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फ्रांस से आए 5 राफेल विमान हाल ही में भारतीय वायु सेना के बेड़े में शामिल हुए थे. राफेल विमान फिर से चर्चा में आ गए हैं. इस बार चर्चा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट को लेकर है, जिसमें इस सौदे के लिए हुए ऑफसेट करार की प्रतिबद्धताओं को लेकर सवाल उठाए गए हैं.
मॉनसून सत्र के दौरान संसद में पेश कैग की रिपोर्ट में राफेल विमान के ऑफसेट करार की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में दसॉल्ट एविएशन को नाकाम बताया गया है. कैग के मुताबिक दसॉल्ट एविएशन और एमबीडीए को स्वदेशी कावेरी जेट इंजन के निर्माण के लिए उच्च तकनीकी का हस्तांतरण करना था. लेकिन इन कंपनियों ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को करार के मुताबिक उच्च तकनीकी का हस्तांतरण नहीं किया है.
कैग ने कहा है कि रक्षा मंत्रालय को नीति की समीक्षा करनी चाहिए. कैग की ओर से कहा गया है कि साल 2005 से मार्च 2018 तक विदेशी कंपनियों के साथ कुल 66427 करोड़ रुपये के 48 ऑफसेट अनुबंधों पर हस्ताक्षर हुए. इन सौदों के लिए 19223 करोड़ रुपये के ऑफसेट दायित्वों का निर्वाह किया जाना था, लेकिन 59 फीसदी (11396 करोड़ रुपये के) दायित्वों का ही निर्वाह किया गया. इनमें से भी 5457 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धताएं ही स्वीकार की गईं.
कैग ने कहा है कि विदेशी कंपनियों को अगले छह साल में लगभग 55 हजार करोड़ रुपये के ऑफसेट दावे पूरे करने हैं. हर साल 1300 करोड़ रुपये की ऑफसेट प्रतिबद्धताएं ही अभी पूरी हो पा रही हैं. कैग ने इस रफ्तार को देखते हुए छह साल में 55 हजार करोड़ रुपये की ऑफसेट प्रतिबद्धताओं की पूर्ति को बड़ी चुनौती माना है.
गौरतलब है कि दसॉल्ट एविएशन को ऑफसेट प्रतिबद्धताओं के तहत भारतीय कंपनियों से लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के सौदे करने थे. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक दसॉल्ट ने ऑफसेट प्रतिबद्धताओं का करीब 30 फीसदी ही अब तक निर्वहन किया है. कैग की यह रिपोर्ट 23 सितंबर को संसद में पेश हुई.