
मेरा उद्देश्य हमेशा से उनका विश्वास जीतना रहा है. इसका सीधा सा कारण ये है कि अगर मैं अन्य लोगों का विश्वास जीतने में सफल रहा लेकिन भारत के सबसे महान शख्स का विश्वास नहीं जीत पाया तो ये मेरे लिए दुखद होगा... नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने महात्मा गांधी को लेकर ये बात कही थी.
हालांकि, बोस और गांधी कई मौकों पर एक दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आए. 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुनाव में बोस ने महात्मा गांधी के समर्थित उम्मीदवार को हराकर तो दिया था लेकिन गांधी और उनके समर्थकों से बढ़ती दूरी और कड़वाहट की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. लेकिन इसके बावजूद दोनों एक दूसरे का भरपूर सम्मान करते थे. ये बात हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने हाल में कहा था कि नेताजी और महात्मा गांधी के संबंधों को रियलिटी चेक देने की जरूरत है.
आरएन रवि ने क्या कहा था?
तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने चेन्नई में नेताजी की 127वीं जयंती के मौके पर एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि अगर आप महात्मा गांधी के नेशनल फ्रीडम मूवमेंट के इतिहास को उठाकर देखें तो पता चलेगा कि यह आंदोलन ज्यादा प्रभावी नहीं था. लेकिन तथ्य ये है कि एक भारतीय (नेताजी) देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था. उन्होंने भारतीयों में आजादी को लेकर एक नई ललक पैदा की, जिस वजह से अंग्रेजों को यह एहसास हुआ कि वे अब भारत में सुरक्षित नहीं हैं.
उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली और पश्चिम बंगाल के कार्यवाहक गवर्नर पीबी चक्रबर्ती के बीच की बातचीत का हवाला देते हुए कहा था कि जब गवर्नर ने एटली से पूछा कि आखिर ब्रिटिशों ने भारत क्यों छोड़ा तो इस पर एटली ने कहा कि अंग्रेजों को ये डर था कि वे अब भारत में सुरक्षित नहीं हैं.
आरएन रवि ने कहा था कि गांधी के असहयोग आंदोलन का प्रभाव बहुत कम था. नेताजी के प्रतिरोध की वजह से अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा था.
जब गांधी से पहली बार मिले थे नेताजी
महात्मा गांधी और नेताजी के बीच मतभेद 1921 के उस वाकये के बाद ज्यादा उभरकर सामने आए, जब नेताजी ने गांधी से पूछा था कि देश की आजादी को लेकर उनकी क्या योजनाएं हैं. उस समय 24 साल के बोस ने गांधी के बारे में कहा था कि उनके (गांधी) पास देश की आजादी को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है.
दोनों की पहली मुलाकात के सात साल बाद सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी को खुलेआम चुनौती दी थी. दरअसल, 1928 में कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गांधी ने एक प्रस्ताव पेश किया था. ये प्रस्ताव भारत को डोमिनियन स्टेटस का दर्जा देने से जुड़ा था. डोमिनियन स्टेटस पूर्ण स्वतंत्रता नहीं देता था. इसलिए सुभाष चंद्र बोस ने इसका विरोध किया था.
1929 के लाहौर सत्र के बाद गांधी ने नेताजी को लिखा था कि तुम्हें समझना मुश्किल होता जा रहा है. मैं चाहता हूं कि आप मेरी उन उम्मीदों पर खरा उतरे, जो देशबंधु ने आपके बारे में मुझे बताई थी. उन्होंने मुझे बताया था कि आप एक बुद्धिमान, तेजस्वी और दृढ़ इरादे वाले शख्स हैं.
जब नेताजी बने गांधी के कटु आलोचक
आगामी सालों में कई मौकों पर बोस और गांधी के बीच विवाद सामने आए. बाद में नेताजी सुभाष बोस जेल भी गए और 1932 में वह निर्वासित होकर यूरोप चले गए. यूरोप में निर्वासन के दौरान उनकी मुलाकात कई यूरोपीय नेताओं और भारतीय छात्रों से हुई. वह बेनिटो मुसोलिनी सेभी मिले और उन्होंने नाजीवाद और फासीवाद का उभार भी देखा.
यह वह समय था, जब उनके नजरिए का विस्तार हुआ और उन्होंने सिस्टेमैटिक तरीके से योजनाएं तैयार की और वो भी सिर्फ गांधी की राजनीति की और पुरजोर तरीके से आलोचना करने के लिए.
