटल में उनकी मृत्यु हो गई. 

बापू के आंदोलन में शामिल होने जा रहे थे

26 जून 1918 को कर्नाटक राज्य के एक छोटे से गांव हावेरी में रहने वाले राघोबा पी राणे के घर जन्म लिया था. पिता पुलिस कर्मी थे. लिहाज़ा राणे की पढ़ाई-लिखाई ठीक-ठाक रही. राणे 12 साल के थे, जब उन्होंने 1930 में गांधी जी के असहयोग आन्दोलन को देखा. इस आंदोलन से वह इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इसका हिस्सा बनाने का मन बना लिया था. हालांकि, पिता नहीं चाहते थे कि वह इसका हिस्सा बने. लिहाज़ा वह राणे को लेकर अपने पैतृक गांव चेंडिया चले गए.

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