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मणिपुर के हिंसा-ग्रस्त इलाकों से स्टारलिंक के सैटेलाइट-आधारित इंटरनेट डिवाइस जब्त किए जाने से सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं. सवाल उठ रहा है कि क्या स्टारलिंक भारत में बिना अनुमति के काम कर रही है? ये डिवाइस कहां से आए? और क्या स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का इस पर दिया गया जवाब सही है?
16 दिसंबर को भारतीय सेना की स्पीयर कॉर्प्स ने X पर एक फोटो पोस्ट की, जिसमें स्टारलिंक किट के साथ हथियार, बम और गोला-बारूद दिखाया गया. ये सामान मणिपुर के कई जिलों में सर्च ऑपरेशन के दौरान जब्त किया गया. डिफेंस सूत्रों के अनुसार, ये इंटरनेट डिवाइस पीपल्स लिबरेशन आर्मी ऑफ मणिपुर (PLA) के सदस्यों से मिले हैं. यह समूह म्यांमार में स्थित है और मणिपुर के मैतेई समुदाय के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग करता है.
यह पहली बार नहीं है जब स्टारलिंक सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर आया हो. इस महीने की शुरुआत में अंडमान और निकोबार पुलिस ने एक नोटिस जारी किया था, जब एक नाव से बड़ी मात्रा में म्यांमार से लाई गई मेथ और एक स्टारलिंक किट जब्त हुई थी. अधिकारियों ने इस किट के खरीदार, पेमेंट मेथड और रजिस्ट्रेशन डिटेल्स की जानकारी मांगी है.
हालांकि, डिवाइस की जब्ती का मतलब यह नहीं है कि स्टारलिंक का इंटरनेट भारत में एक्सेस किया जा सकता है. मणिपुर में हुई जब्ती पर मस्क ने कहा, 'यह गलत है. स्टारलिंक सैटेलाइट बीम्स भारत के ऊपर बंद हैं.'
आधिकारिक तौर पर स्टारलिंक भारत में उपलब्ध नहीं है. वास्तव में यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ऑपरेट नहीं करता. सबसे नजदीकी जगहें जहां इसे एक्सेस किया जा सकता है, वे हैं मलेशिया, इंडोनेशिया और यमन.
लेकिन स्टारलिंक की आधिकारिक स्थिति और वास्तविकता हमेशा मेल नहीं खाती. म्यांमार में जहां स्टारलिंक आधिकारिक रूप से उपलब्ध नहीं है, वहां यह बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, खासकर विद्रोही समूहों के इलाकों में जहां हजारों स्टारलिंक डिश ऑपरेट कर रहे हैं.
स्टारलिंक रूस और अधिकांश अफ्रीकी महाद्वीप में भी ऑपरेट नहीं करता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन जगहों पर सर्विस का उपयोग नहीं हो रहा. यूक्रेनी सेना ने बार-बार दावा किया है कि उन्होंने रूस के फ्रंटलाइन पर स्टारलिंक टर्मिनल्स देखे हैं.
इस साल की शुरुआत में Bloomberg News और Wall Street Journal की दो अलग-अलग रिपोर्ट्स में पाया गया कि स्टारलिंक टर्मिनल्स, रोअमिंग प्लान के साथ, अनऑथराइज्ड इलाकों में इस्तेमाल हो रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि स्टारलिंक काले बाजार में आसानी से उपलब्ध है, जो इसके दुरुपयोग को एक वैश्विक समस्या बनाता है. यह कंपनी की कंट्रोल क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है.
स्टारलिंक ने अभी तक अनऑथराइज्ड इलाकों में अपनी सेवाओं की उपलब्धता पर स्पष्टता नहीं दी है. हालांकि, इसे 'स्पिलोवर' कहा जाता है - एक ऐसी स्थिति जिसमें किसी सैटेलाइट कम्युनिकेशन रीजन के लिए तय बैंडविड्थ अनजाने में उसके क्षेत्र से बाहर भी पहुंच जाती है.
हालांकि, मलेशिया, इंडोनेशिया या मंगोलिया से बैंडविड्थ के स्पिलोवर को इतनी सरलता से नहीं समझा जा सकता.
Washington Post के अनुसार, US FCC ने UN रेगुलेटर को बताया कि स्टारलिंक इंडिविजुअल टर्मिनल्स को डिसेबल और कुछ इलाकों में सिग्नल को ब्लॉक कर सकता है. इसे 'जियोफेंसिंग' कहा जाता है.
कंपनी सैटेलाइट्स के पिंग्स से एक्टिव डिश की लोकेशन भी ट्रैक कर सकती है. और ऐसा उसने पहले भी किया है. अगस्त में कई यूक्रेनी सैनिकों ने बताया कि उनके स्टारलिंक टर्मिनल्स रूस के Kursk में काम नहीं कर रहे थे. इसके पीछे की वजह जियोफेंसिंग हो सकती है.
कीमत
स्टारलिंक अलग-अलग प्लान और डिवाइस ऑफर करता है. मलेशिया में इसका बेस मॉडल जिसे Standard Actuated किट कहते हैं, करीब MYR 1,700 या 32,190 रुपये में (छूट के बाद) उपलब्ध है. इसकी असली कीमत 43,800 रुपये है.
रेजिडेंशियल यूसेज के लिए यूजर्स को हर महीने MYR 220 या 4,190 रुपये अतिरिक्त देने होते हैं. मलेशियाई यूजर्स के लिए ROAM प्लान की कीमत MYR 700 या 13,340 रुपये प्रति महीना है. कुछ विदेशी वेबसाइट्स भारत में लगभग 49,000 रुपये में एक स्टैंडर्ड स्टारलिंक टर्मिनल डिलीवर करने का दावा करती हैं.