
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भले ही चेन्नई में पहली 'फेयर डिलिमिटेशन' मीटिंग की मेज़बानी करके 2026 के बाद होने वाले परिसीमन के कारण संभावित नुकसान से पीड़ित राज्यों के बीच एकता की धुरी बनकर उभरे हों, लेकिन तेलंगाना में एक दिलचस्प कहानी चल रही है. बैठक में राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल बीआरएस दोनों के प्रतिनिधि मौजूद थे. रेवंत रेड्डी और केटी रामा राव (KTR) जो लगभग हर रोज़ हैदराबाद में एक-दूसरे का गला पकड़ते हैं, चेन्नई में एक ही राग अलापते नजर आए. दोनों ने परिसीमन के खिलाफ़ तर्क दिया क्योंकि उन्हें लगा कि इससे भारत के सबसे युवा राज्य और दक्षिण भारत को नुकसान होगा.
साथ आने पर भड़की बीजेपी
तेलंगाना में राजनीतिक स्पेक्ट्रम की तीसरी धुरी बीजेपी ने दोनों पार्टियों को दो ऐसे दलों के रूप में ब्रांड किया है जो विधायकों की अदला-बदली, भ्रष्टाचार, घोटाले के जरिए जनता को लूटने और वंशवादी शासन को प्राथमिकता देने में एक साथ हैं. साथ ही बीजेपी ने उन पर परिसीमन को लेकर लोगों को गुमराह करने और भाषा और क्षेत्र का उपयोग करके विभाजनकारी राजनीति के पीछे छिपने का आरोप लगाया. जबकि पिछले दस साल में दोनों पार्टियों के बीच विधायकों की आवाजाही को देखते हुए ‘आया कांग्रेस, गया बीआरएस’ वाली बात गलत नहीं है, लेकिन किसी क्षेत्र से संबंधित मुद्दों को उठाने को 'विभाजनकारी' करार देना थोड़ा गलत है. संघीय ढांचे में राज्यों या राज्यों के समूह को अपने मुद्दे उठाने का वैध अधिकार है.
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लेकिन भाजपा के राजनीतिक व्यंग्य से परे, क्या कांग्रेस और बीआरएस के पास कोई जायज शिकायत है या फिर वह सिर्फ विक्टिम कार्ड खेल रही हैं? राजनीतिक वर्ग के बीच डर यह है कि अपनी आबादी को बेहतर तरीके से कंट्रोल करने के बाद, दक्षिणी राज्यों का उत्तर भारत की तुलना में प्रतिशत के लिहाज से कम प्रतिनिधित्व होगा, जिससे यह क्षेत्र चुनावी प्रणाली में राजनीतिक रूप से अप्रभावी हो जाएगा. यह आशंका है कि इससे आर्थिक लाभ कम होगा, जबकि राष्ट्रीय खजाने में दक्षिणी राज्यों का योगदान उत्तर के मुकाबले ज्यादा है.
मीटिंग में सबके अपने-अपने तर्क
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि दक्षिण के राज्य उत्तर में विकास को बढ़ावा दे रहे हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय खजाने में योगदान किए गए हर रुपये पर तेलंगाना को 42 पैसे वापस मिलते हैं. तमिलनाडु और कर्नाटक की स्थिति और भी खराब है, क्योंकि उन्हें क्रमशः 26 पैसे और 16 पैसे वापस मिलते हैं. इसके विपरीत, बिहार को टैक्स के रूप में दिए गए प्रत्येक एक रुपये पर 6.06 रुपये वापस मिलते हैं जबकि उत्तर प्रदेश को 2.03 रुपये वापस मिलते हैं.
इसलिए यह तर्क दिया जा रहा है कि परिसीमन करते समय जनसंख्या के साथ-साथ राजकोषीय योगदान को भी एक फैक्टर माना जाना चाहिए. रेड्डी ने जहां दक्षिण की लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी को मौजूदा 24 प्रतिशत से बढ़ाकर 33 प्रतिशत करने की बात कही, वहीं केटीआर ने इसे अर्थव्यवस्था से जोड़ा. बीआरएस का तर्क था कि चूंकि भारत की 19 प्रतिशत आबादी वाले दक्षिणी राज्य देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 36 प्रतिशत का योगदान देते हैं, इसलिए वे अपने आर्थिक उत्पादन के आधार पर संसद में उसी हिसाब से प्रतिनिधित्व के हकदार हैं.
