
Sedition Law India: आईपीसी की धारा 124A, जो देशद्रोह या राजद्रोह को अपराध बनाती है, उसके गलत इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में इस कानून का बचाव करती रही सरकार का अब कहना है कि उसने इस कानून के प्रावधानों पर विचार करने का फैसला लिया है.
कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले निर्देश के बाद, मंत्रालय ने इस कानून के प्रावधानों पर विचार और जांच करने का फैसला लिया है. उन्होंने बताया कि सरकार ने अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर दे दिया है.
सरकार क्या चाहती है?
- सुप्रीम कोर्ट में धारा 124A की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. चीफ जस्टिस एनवी रमणा, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच इस पर सुनवाई कर रही है.
- अब तक सुप्रीम कोर्ट में सरकार राजद्रोह कानून का बचाव कर रही थी. सरकार ने हलफनामा दायर कर कहा था कि इस कानून पर पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं है.
- इतना ही नहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ये भी कहा था कि 1962 में संविधान बेंच के फैसले के मुताबिक इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के उपाय किए जा सकते हैं. सरकार ने इसके लिए 1962 केदारनाथ सिंह बनाम बिहार सरकार मामले का जिक्र किया था.
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क्या खत्म नहीं होगा राजद्रोह कानून?
- राजद्रोह कानून के गलत इस्तेमाल को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. पिछले साल जुलाई में चीफ जस्टिस रमणा ने कहा था कि 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत क्यों है?
- उस वक्त सीजेआई रमणा ने कहा था कि ये अंग्रेजों का बनाया कानून है, जिसे स्वतंत्रता की लड़ाई को दबाने के लिए लाया गया था. तब अटॉर्नी जरनल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि इस कानून को निरस्त करने की बजाय गाइडलाइन बनाई जानी चाहिए, ताकि इसका कानूनी मकसद पूरा हो सके.
- अब फिर से सरकार शुरू में तो इस कानून बचाव कर रही थी, लेकिन अब थोड़ा नरम हुई है. कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि सरकार इस कानून पर फिर से विचार करेगी और इसमें आज की जरूरत के हिसाब से जरूरी बदलाव करेगी.
- रिजिजू ने कहा कि देश की संप्रभुता और अखंडता सबसे ऊपर है और ये सरकार और सभी के लिए सबसे जरूरी है. इसलिए इस कानून पर पुनर्विचार करते समय इसके सभी प्रावधानों का ध्यान रखा जाएगा.
- रिजिजू ने ये भी दावा किया कि मौजूदा सरकार के समय इस कानून का इस्तेमाल देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरा डालने वालों और सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करने वालों के खिलाफ हुआ है. उन्होंने ये भी कहा कि हम कानून के दुरुपयोग करने में विश्वास नहीं रखते हैं.
- रिजिजू ने ये भी साफ कर दिया कि इस कानून पर विचार होगा और जांच होगी और इसमें आज की जरूरत के हिसाब से बदलाव भी होगा. इससे ये भी साफ होता है कि सरकार कानून को खत्म करने के मूड में नहीं है.
लेकिन ये कानून है क्या?
- भारतीय दंड संहिता की धारा 124A में राजद्रोह या देशद्रोह का उल्लेख है. ये धारा कहती है, 'अगर कोई व्यक्ति बोलकर या लिखकर या इशारों से या फिर चिह्नों के जरिए या किसी और तरीके से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने की कोशिश करता है या असंतोष को भड़काने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह का आरोपी है.'
- ये एक गैर-जमानती अपराध है और इसमें दोषी पाए जाने पर तीन साल की कैद से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है. साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.
- अक्सर 'राजद्रोह' और 'देशद्रोह' को एक ही मान लिया जाता है, लेकिन जब सरकार की मानहानि या अवमानना होती है तो उसे 'राजद्रोह' कहा जाता है और जब देश की मानहानि या अवमानना होती है तो उसे 'देशद्रोह' कहा जाता है. अंग्रेजी में इसे Sedition कहते हैं. दोनों ही मामलों में धारा 124A का इस्तेमाल होता है.
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क्या है इस कानून का इतिहास?
- सबसे पहले ये कानून इंग्लैंड में आया था. 17वीं सदी में जब इंग्लैंड में वहां की सरकार और साम्राज्य के खिलाफ आवाजें उठने लगीं तो अपनी सत्ता बचाने के लिए राजद्रोह का कानून लाया गया. यहीं से ये कानून भारत में आया.
