
India Today Conclave 2024 का आगाज हो गया है. दो दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह समेत कई अन्य वरिष्ठ नेता और हस्तियां शिरकत कर रही हैं. आयोजन के स्वागत भाषण में इंडिया टुडे समूह के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी ने कहा कि 'इंडिया मोमेंट' का लगातार विस्तार हुआ है और इसका दायरा लगातार बढ़ा है. नीचे पढ़ें अरुण पुरी का पूरा भाषणः-
सम्मानित अतिथियों
सुप्रभात
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के 21वें संस्करण में स्वागत है. पिछले साल हमारे कॉन्क्लेव की थीम थी 'इंडिया मोमेंट'. मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि 'इंडिया मोमेंट' का लगातार विस्तार हुआ है और इसका दायरा लगातार बढ़ा है. लेकिन थोड़ा महत्वाकांक्षी होकर इसे 'इंडिया मूवमेंट' कहें. इस तरह हम खुद को याद दिलाते रहेंगे कि हमें अभी क्या-क्या करना है? इस तरह हम खुद से लगातार पूछते रहेंगे कि हमारा अगला बड़ा कदम क्या है?
हम आज क्या कर सकते हैं ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि इंडिया मोमेंट लंबे समय तक रहे और एक आंदोलन में तब्दील हो जाए. और यह भारत को इतना विकसित और सशक्त कर दे, जैसा पहले कोई और ना हुआ हो.
मेरे लिए, एक बेहतर भविष्य का निर्माण करने का तरीका उस भविष्य को लेकर स्पष्ट विजन रखना है. और फिर उस विजन को वास्तविकता में तब्दील करने की दिशा में काम करने से है.
आज, मैं आपके सामने भारत के भविष्य की पांच तस्वीरें पेश करने जा रहा हूं, जो मुझे लगता है कि हमने हासिल कर ली हैं. पहली, गरीबी रेखा (Poverty Line) को भूल जाइए, जिसे लेकर भारत में आमतौर पर चर्चा होती है. अब इसे गरिमा रेखा (Dignity Line) में तब्दील कर दें. मैं इसे गरिमा रेखा ही कहूंगा. पिछले लगभग एक महीने के भीतर सरकार ने जो डेटा जारी किया है, उसमें बताया था कि देश में अत्यधिक गरीबी लगभग खत्म हो गई है. अत्यधिक गरीबी अब देश में दो फीसदी से भी कम है.
लेकिन मैं आपको बताना चाहूंगा कि अत्यधिक गरीबी को पार करना बहुत आसान है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, गरीबी को प्रतिदिन 2.15 डॉलर पीपीपी की उपभोग खपत के रूप में परिभाषित किया गया है. इसका मतलब है कि यह एक महीने में 1200 रुपये से 1500 रुपये या प्रतिदिन के हिसाब से 40 से 50 रुपये है.
बीते दस सालों में मौजूदा सरकार ने 20 करोड़ से ज्यादा लोगों को अत्यधिक गरीबी रेखा से ऊपर उठाकर बेहतरीन काम किया है.
अब गरिमा रेखा को निर्धारित करते हैं. यह वह रेखा है, जो बुनियादी तौर पर गरिमापूर्ण जीवन जीने का पैमाना तय करती है. इसमें भोजन से लेकर आवास, बिजली, स्वच्छ पानी, शिक्षा और हेल्थकेयर जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं. और यकीनन, एक रोजगार जिससे आपको बेसिक आय हो.
मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जब दस साल पहले पदभार संभाला था, तो उन्होंने समाज के सबसे निचले वर्ग के लोगों को गरिमापूर्ण जीवन मुहैया कराने के विचार को समझ लिया था.
इस वजह से उनका जोर स्वच्छ भारत, हर घर नल से जल और बिजली जैसी योजनाओं पर रहा. इसके साथ ही नीति आयोग गरीबी को गरीबी रेखा से नहीं मापता बल्कि वे इसे बहुआयामी गरीबी (मल्टी डाइमेंशनल पॉवर्टी) कहते हैं. यह स्वागत योग्य कदम है.
मौजूदा अनुमान के मुताबिक 11.3 फीसदी भारतीय बहुआयामी गरीबी रेखा से नीचे हैं. हमें यह लक्ष्य रखना चाहिए कि इस गरीबी रेखा से नीचे या तो लोग नहीं हों या फिर दो फीसदी से अधिक भारतीय ना हों. इस तरह हर भारतीय के पास उपलब्ध अवसरों से लाभ उठाने का उचित मौका होगा.
