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गर्भपात मामलाः SC ने एम्स से मांगी मां और भ्रूण की हेल्थ रिपोर्ट, अब सोमवार को सुनवाई

अदालत ने एम्स को महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति का मूल्यांकन करने और यह पता लगाने के लिए भी कहा कि क्या महिला पोस्ट पॉर्टम डिप्रेशन से पीड़ित है और क्या भ्रूण की सुरक्षा के लिए कोई वैकल्पिक दवा उपलब्ध है. पीठ ने कहा कि यह कवायद आज की जा सकती है और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट 16 अक्टूबर को उसके समक्ष रखी जाएगी,

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
कनु सारदा
  • नई दिल्ली,
  • 13 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 10:39 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मां, भ्रूण की स्वास्थ्य स्थिति का पता लगाने के लिए एम्स बोर्ड से नई रिपोर्ट मांगी और यह भी जांच की कि क्या मां मानसिक, शारीरिक विकार से पीड़ित है और भ्रूण में कोई असामान्यताएं तो नहीं हैं. भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या यह सुझाव देने के लिए कोई सबूत है कि उसकी मानसिक बीमारी के इलाज के लिए निर्धारित दवाओं से पूर्ण अवधि की गर्भावस्था की निरंतरता खतरे में पड़ जाएगी.

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एम्स को दिए ये आदेश
अदालत ने एम्स को महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति का मूल्यांकन करने और यह पता लगाने के लिए भी कहा कि क्या महिला पोस्ट पॉर्टम डिप्रेशन से पीड़ित है और क्या भ्रूण की सुरक्षा के लिए कोई वैकल्पिक दवा उपलब्ध है. पीठ ने कहा कि यह कवायद आज की जा सकती है और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट 16 अक्टूबर को उसके समक्ष रखी जाएगी, जब मामले की अगली सुनवाई होगी.

24 सप्ताह की गर्भ अवधि पार कर चुकी है महिला
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत, विवाहित महिलाओं, बलात्कार से बचे लोगों और नाबालिगों सहित विशेष श्रेणियों के लिए गर्भावस्था को समाप्त करने की ऊपरी सीमा 24 सप्ताह है. चूंकि इस मामले में, याचिकाकर्ता वैधानिक 24 सप्ताह की अवधि पार कर चुकी थी, इसलिए उसे अपनी गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि महिला अपनी मांग पर अड़ी हुई है और अदालत को अब फैसला करना होगा क्योंकि मेडिकल बोर्ड की राय गर्भपात न करने की है. मामले में अब सोमवार को सुनवाई होगी. 

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अजन्में बच्चे के भी हैं अधिकार, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
बता दें कि, सुप्रीम कोर्ट ने एक विवाहित महिला की 26 हफ्ते की गर्भावस्था को समाप्त करने की मांग वाली याचिका पर गुरुवार को सुनवाई के दौरान कहा था कि गर्भ में पल रहे बच्चे को जन्म दिया जा सकता है. गर्भावस्था समाप्त करने की स्थिति में बच्चे के हार्ट को बंद (मारना) होगा. पीठ ने कहा था कि अभी बच्चा भले ही गर्भ में है, लेकिन उसके भी अधिकार हैं. कानून के मुताबिक 24 हफ्ते गर्भ में रहने के बाद अजन्मे बच्चे के भी अधिकार बहाल हो जाते हैं. 

एम्स के सामने गंभीर नैतिक दुविधा
CJI जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि गर्भवती महिला कहती है कि वह बच्चा नहीं चाहती है. सरकार बच्चे का पालन पोषण करे या उसे किसी समुचित दंपती को गोद दे दे. जब वो इसके लिए तैयार है तो फिर वह बच्चे को कुछ और हफ्तों तक अपनी कोख में क्यों नहीं रख सकती? फिर सी सेक्शन यानी सर्जरी से प्रसव करा सकती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि बच्चा एक वाइबल बच्चा है. एम्स के सामने एक गंभीर नैतिक दुविधा थी. अगर भ्रूण में बच्चे के हृदय का संचालन बंद नहीं किया जाता तो वह जीवित पैदा होगा. CJI ने कहा कि ये नाबालिग पर हिंसा या यौन हिंसा का मामला नहीं है.

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कोर्ट ने कहा था, हम बच्चे को नहीं मार सकते
26 सप्ताह की गर्भवती महिला पहले ही दो बच्चों की मां बन चुकी है. अब महिला तीसरी बार बच्चे को जन्म देने वाली है, लेकिन वह बच्चा नहीं चाहती हैं.  मेडिकल तरीकों का इस्तेमाल कर गर्भपात की अनुमति लेने पहुंची महिला को सुप्रीम कोर्ट से भी निराशा हाथ लगी है. गर्भ गिराने की अपील पर एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, हम किसी बच्चे को नहीं मार सकते. कोर्ट के निर्देश पर एम्स के मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि बच्चे की जान बचाई जा सकती है.

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