नेता के तौर पर गांधी असफल हुए
गांधी को आंख मूंदकर फॉलो करने के आरोपों पर जवाब देते हुए नेताजी ने 1934 में कहा था कि महात्मा गांधी के अनुयायियों के प्रभुत्व वाली कांग्रेस कार्यकारी समिति में मेरा कोई विश्वास नहीं है. उन्होंने डॉ. बिधान चंद्र रॉय की यह कहकर आलोचना की थी कि उनकी पार्टी ने सांप्रदायिक अवॉर्ड को लेकर महात्मा गांधी का समर्थन कर बंगाल को नुकसान पहुंचाया है.
1933 में जब गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को रद्द कर दिया, तब बोस और विट्ठलभाई पटेल ने संयुक्त रूप से बयान जारी कर उन पर निशाना साधा था. इसमें कहा गया था कि हमारा विचार है कि एक नेता के तौर पर महात्मा गांधी असफल हो गए हैं. गांधी फर्नीचर की तरह बेकार हैं. हालांकि, उन्होंने अपने समय में अच्छी सेवा की लेकिन अब वो बाधा बन गए हैं.
कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर 1938 में बोस के चुनाव को गांधी का एक अस्थाई कदम माना गया. गांधी ने वल्लभभाई पटेल को लिखे पत्र में कहा था कि मैंने देखा है कि सुभाष भरोसेमंद नहीं हैं. लेकिन ऐसा कोई नहीं है, जो अध्यक्ष बन सके. उस समय तक गांधी एक तरह से जवाहरलाल नेहरू को भारत के नेता के तौर पर तैयार कर चुके थे और उन्होंने नेहरू को लेकर अपनी पसंद स्पष्ट कर दी थी.
दूसरे विश्वयुद्ध ने बोस और गांधी के मतभेदों को और बढ़ा दिया. बोस ने अपनी खुद की पार्टी बना ली. बोस ने 1939 में विश्वयुद्ध में ब्रिटेन का समर्थन करने के गांधी के विचार को खारिज कर दिया था.
भारत से बोस की रवानगी
बोस 1940 में जेल गए और अगले साल 1941 में वह जर्मनी चले गए. बोस अंग्रेजों के खिलाफ सेना तैयार करना चाहते थे. लेकिन गांधी का विचार था कि भारत आजादी हासिल करने के लिए विदेशी ताकत की मदद नहीं लेगा. हालांकि, गांधी ने भारत को आजाद कराने के बोस के प्रयासों की सराहना की थी.
अबुल कलाम आजाद ने अपनी किताब 'इंडिया विन्स फ्रीडम' में कहा था कि मैंने देखा कि सुभाष बोस ने जर्मनी जाने के बाद गांधीजी पर अच्छी छाप छोड़ी थी. गांधी पहले बोस की कई गतिविधियों के खिलाफ थे लेकिन अब मैंने उनके नजरिए में बदलाव देखा है. बोस ने गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन किया था लेकिन उन्हें डर था कि गांधी और कांग्रेस कहीं आजादी को लेकर अंग्रेजों से समझौता ना कर ले.
नेताजी और फादर ऑफ द नेशन
दोनों के बीच तमाम विरोधाभासों के बावजूद बोस एक तरह से गांधी का बहुत सम्मान करते थे. बैंकॉक से लौटने के बाद नेताजी ने कहा था कि आज के दिन दुनियाभर में फैले भारतीय महान नेता महात्मा गांधी की 75वीं जयंती मना रहे हैं. ऐसे अवसर पर उस शख्स के जीवन से सीखने की जरूरत है, जिनका हम सम्मान करते हैं और प्यार करते हैं.
यह भी भूलने वाली बात नहीं है कि बोस ही वह पहले शख्स थे, जिन्होंने छह जुलाई 1944 में गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी थी. वह गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी को भारतीयों की मां कहकर बुलाते थे. 1944 में ब्रिटिश कस्टडी में कस्तूरबा की मौत के बाद उन्होंने गहरी संवेदना भी जताई थी.
'मुझे लगता है बोस अभी जीवित हैं'
वहीं, 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में नेताजी की मौत की खबर जब गांधी को पता चली तो उन्होंने कहा था कि मुझे लगता है कि बोस अभी भी जीवित हैं और वह सही समय आने पर सामने आएंगे. बोस ने बेशक कई मौकों पर गांधी की आलोचना की हो लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका को वो सम्मान करते रहे.