दूसरा मुद्दा शिक्षा है. कोई भी देश अच्छी शिक्षा प्रणाली के बगैर विकसित नहीं हुआ है. शिक्षा में हमने दाखिला लेने की समस्या सुलझाई है. लेकिन दाखिला लेने और ग्रैजुएशन के बीच जो होता है या नहीं होता है, उस पर ध्यान नहीं दिया गया है. इससे एक तरफ सिखाने और सीखने के बीच के बड़े अंतर का पता चलता है जबकि दूसरी तरफ युवाओं में भारी बेरोजगारी का पता चलता है.
हाल ही में हुए एक सर्वे से पता चला है कि 14 से 18 साल के 25 फीसदी लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा में दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ सकते. इनमें से 50 फीसदी से भी कम दूसरी कक्षा के गणित का सवाल हल नहीं कर सके. यह दुखद स्थिति है इस देश के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है.
पाठ्यक्रम से लेकर शिक्षाशास्त्र और शिक्षण तक शिक्षा की गुणवत्ता दाखिले के अनुरूप नहीं है. यह शिक्षा के सभी स्तरों प्राथमिक, सेकेंडरी और कॉलेज तक है. कॉलेज स्तर पर शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे रोजगार मिल सके.
हाल में जारी हुए डेटा से पता चलता है कि युवाओं में बेरोजगारी 16.5 फीसदी है. आज से पांच साल बाद हमें युवाओं में बेरोजगारी को कर पांच फीसदी से अधिक नहीं होने देने का लक्ष्य रखना होगा.
इसे जल्दी से बदलने की जरूरत है. अगर हम इसे गंभीरता से लेंगे तो AI इसमें मदद कर सकता है. कुछ महीनों में, हमारे बच्चों की पहुंच ऐसी उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक हो सकती है, जो उनकी समझ के अनुकूल हो. उनकी स्थानीय भाषा में निशुल्क रूप से घरों तक शिक्षा पहुंच सके.
यह संभव है क्योंकि भारत में दुनिया का सबसे बेहतरीन सार्वजनिक डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर है. मुझे उम्मीद है कि सरकार, एनजीओ और भारत की टेक कंपनियां हर छात्र तक ये सुविधा पहुंचाने के लिए एक साथ आगे आएं. मैं AI को फ्री इंटेलेक्चुअल एनर्जी के स्रोत के रूप में देखता हूं. आइए, इसके दरवाजे हमारे युवाओं के लिए खोल दें.
तीसरा, भारत के सबसे दूरदराज के गांवों तक सर्वोत्तम हेल्थकेयर कैसे पहुंचाएं, ये अगली सबसे बड़ी चुनौती होगी. मानव क्षमता और मानव पूंजी के बीच प्रत्यक्ष संबंध को समझने में भारत को देरी हुई है. हमारी सबसे बड़ी क्षमता को हमारी सबसे बड़ी पूंजी में तब्दील करने के लिए शिक्षा के साथ हेल्थकेयर सबसे जरूरी है.
हमें अगले पांच सालों में ये दो लक्ष्य हासिल करने हैं.
- शिशु मृत्यु दर को 25 से घटाकर 5 तक लाना है.
- हमने आजादी के समय से लेकर अब तक हमारी जीवन प्रत्याशा को बढ़ाकर 32 साल करने में उल्लेखनीय प्रगति की है.
लेकिन अब हमें जीवन प्रत्याशा पर ही नहीं बल्कि स्वस्थ जीवन प्रत्याशा पर भी ध्यान केंद्रित करना है. भारत कई बीमारियों का गढ़ है. मुझे लगता है कि शिक्षा की तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी AI वरदान साबित हो सकता है. इस वजह से हमें भारत के सबसे दूरस्थ स्थानों तक गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक चिकित्सा मुहैया कराने की जरूरत है.
चौथा, 'मेक इन इंडिया' से हमें भारत में 'मेक बेटर देन द बेस्ट' तक बढ़ना चाहिए. इस तरह हमें वैश्विक मानक स्थापित करने चाहिए. उदाहरण के लिए, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरियां हैं. हमारे कुछ बंदरगाह सबसे आधुनिक और हमारे एयरपोर्ट्स विश्वस्तरीय हैं. इस सदी के अंत तक आपमें से कितने लोगों ने सोचा है कि भारत ऑटोमोबाइल का निर्यात करेगा और सबसे उच्च गुणवत्ता के स्मार्टफोन का उत्पादन करेगा?
