
प्रयागराज, एक ऐसा शहर जो राजनीति, शिक्षा और साहित्य का केंद्र रहा उसी प्रयागराज में फ़रवरी महीने में चली दिनदहाड़े गोलियों की आवाज़ ने पूरे यूपी को हिला कर रख दिया. हम बात कर रहे हैं राजू पाल हत्याकांड में गवाह रहे उमेश पाल की हत्या की. जिसमें 24 फरवरी दिन शुक्रवार को सरेराह उमेश की हत्या कर दी जाती है. इस पूरे हत्याकांड को बेहद नाटकीय ढंग से अंजाम दिया जाता है. मौके पर सीसीटीवी में कैद हुई पूरी घटना की बात करें तो धूमनगंज में उमेश के घर के बाहर एक सफ़ेद रंग की क्रेटा कार रुकती है. जिससे आगे बैठा एक गनर और पीछे से उमेश पाल उतरता है. तभी अचानक बम और गोलियां चलने की आवाज आना शुरू हो जाती है. उमेश का गनर जमीन पर गिर जाता है, तो वहीं खुद उमेश को भी गोली लगती है.
जिसके बाद उमेश एक गली में भागता है, और पीछे-पीछे उसको मारने आए अपराधी खुलेआम तमंचा लहराते हुए दौड़ पड़ते हैं. कुछ ही देर में उमेश पाल की हत्या को अंजाम दे दिया जाता है. इस पूरी घटना के दौरान गुड्डू बमबाज इतने बम फोड़ देता है कि इलाका धुंआ धुंआ हो जाता है. धूमनगंज में चारों तरफ चीख और जान बचाकर भागते हुए लोग नजर आ रहे थे. दिन के उजाले में हुए इस हत्याकांड के बाद राज्य की पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठने लगते हैं. ऐसे में एसटीएफ मोर्चा संभालती है और एक के बाद एक उन आरोपियों की तलाश में निकल पड़ती है जिन्होंने 24 फरवरी को उमेश पाल की हत्या की.
एसटीएफ ने इस मामले में 13 अप्रैल को अतीक के बेटे असद और उसका एक ख़ास शूटर गुलाम का एनकाउंटर कर दिया. इसके अलावा दो और शूटर्स को एसटीएफ ने पहले ही एक मुठभेड़ में निपटा दिया था. ये सब कुछ अपनी गति से चल रहा था कि तभी एक बार फिर प्रयागराज में गोलियों की आवाज़ गूंजती है और इस बार गोलियों का शिकार बनता है अतीक अहमद और उसका भाई अशरफ. लगभग 50 दिन के अंतर में ये दूसरा बड़ा शूटआउट होता है.
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब शहर में इस तरह की गोलीबारी का दौर देखने को मिला हो, अब से 27 साल पहले भी दिनदहाड़े हुए एक हत्याकांड ने ना सिर्फ प्रयागराज (तब इलाहाबाद) बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में दहशत का माहौल पैदा कर दिया था. यह प्रयागराज का एक ऐसा केस भी रहा जिसमें अतीक अहमद का नाम नहीं आया था. इस पूरी घटना को किसी और ने ही अंजाम दिया था.
शूटआउट से रहा प्रयागराज का पुराना नाता
शूटआउट से प्रयागराज का पुराना नाता रहा है. जिसमें शहर ने एके-47 तक की आवाज़ को सुना है. बात 90 के दशक की है, जब इलाहाबाद में एक हाईप्रोफाइल मर्डर को अंजाम दिया गया. जिसके बाद ना सिर्फ यहां की राजनीतिक तस्वीर पर असर पड़ा, बल्कि यह अपने आप में एक ऐसा पेचीदा केस भी बना जिसमें 23 साल बाद कोई फैसला आ सका. हम बात कर रहे हैं 1996 में हुए जवाहर पंडित हत्याकांड की...
80 का दशक गुज़रते गुज़रते यूपी एक नए नाम का साक्षी बन रहा था. जवाहर यादव जो देवी का परम भक्त था, इसलिए पंडित के नाम से मशहूर हुआ. पंडित शराब और बालू के ठेकों पर कब्जा जमाता हुआ जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था वैसे-वैसे ही उसके दुश्मनों की लिस्ट भी बढ़ती जा रही थी. ये मामला तब और गंभीर हो गया जब उसने शराब के ठेकों पर भी अपनी दावेदारी पेश कर दी. पंडित का रुतबा और उसकी दौलत तेजी से बढ़ रह थी. कहा जाता है कि माफियाओं के बीच भी उसकी साख जमती जा रही थी.
हर बार किस्मत साथ दे ये ज़रूरी नहीं...
