
मानव सभ्यता जबसे अस्तित्व में आई है तब से ही इसके समानांतर दो कॉन्सेप्ट चले आ रहे हैं. ये हैं पाप और पुण्य. पाप क्या हैं और पुण्य किसे कहते हैं, इस एक अवधारणा को ही केंद्रित करते हुए और इसे विस्तार से समझाने के लिए सनातन परंपरा में चार वेद लिखे गए है और इसके बाद उपनिषद और फिर 18 पुराणों की भी रचना की गई. ये पाप और पुण्य की अवधारणा का ही अगला कदम स्वर्ग और नर्क का बंटवारा है.
क्या है पाप और पुण्य?
सीधा तात्पर्य ये है कि पुण्य के फलों से स्वर्ग मिलता है और पापों के प्रभाव से आत्मा नर्क भोगती है. एक तरफ गीता में श्रीकृष्ण ये कहते हैं आत्मा अमर है, इसे अग्नि, जल, वायु, शस्त्र-अस्त्र कोई हानि नहीं पहुंचा सकते हैं. यह हर तरह के प्रभाव और भाव से परे है. न इसमें मोह है, न ममता और न ही किसी तरह के संबंध में यह बंधती है. इसलिए यह कष्ट से भी परे है, लेकिन इन्हीं शास्त्रों में ये भी लिखा है कि धरती पर पाप करने वाले मनुष्य की आत्मा नर्क भोगती है.
क्या है नर्क की अवधारणा?
नर्क का उल्लेख वेद, उपनिषद, और पुराणों में होता है, जहां इसे पापियों को दंड देने का स्थान माना गया है. ये दंड आत्मा को नहीं जीवात्मा को मिलता है. इसके लिए तर्क है कि जब आत्मा देह त्याग करती है तब उसकी पहचान कुछ समय के लिए उसी देह की रहती है, जिसमें वह थी. अपनी इसी पहचान के साथ जीवात्मा को यमदूत, यमलोक लेकर जाते हैं. यहां उनके सचिव चित्रगुप्त जो सभी जीवात्मा के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा अपनी एक पत्रिका में दर्ज रखते हैं, उसे ब्योरे को वह यमराज के सामने प्रस्तुत करते हैं. इस दौरान पुण्य और पाप का अलग-अलग ब्यौरा सामने रखा जाता है. इसके आधार पर जितना पाप और पुण्य सामने आता है, उसके बराबर का दंड भोगना ही पड़ता है.
गरुण पुराण में है नर्क का वर्णन
इस पूरी अवधारणा को गरुण पुराण में बहुत विस्तार से समझाया गया है. गरुण पुराण, भगवान विष्णु के वाहन गरुण के नाम पर आधारित है. कहते हैं कि एक बार माया के फेर में पड़कर गरुण अपने आराध्य भगवान विष्णु को नहीं पहचान पाए थे. असल में तब महाविष्णु श्रीराम के रूप में थे और मेघनाद के नागपाश में बंधकर बेसुध हो गए थे. तब उनके प्राण बचाने के लिए हनुमान जी स्वर्ग से गरुण जी बुला लाए थे. गरुण ने नागपाश का बंधन तो काट दिया, लेकिन सोचने लगे कि जो प्रभु सभी बंधनों से परे हैं, वह इस नागपाश में कैसे बंध गए. यह श्रीराम मेरे प्रभु विष्णु का अवतार तो नहीं हो सकते. इसी माया के निराकरण के लिए वह कैलाश पर महादेव शिव के पास गए. शिवजी ने उन्होंने तमाम तरह से समझाने की कोशिश की, लेकिन माया का पर्दा ऐसा था कि गरुण इसे नहीं समझ सके, तब शिवजी ने उन्हें कागभुशुंडि मुनि के पास भेज दिया. कागभुशुंडि मुनि ने गरुण को देखते ही कहा, मुझे पता था तुम आने वाले हो.
क्या है गरुण पुराण की कथा?