- भारत में ब्रिटेन के कब्जा करने के बाद थॉमस मैकॉले को इंडियन पीनल कोड यानी आईपीसी का ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी मिली. 1860 में आईपीसी को लागू किया गया. हालांकि, उस वक्त इसमें देशद्रोह का कानून नहीं था.
- बाद में जब अंग्रेजों को लगा कि भारतीय क्रांतिकारियों को शांत करने का कोई और उपाय नहीं बचा है तो उन्होंने आईपीसी में संशोधन किया और इसमें धारा 124A को जोड़ा. आईपीसी में ये धारा 1870 में जोड़ी गई.
- इस धारा का इस्तेमाल स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने और सेनानियों को गिरफ्तार करने के लिए किया जाने लगा. इसका इस्तेमाल महात्मा गांधी, भगत सिंह और बाल गंगाधर तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ हुआ.
- महात्मा गांधी को जब इस धारा के तहत गिरफ्तार किया गया, तब उन्होंने कहा, 'स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करने के लिए जो कानून बनाए हैं, उनमें ये सबसे हास्यास्पद और डरावना है. अगर किसी को सरकार की किसी बात से परेशानी है तो उसके पास इसे व्यक्त करने की आजादी होनी चाहिए. उसे ये आजादी तब तक होनी चाहिए, जब तक वो अपनी किसी बात से नफरत या हिंसा नहीं भड़काता.'
इंदिरा गांधी की सरकार में हुआ बड़ा बदलाव
- 1947 में आजादी मिलने के बाद कई नेताओं ने देशद्रोह के कानून को हटाने की बात कही. लेकिन जब भारत का अपना संविधान लागू हुआ तो उसमें भी धारा 124A को जोड़ा गया.
- 1951 में जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत बोलने की आजादी को सीमित करने के लिए संविधान संशोधन लाया, जिसमें अधिकार दिया गया कि बोलने की आजादी पर तर्कपूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सकता है.
- 1974 में इंदिरा गांधी सरकार में इस कानून से जुड़ा बड़ा बदलाव हुआ. इंदिरा गांधी की सरकार में देशद्रोह को 'संज्ञेय अपराध' बनाया गया. यानी, इस कानून के तहत पुलिस को किसी को भी बिना वारंट के पकड़ने का अधिकार दे दिया गया.
इस कानून का विरोध क्यों?
- इस कानून का विरोध करने वालों का तर्क है कि सरकार इसका गलत इस्तेमाल कर रही है. सरकार अपने विरोधियों पर इस कानून का इस्तेमाल कर रही है. उनका तर्क ये भी है कि जो भी सरकार के खिलाफ कुछ बोलता है तो उस पर देशद्रोह का केस लगा दिया जाता है.
- विरोध करने के पीछे एक कारण ये भी है कि इस केस में गिरफ्तारियां तो बहुत होती हैं, लेकिन दोषी बहुत कम ही साबित हो पाते हैं. केंद्र सरकार की एजेंसी NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2014 से धारा 124A के तहत दर्ज केस का रिकॉर्ड रख रही है.
- NCRB के मुताबिक, 2014 से लेकर 2020 तक राजद्रोह के 399 मामले दर्ज किए गए हैं. इन मामलों में 603 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. जबकि, महज 13 लोगों पर ही दोष साबित हो सका है. जानकार मानते हैं कि जब ज्यादातर लोग छोट रहे हैं तो इसका मतलब है कि मुकदमे गलत दायर हो रहे हैं.
जब अदालतों ने इस कानून पर उठाए सवाल
- आजादी के बाद 1951 में तारा सिंह गोपी चंद मामले में पहली बार किसी अदालत ने इस कानून पर सवाल उठाए. तब पंजाब हाईकोर्ट ने धारा 124A को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध माना था.
- बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर भाषण देने पर राज्य सरकार ने राजद्रोह का केस दर्ज किया. इस मामले में 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना कर देने भर से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता. इस मामले में तभी दंडित किया जा सकता है जब उससे हिंसा भड़कती हो. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को आज भी धारा 124A से जुड़े मामलों के लिए मिसाल के तौर पर लिया जाता है.
- दिवंगत पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ हिमाचल प्रदेश में देशद्रोह का केस दर्ज किया गया था. जून 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को निरस्त कर दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ सिंह मामले का जिक्र करते हुए कहा था कि हर नागरिक को सरकार की आलोचना करने का हक है, बशर्ते उससे कोई हिंसा न भड़के.