इस सब के बीच साल 1993 में झूंसी की जनता ने पंडित को अपना नेता चुनकर विधानसभा भेज दिया. समाजवादी पार्टी में जबरदस्त पकड़ रखने वाला जवाहर पंडित अब झूंसी सीट से विधायक था. दुश्मनी बढ़ने के साथ साथ अब उसके खिलाफ साजिशों का दौर भी चरम पर पहुंचने लगा. कई बार कोशिशें हुईं कि पंडित को अब निपटा दिया जाए, लेकिन किस्मत का धनी जवाहर हर बार बच निकला. लेकिन किस्मत भी हर बार साथ दे यह ज़रूरी नहीं है.
1995 में गेस्ट हाउस कांड होने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू था, यूपी विधानसभा भंग हो चुकी थी. लिहाजा जवाहर पंडित से विधायक रहते हुए मिली सुरक्षा भी ले ली गई. पंडित लगातार अपनी जान के खतरे को लेकर सुरक्षा की मांग करते रहे, लेकिन उन्हें सिक्योरिटी नहीं मिली. ऐसे में उनके साथ सुरक्षा के लिए उनका एक प्राइवेट गनर साथ चलने लगा. माना जाता है कि उनके विरोधियों ने हत्या के लिए यही समय सबसे सटीक माना जब पंडित बिना सिक्योरिटी के इधर से उधर जाने लगे थे.
कैसे दिया गया जवाहर पंडित की हत्या को अंजाम
13 अगस्त 1996... उस दिन मंगलवार था. जवाहर पंडित ने अपने विधानसभा क्षेत्र को घूमने का मन बनाया. जिसके बाद मारुति 800 कार में अपने प्राइवेट गनर कल्लन यादव और ड्राइवर गुलाब यादव के साथ जवाहर पंडित झूंसी के लिए घर से निकले. घर से थोड़ा दूर जाते ही गुलाब ने जवाहर को बताया कि शायद एक वैन उनकी गाड़ी का पीछा कर रही है. इस पर पंडित ने कहा कि ये सब राजकाज है, चुनावी मौसम है ये सब होता रहता है. घबराने की बात नहीं है. लेकिन गाड़ी जैसे ही सिविल लाइन की तरफ मुड़ी तो पीछे पीछे वो वैन भी उसी तरफ चल दी. सुभाष चौराहे तक पहुंचते पहुंचते जवाहर को अब किसी अनहोनी घटने का अंदेशा हो चुका था, इसलिए उन्होंने अपने ड्राईवर से गाड़ी भगाने के लिए कहा. लेकिन कॉफ़ी हाउस के पास एक कार ने पंडित की गाड़ी को ओवरटेक कर बीच सड़क पर गाड़ी रोक दी. और पीछा कर रही वैन पड़ोस में आकर लग गई.
हत्याकांड में इस्तेमाल हुई एके-47
यह सब इतनी तेजी से हुआ कि जब तक पंडित और कल्लन अपने हथियार तक हाथ ले जाते तब तक वैन में ही बैठे बदमाशों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. यह पहली बार था जब इलाहाबाद ने एके-47 की आवाज़ सुनी. डेढ़ मिनट तक चली इस गोलीबारी में एके-47 और ऑटोमैटिक रायफल से लेकर पिस्टल, रिवॉल्वर हर तरह के हथियार का इस्तेमाल हुआ. इस पूरे घटनाक्रम को जिसने भी देखा उसकी सांसें गले में ही अटक गईं. कुछ देर बाद जब बदमाश वहां से भाग गए तो लोगों ने पाया कि जवाहर पंडित गोलियों से छलनी, लहुलुहान पड़े हुए हैं. कार के पीछे आ रहा एक शख्स भी इस गोलीबारी का शिकार हुआ था.
23 साल बाद आया फैसला
इस हत्याकांड को लेकर जवाहर पंडित के भाई ने वहीं के करवरिया परिवार के तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करवाया, यही नहीं इस एफआईआर में दो और लोगों के नाम भी शामिल थे. यह मामला तब और बड़ा हो गया जब हत्याकांड की खबर सुनकर मुलायाम सिंह भी इलाहाबाद पहुंच गए. लंबे समय तक पुलिस के हाथ एक भी अपराधी नहीं लगा तो ऐसे में पुलिस की जमकर आलोचना होना शुरू हो गई. जिसके चलते कई आला अफसरों का तबादला तक कर दिया गया.
जवाहर यादव उर्फ पंडित की हत्याकांड के मामले में जिला अदालत ने 31 अक्टूबर 2019 को पूर्व सांसद कपिलमुनि करवरिया, पूर्व विधायक उदयभान करवरिया, सूरज भान करवरिया को दोषी करार दिया. यह फैसला 23 साल बाद आया था.