गरुण चकित हुए कि, आखिर आप कैसे जान गए मैं आने वाला हूं.तब कागभुशुंडि जी ने कहा कि, यह कोई पहली बार थोड़े ही है. तुम यहां कई बार आ चुके हो. हर बार अधूरे ज्ञान के साथ पहुंचते हो और फिर समय के चक्र में फंस जाते हो. इतना कहकर कागभुशुंडि जी ने गरुण को उसके भूतकाल के चित्र दिखा दिए. असल में गरुण को अपनी गति का अभिमान था कि वह समय से भी तेज उड़ सकता है, इसलिए उसे समय चक्र में ऐसा फंसाया गया कि वह हर जन्म चक्र में एक ही अवस्था में फंस गया था. गरुण और कागभुशुंडि जी ने 28 बार युगों को बदलते देखा था. ज्ञान प्राप्त करने के बाद इन्हीं गरुण जी को पाप-पुण्य और जन्म-मृत्यु के भव बंधन का ज्ञान हुआ और वह समय चक्र से छूट गए.
भगवान विष्णु ने दिए गरुण जी को उपदेश
तब वह शुद्ध होकर फिर से भगवान विष्णु के पास पहुंचे, तब भगवान विष्णु ने उन्हें धर्म, नीति, भक्ति, मोक्ष, जीवन और मृत्यु के रहस्यों के साथ-साथ मृत्यु के बाद की स्थितियों का वर्णन सुनाया. यही उपदेश गरुण पुराण कहलाता है. इस पुराण में विशेष रूप से प्रेतकथा और अंतर्यात्रा (मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा) का विवरण है. गरुण पुराण का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें भगवान विष्णु ने अपने प्रिय और भरोसेमंद सेवक गरुण को यह ज्ञान दिया. गरुण को हिंदू धर्म में ज्ञान और धर्म के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है, और वे देवताओं और मनुष्यों के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं. इसीलिए, इस पुराण का नाम गरुण से जुड़ा है.
इसी गरुण पुराण में नर्क की अवधारणा को सबसे विस्तार से रखा गया है. गरुड़ पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, नर्क की संख्या अलग-अलग है. गरुड़ पुराण में 28 तरह के नर्क का वर्णन है. इनमें रौरव नर्क, महारौरव नर्क, कुंभीपाक नर्क, असिपत्रवन जैसे नर्क शामिल हैं. हर नर्क में अलग-अलग प्रकार की यातनाएं दी जाती हैं, जो पाप के प्रकार पर निर्भर करती हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार, हत्या, चोरी, व्यभिचार, झूठ, हिंसा, और धर्मविरुद्ध कार्यों के लिए विशेष तरह के नर्क निर्धारित किए गए हैं.
किस नर्क में क्या है दंड?
रौरव नर्क: यहां पापी को तीव्र दर्द देने वाले कीड़े खाते हैं.
महारौरव: बड़े और भीषण जानवर कच्चा चबाकर खाते हैं. वह आत्मा को नाखूनों भरे पंजे मारते हैं और तरह-तरह के कष्ट देते हैं.
कुंभपाक: पापी को उबलते तेल में डाला जाता है.
असिपत्रवन: तेज धार वाली पत्तियों से भरे जंगल में पापी को दौड़ाया जाता है और कांटे चुभाये जाते हैं.
स्वर्ग-नर्क की अवधारणा और कर्मफल
नर्क की यातना नर्क में ही खत्म नहीं होती है, बल्कि ये दंड कई जन्मों तक साथ बने रहते हैं. पुराण कथाओं में ऐसा भी जिक्र है कि कोई भी मनुष्य अपने जीवन में जो भी कष्ट भोग रहा है, असल में वह उसे कर्मों का ही दंड है और वह उस कष्ट के रूप में नर्क ही भोग रहा है. इसी तरह भविष्य पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में कर्म की प्रधानता को और अधिक बड़ा करते हुए यह भी लिखा है कि मृत्युलोक ही वह स्थान है जहां जीवात्मा अपने कर्म के अनुसार स्वर्ग और नर्क को भोगती है.
क्यों महान होती हैं मां?