साथ ही कांग्रेस और बीआरएस ने सांसदों की बजाय विधायकों की संख्या बढ़ाने की वकालत की. तर्क यह है कि विधायक ही सबसे पहले जनता के संपर्क में आते हैं, संकट के समय सबसे पहले वे ही मदद करते हैं और इसलिए कम आबादी के लिए ज़्यादा संख्या में विधायकों की नियुक्ति का फैसला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए कारगार साबित होगा.
कांग्रेस का स्टैंड एकदम उलट
लेकिन कल्पना कीजिए कि अगर यही तर्क तेलंगाना विधानसभा में भी लागू हो जाए तो ग्रेटर हैदराबाद तेलंगाना की 50 प्रतिशत से ज़्यादा सीटें जीत जाएगा क्योंकि अनुमान के मुताबिक हैदराबाद महानगर क्षेत्र का तेलंगाना की जीडीपी में योगदान 54 प्रतिशत है. हैदराबाद के भीतर भी यह काफी हद तक संभव है कि आर्थिक समृद्धि के उच्च स्तर वाले पश्चिमी हैदराबाद को हैदराबाद के पुराने हिस्से की तुलना में कहीं ज़्यादा सीटें मिल सकती हैं. यह तेलंगाना बोर्ड में अमीरों के ज़्यादा सीटें खरीदने जैसा होगा. क्या ऐसा कदम अमीरों के पक्ष में होगा या गरीबों के पक्ष में?
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कांग्रेस इस मुद्दे पर 'अंडे के छिलके पर चलने' की तरह आगे बढ़ रही है. विडंबना यह है कि जो पार्टी OBC के लिए आरक्षण और कोटा बढ़ाने के पक्ष में 'जितनी आबादी, उतना हक' का नारा पेश करती है, उसने अपने दक्षिणी क्षत्रपों को उसी दर्शन के खिलाफ बहस करने के लिए छोड़ दिया और इस तरह जोर देकर कहा है कि जनसंख्या ही एकमात्र विचार नहीं हो सकता.
क्षेत्रीय हित साधने पर फोकस
हालांकि इस बैठक को दक्षिण की एकता की बैठक के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन आंध्र प्रदेश की गैरमौजूदगी साफ थी. स्पष्ट कारणों से तेलुगु देशम (TDP) ने चेन्नई की बैठक को छोड़ दिया. जन सेना ने भी ऐसा ही किया, हालांकि उसके सांसद कथित तौर पर बैठक में भाग लेने के इरादे से चेन्नई पहुंचे थे. चंद्रबाबू नायडू लोगों से बड़े परिवार रखने की वकालत कर रहे हैं ताकि बेहतर जनसंख्या नियंत्रण उनके लिए बाधा न बने, लेकिन वे इससे दूर रहे क्योंकि एनडीए के भागीदार के रूप में वे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के साथ खाना खाते हुए नहीं दिखना चाहते थे. दिलचस्प बात यह है कि जगनमोहन रेड्डी ने भी चेन्नई की बैठक से नदारद रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर परिसीमन करते समय 'अत्यधिक सावधानी' बरतने का अनुरोध करके अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.
अंत में जिस बात पर ध्यान नहीं गया, वह है दक्षिण भारत में राजनीतिक रंगमंच का क्षेत्रीयकरण. यहां एक संदेश है. अपने नामकरण में बदलाव के बावजूद, बीआरएस अपने चरित्र में पूरी तरह तेलंगाना की जड़ों पर लौट आई है. जाहिर है कि डीएमके की नज़र 2026 के विधानसभा चुनावों पर है. केरल में एलडीएफ और यूडीएफ की भी यही राय है. कांग्रेस ने रेवंत रेड्डी के अलावा अपने तेलंगाना और कर्नाटक पीसीसी प्रमुखों के ज़रिए मौजूदगी दर्ज कराकर अपने अखिल भारतीय चरित्र को छोड़कर क्षेत्रीय चरित्र को स्थापित करने की कोशिश की है.