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Wheat ban: गेहूं के निर्यात पर क्यों लगाई गई रोक, सरकार को कितनी जरूरत और किसानों पर क्या होगा असर?

Wheat price: गेहूं के निर्यात पर बैन से किसानों को दोहरी मार पड़ी है. दरअसल, सूखा पड़ने से दाने का आकार छोटा रहा, फसल कम हुई और अब निर्यात पर प्रतिबंध लगा है.

फाइल फोटो फाइल फोटो
मनजीत सहगल
  • चंडीगढ़,
  • 17 मई 2022,
  • अपडेटेड 8:24 AM IST
  • सरकार ने रोका गेहूं का निर्यात
  • किसानों पर पड़ी दोहरी मार

भारत ने गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी है. जानकारों का कहना है कि ये रोक इसलिए लगाई गई है क्योंकि देश में गेहूं का संकट हो गया है. ऐसा दावा किया जा रहा है कि सरकारी योजनाओं के लिए भी गेहूं कम पड़ने की आशंका है. केंद्र सरकार ने कहा कि भारत गेहूं का एक्सपोर्ट करके दुनिया भर का पेट भर रहा है और फिर अचानक दो दिन पहले गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी गई. इसलिए इसे गेहूं के संकट से जोड़कर देखा जा रहा है. 

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गेहूं के एक्सपोर्ट पर रोक से उपजे सवाल

क्या गेहूं के कम उत्पादन का अनुमान लगाने में देरी हो गई? क्या गेहूं की सरकारी खरीद करने में तेजी नहीं दिखाई गई? क्या पहले दुनिया के तमाम देशों को गेहूं के निर्यात में जल्दबाजी की गई? क्या अब गेहूं के निर्यात पर रोक लगने से किसानों का नुकसान होगा और क्या अब गेहूं का निर्यात रोकने के बावजूद आटा-बिस्किट-ब्रेड की महंगाई नहीं रुकेगी ?   

2010 के बाद आटे की कीमत आसमान पर 

जनवरी 2010 के बाद आटे की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई पर है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के मुताबिक, 9 मई को देश में एक किलो आटे की औसत कीमत 32.91 रुपये रही. अकेले एक साल में ही एक किलो आटे की कीमत 4 रुपये से ज्यादा बढ़ गई है. मुंबई समेत कई जगहों पर एक किलो आटा 49 रुपए किलो तक पहुंचने का दावा रहा. ऐसी परिस्थिति में देश में गेहूं और आटे की कीमत कंट्रोल करने के मकसद से रविवार को गेहूं के निर्यात पर रोक का फैसला हुआ, लेकिन तब देश में सबसे ज्यादा गेहूं उगाकर देने वाले पंजाब और हरियाणा के किसान ही सवाल उठाने लगे.   

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किसानों पर पड़ी दोहरी मार 

गेहूं के निर्यात पर बैन से किसानों को दोहरी मार पड़ी है. दरअसल सूखा पड़ने से दाने का आकार छोटा रहा, फसल कम हुई और अब निर्यात पर प्रतिबंध लगा है तो किसानों को प्रति क्विंटल 400 रुपए का नुकसान हो रहा है. कृषि एक्सपर्ट देवेंद्र शर्मा के मुताबिक, किसानों पर मौसम की मार पड़ी है, मार्च में तापमान बढ़ा तो उसके कारण शिवरिंग हुई है, हम जानते हैं पांच क्विटंल प्रति एकड़ का नुकसान हुआ है. हरियाणा में भी ऐसा हुआ है, यही लॉस देश के उत्पादन में दिखा है. 

सरकार ने घटाया उत्पादन का अनुमान  

सरकार ने पहले खुद अनुमान लगाया था कि 111 मिलियन टन से ज्यादा उत्पादन होगा. लेकिन अब इसे घटाकर 105 मिलियन टन कर दिया है. अनुमान है कि इस बार 45 लाख से 60 लाख टन गेहूं का उत्पादन कम होगा.

सरकार को कितनी है जरूरत? 

केंद्र सरकार को 26 मिलियन टन गेहूं की जरूरत तो सिर्फ पीडीएस के तहत जरूरतमंदों को अनाज देने के लिए चाहिए. साथ ही अप्रैल से सितंबर तक देश में पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के लिए 5.4 मिलियन टन गेहूं चाहिए. जबकि इस साल 14 मई तक सरकारी गोदाम में खरीदकर 18 मिलियन टन गेहूं ही आ पाया है. पिछले साल 37 मिलियन टन गेहूं सरकार खरीद चुकी थी. यानी सरकारी गोदाम में गेहूं कम आया है. क्योंकि कहा जा रहा है कि सरकारी एजेंसियों की जगह व्यापारियों ने पहले ही किसानों को 2015 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी से ज्यादा कीमत देकर गेहूं खरीद लिया था. 

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गेहूं के बदले गरीबों को मिलेगा चावल 

इसीलिए दावा है कि उत्तर प्रदेश समेत आठ राज्यों में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत दिए जाने वाले राशन में केंद्र की तरफ से अब गेहूं की जगह भी चावल ही दिए जाने का फैसला हुआ है. यानी गेहूं पाने वाले गरीब आम आदमी पर असर पड़ने वाला है. अब किसानों का दावा है कि उन्हें बहुत ज्यादा फायदा एमएसपी के मुकाबले नहीं मिला. फायदा तो व्यापारी पाए, जो एक्सपोर्ट बैन होने से देश की मार्केट में भी गेहूं बेचकर भी पैसे ज्यादा पाएंगे.   

सरकार क्या कदम उठा रही है? 

जून से सितंबर के बीच आठ राज्यों में पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत दिए जाने वाले गेहूं की सप्लाई को रोककर उसकी जगह भी चावल देंगे. साथ ही गेहूं उगाने वाले 6 बड़े राज्यों में 31 मई तक गेहूं की सरकारी खरीद की सीमा बढ़ा दी गई है. सरकारी खरीद में देखी जाने वाली गेहूं की क्वालिटी में भी छूट दी गई है और 13 मई से गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी गई है. 

 

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