बल्कि गरुण पुराण में गर्भ नाम के नर्क का भी उल्लेख है. इस नर्क का वर्णन इस प्रकार है, जीवन भर लालसाओं में लिप्त रहने वाली, लालच, झूठ और अपनी महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए दूसरों को कष्ट देने वाली जीवात्मा को मल-मूत्र, पीप, मवाद, रक्त आदि के कूप में गिरना पड़ता है. यह कूप ही गर्भ नाम का नर्क है. हर जीव का गर्भकाल अलग-अलग समय का है. इस तरह जो जीवात्मा जितने समय गर्भ में रहती है, वह उतने समय का नर्क भोग रही होती है. इसी गर्भ नाम के नर्क के कारण मां को महान कहा गया है. मां कठोर कष्ट सहकर जीवात्मा को गर्भ से बाहर निकालती है और उसे नर्क से मुक्ति दिलाती है.
सबसे खतरनाक और वीभत्स नदी है वैतरणी
गरुण पुराण के प्रेतकल्प, अध्याय 10 में वैतरणी नदी को नर्क पहुंचने से पहले की बाधा के रूप में दर्शाया गया है. इसे पार करना पापियों के लिए अत्यंत कठिन और कष्टदायक होता है. यह नदी खून, मवाद, बाल, हड्डियों और अन्य अपवित्र चीज़ों से भरी होती है. इसमें जल के बजाय तेजाब और उबलता हुआ तरल बहता है और भयंकर कीड़े आत्माओं को कष्ट पहुंचाते हैं.
नर्क की अवधारणा सनातन और हिंदू परंपरा के अलावा संसार के अन्य पंथों में भी है. इनमें बौद्ध धर्म में नर्क को निरय नाम से जाना जाता है. वहीं जैन धर्म में इस शब्द को नारकी कहा गया है. ईसाई इसे Hell कहते हैं तो वहीं इस्लाम में इसे जहन्नुम कहा गया है.
बौद्ध धर्म में दो तरह के नर्क
बौद्ध धर्म में नर्क को "नरक" या "निरय" कहा गया है. यह छह अधोलोकों में से एक है, जो पुनर्जन्म के चक्र का हिस्सा है. बौद्ध धर्म में नर्क को स्थायी नहीं माना जाता; यह कर्मों के अनुसार आत्मा के लिए एक अस्थायी स्थान है. बौद्ध ग्रंथों में नर्क के दो प्रमुख प्रकार बताए गए हैं, 'गर्म नरक' और 'ठंडे नरक'. ये विभिन्न प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्टों का प्रतीक हैं.
बौद्ध ग्रंथों (जैसे त्रिपिटक) में नर्क के इन दोनों प्रकारों का वर्णन विस्तार से किया गया है.
1. गर्म नर्क (उष्ण नरक)
यहां आत्मा को गर्मी से संबंधित यातनाएं दी जाती हैं.
संघात नरक: यहां आत्मा को बड़ी चट्टानों के बीच कुचला जाता है.
कालसूत्र नरक: आत्मा को लोहे की गर्म सलाखों से दंडित किया जाता है.
संजीव नरक: आत्मा को मारने के बाद पुनः जीवित किया जाता है और बार-बार यातना दी जाती हैं
अविचि नरक: यह सबसे गहरा और भयानक नरक है, जहां आत्मा को लगातार और बिना विराम के यातनाएं सहनी पड़ती हैं.
2. ठंडा नर्क (शीत नरक)
यहां ठंड और जमने से जुड़ी यातनाएं दी जाती हैं.
आत्मा को बर्फ में दबा दिया जाता है.
अत्यधिक ठंड के कारण शरीर में दरारें और घाव होते हैं.
जैन धर्म में नर्क
जैन धर्म में नर्क को "नारकी" कहा जाता है. जैन ग्रंथों के अनुसार, नर्क चार स्तरों में विभाजित है और इसे सबसे निचले लोकों में से एक माना जाता है. पापी आत्माएं, जैसे हिंसा करने वाले और झूठ बोलने वाले, अपने बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप नर्क में जाती हैं. जैन धर्म में नर्क से मुक्ति केवल मोक्ष प्राप्ति के माध्यम से ही संभव है. जैन धर्म की तीर्थंकर परंपरा में 24 तीर्थंकर रहे हैं. सभी ने क्षमा को सबसे बड़ा धर्म बताया है. इसके अलावा धर्म के 9 और स्वरूप बताए हैं. जैन परंपरा कहती है कि जिस मनुष्य का जीवन इन दशलक्षण धर्म से अलग होता है, उसे नारकी का कष्ट भोगना होता है.
