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'सनातन धर्म राष्ट्र और परिवार के प्रति कर्तव्य, इसे क्यों नष्ट करना', मद्रास HC की अहम टिप्पणी

तमिलनाडु के तिरुवरुर जिले के एक सरकारी कॉलेज ने एक सर्कूलर जारी किया था, जिसमें छात्रों से तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री अन्नादुराई की जयंती के अवसर पर "सनातन का विरोध" विषय पर अपने विचार साझा करने का अनुरोध किया गया है. इसे मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. इसी पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है.

मद्रास हाईकोर्ट मद्रास हाईकोर्ट
नलिनी शर्मा
  • चेन्नई,
  • 16 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 1:18 PM IST

डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन के बयान के बाद से ही सनातन धर्म को बयानबाजी का दौर जारी है. जहां एक तरफ उदयनिधि समेत अन्य डीएमके नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है तो वहीं एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि सनातन धर्म शाश्वत कर्तव्यों का एक समूह है, जिसे कई स्रोतों से एकत्र किया गया है. इसे एक विशिष्ट साहित्य में नहीं खोजा जा सकता है.

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दरअसल, तमिलनाडु के तिरुवरुर जिले के एक सरकारी कॉलेज ने एक सर्कूलर जारी किया था, जिसमें छात्रों से तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री अन्नादुराई की जयंती के अवसर पर "सनातन का विरोध" विषय पर अपने विचार साझा करने का अनुरोध किया गया है. सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस सर्कूलर को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. इसी पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एन शेषशायी की एकल पीठ ने सनातन धर्म पर अहम टिप्पणी की है.

हाईकोर्ट ने कहा कि हम सनातन धर्म पर अत्यधिक मुखर और शोर-शराबे वाली बहसों के प्रति सचेत हैं. सनातन धर्म शाश्वत कर्तव्यों का एक समूह है जिसे कई स्रोतों से लिया गया है. सनातन धर्म में राष्ट्र, राजा, प्रजा के प्रति कर्तव्य, अपने माता-पिता और गुरुओं के प्रति कर्तव्य, गरीबों की देखभाल आदि की बात की गई है. हैरानी है कि इन कर्तव्यों को क्यों नष्ट किया जाना चाहिए?

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'क्या राष्ट्र की सेवा करना कर्तव्य नहीं है'

कोर्ट ने कहा कि चुने गए विषय का इन कर्तव्यों के स्तर पर परीक्षण किया जाता है, तो इसका मतलब यह होगा कि ये सभी कर्तव्य नष्ट होने योग्य हैं. क्या एक नागरिक को अपने देश से प्यार नहीं करना चाहिए? क्या उसका अपने राष्ट्र की सेवा करना कर्तव्य नहीं है? क्या माता-पिता की परवाह नहीं की जानी चाहिए? जो कुछ भी हो रहा है, उसके प्रति वास्तविक चिंता के साथ, यह कोर्ट इस पर विचार करने से खुद को रोक नहीं सकी.

'छुआछूत अब बर्दाश्त नहीं'

कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि एक विचार ने जोर पकड़ लिया है कि सनातन धर्म पूरी तरह से जातिवाद और छुआछूत को बढ़ावा देने वाला है. लेकिन छुआछूत किसी भी तरह से अब बर्दाश्त नहीं की जा सकती. सनातन धर्म के भीतर या बाहर छुआछूत अब संवैधानिक नहीं हो सकती, हालांकि दुख की बात है कि ऐसा अब भी हो रहा है. जब धर्म से संबंधित मामलों में अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इससे किसी को ठेंस न पहुंचे. अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब हेट स्पीच नहीं हो सकती.

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