'चाइना + वन' जैसी स्ट्रैटेजी और 'मेक इन इंडिया' जैसी नीतियों की वजह से हमारा समय बदला है और जो हमें 'मेक इन इंडिया' से 'मेक बेटर देन द बेस्ट इन इंडिया' तक लेकर जा सकता है. हम सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में प्रवेश करने जा रहे हैं.
मुझे लगता है कि हम इंडियन मैन्युफैक्चरिंग के सुनहरे युग के मुहाने पर खड़े हैं. आज वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का 3 फीसदी से अधिक भारत में मैन्युफैक्चर होता है जबकि चीन में यह 28 फीसदी से थोड़ा अधिक है.
अगले पांच सालों में हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में हमारी भागीदारी 8 फीसदी हो. याद रखें, 1995 में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी सिर्फ तीन फीसदी थी.
आखिर में, हम जीडीपी के मामले में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं. लेकिन तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनना ही काफी नहीं है. हमें एक महान राष्ट्र भी बनना है.
हम आर्थिक तौर पर प्रगति कर सकते हैं लेकिन हमारे व्यवहार और चरित्र में पतन की ओर नहीं जा सकते. क्या हम यह जाने बगैर एक महान राष्ट्र बन सकते हैं कि हमें सड़क के किस तरह गाड़ी चलानी है? हर साल, लगभग 10 हजार भारतीयों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत होती है, जिसकी वजह सड़क पर गलत दिशा में गाड़ी चलाना है.
क्या हमारे शहरों के आसपास बन रहे कूड़े के ढेर के साथ महान राष्ट्र बन सकते हैं. क्या हम एक महान राष्ट्र बन सकते हैं, जब हमारे अधिकतर शहरों का गला प्रदूषण से घूट रहा है.
क्या हम ऐसी स्थिति में महान राष्ट्र बन सकते हैं, जब मॉब लिंचिंग आम हो. क्या हम महान राष्ट्र बन सकते हैं, जब हमें दुनिया में रेप कैपिटल कहा जाए. साथ ही महिलाओं के साथ हिंसा रोजमर्रा का काम हो. क्या हम महान राष्ट्र बन सकते हैं, जब हमारी चुनावी फंडिंग पर सवाल खड़े कर दिए जाएं. क्या हम महान राष्ट्र बन सकते हैं, जब हम बहस को असहमति, असहमति को बेईमानी और बेईमानी को राजद्रोह में भ्रमित हो जाएं. क्या हम महान राष्ट्र बन सकते हैं, जब हम हमारी ही सरकार के डर के साए में जी रहे हैं.
ऐसे बहुत सारे कड़े सवाल हैं, जो यकीनन आप रोजाना अपने आप से पूछते होंगे. और मुझे लगता है कि आपमें से अधिकतर लोग इसका जवाब जानते हैं. नहीं.
इस तरह राष्ट्रनिर्माण हमारे चरित्र निर्माण के साथ-साथ चलता है. जब हम वैश्विक आर्थिक ताकत बनेंगे तो हमें सामाजिक और नैतिक तौर पर भी विकसित होना है. 20 साल पहले 2003 में अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कहा था, जो मेरे जेहन में बैठ गया. उन्होंने कहा था कि मुझे कोई संदेह नहीं है कि भारत का कद दुनिया में बढ़ेगा. भारत का कद दुनिया में छोटा नहीं रह सकता. आपको विशाल बनना पड़ेगा, लेकिन किस तरह का विशाल? आपको विशाल बनना पड़ेगा, अपनी तरह का अच्छा विशालकाय देश.
आप हमेशा की तरह अगले दो दिन अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े वक्ताओं को आप सुनेंगे. मैं आपको आमंत्रित करता हूं कि आप विचारों के इस त्योहार का आनंद लें. पूरा इंडिया टुडे ग्रुप यहां आपकी मेजबानी करेगा और हमारे साथ आपके ये दो दिन बेहतरीन होंगे. सम्मानित अतिथियों, अपना समय देने के लिए मैं आप सभी का आभार व्यक्त करता हूं.