ईसाई धर्म में नर्क
ईसाई धर्म में नर्क को "Hell" कहा जाता है. इसे एक ऐसा स्थान माना जाता है, जहां पापी आत्माएं परमेश्वर से अलग होकर अनंतकाल तक कष्ट झेलती हैं. बाइबल में नर्क का वर्णन "अग्निकुंड" और "अनंत पीड़ा" के स्थान के रूप में किया गया है. कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट परंपराओं में नर्क की अवधारणा कुछ अलग है. इसे मुख्य रूप से इसे पाप के लिए दंडित करने के स्थान के रूप में देखा जाता है.
बाइबल में नर्क को ऐसी जगह के रूप में वर्णित किया गया है जहां आत्माएं अनंतकाल तक जलती हैं. यह पीड़ा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक स्तर पर भी होती है, क्योंकि यह ईश्वर की कृपा और उपस्थिति से दूर रहने का परिणाम है.
नर्क के लिए उपयोग किए गए शब्द:
गेहन्ना (Gehenna): यह बाइबल में नर्क का सबसे सामान्य संदर्भ है। इसे अनंत आग की जगह के रूप में वर्णित किया गया है.
शिओल (Sheol): हिब्रू बाइबल में यह मृतकों का निवास स्थान है, जिसे कभी-कभी नर्क के संदर्भ में लिया जाता है.
इस्लाम में नर्क
इस्लाम धर्म में नर्क को "जहन्नुम" कहा जाता है. यह उन लोगों के लिए निर्धारित स्थान है जिन्होंने अल्लाह के आदेशों का उल्लंघन किया है. कुरआन में जहन्नुम का वर्णन एक ऐसे स्थान के रूप में किया गया है, जहां आग और अन्य भौतिक कष्ट आत्माओं को दंडित करते हैं. हालांकि, इस्लाम में यह भी माना जाता है कि ईमान वाले व्यक्ति अल्लाह की माफी से नर्क से छुटकारा पा सकते हैं.
नर्क का वर्णन क़ुरान और हदीस में विस्तृत रूप से मिलता है. इसे भी पापियों के लिए अनंत यातना और दंड का स्थान माना गया है.
कैसा है जहन्नम?
नर्क को अत्यधिक गर्म, अंधकारमय, और यातनाओं से भरा स्थान बताया गया है. इसमें जलने वाली आग, खौलता हुआ पानी, कांटे वाले वृक्ष, और पीड़ा के लिए और भी भारी औजार हैं.
यह स्थान अनंत काल तक या अल्लाह की मर्जी तक पापियों को सज़ा देने के लिए है. इस्लाम में नर्क के विभिन्न स्तर (या दारजात) हैं, जो पापों की गंभीरता के आधार पर विभाजित हैं.
हर एक स्तर पर यातनाएं अलग-अलग और अधिक कठिन होती जाती हैं. क़ुरान में नर्क के सात द्वारों का उल्लेख है, प्रत्येक द्वार पापियों के अलग-अलग समूहों के लिए है.
दार्शनिक नजरिए से देखें तो नर्क की अवधारणा को नैतिकता और कर्मों के परिणाम के रूप में देखा जा सकता है. यह आत्मा के आंतरिक दोषों और पापों के लिए एक प्रतीकात्मक दंड का विधान है. कई दार्शनिक नर्क को एक मनोवैज्ञानिक स्थिति के रूप में मानते हैं, जहां व्यक्ति अपने किए गए पापों के बोझ और अपराधबोध को झेलता है. असल में यह एक कोशिश है कि इंसान को जागरूक किया जा सके कि वह जब पापकर्म करेगा तो उसका क्या हश्र होगा.
नर्क का वर्णन यह भी स्पष्ट करता है कि पापियों को उनकी यातनाओं के बाद फिर से जन्म दिया जाता है. मोक्ष प्राप्त करने के बाद आत्मा को नर्क और स्वर्ग के चक्र से मुक्ति मिलती है. पुराणों में नर्क का वर्णन यह भी समझाने के लिए किया गया है कि प्रत्येक कर्म का फल जरूर मिलता है. यह लोगों को नैतिकता और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने का एक जरिया भी है.