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1 जनवरी वाला नया साल किसका? पढ़ें, सुधांशु त्रिवेदी की बधाई को डिकोड करती ये रिपोर्ट

सुधांशु त्रिवेदी ने जिन पंक्तियों में नए साल की बधाई दी है, असल में वह इस ग्रेगेरियन कैलेंडर का पूरा इतिहास है जो बताता है कि, दिन-तारीख तय करने का यह काम इतना भी आसान नहीं रहा है कि, कैलेंडर बदला और तारीख बदल गई. समय-समय पर इसकी खामियां सामने आईं, उन्हें दूर किया गया और तब ही इसे अपनाया जा सका है.

पोप ग्रेगोरी XIII और बीजेपी प्रवक्ता राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी पोप ग्रेगोरी XIII और बीजेपी प्रवक्ता राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी
विकास पोरवाल
  • नई दिल्ली,
  • 02 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 6:20 PM IST

21वीं सदी बुधवार को अपने 25वें साल में प्रवेश कर गई. दिन बदला, माह और साल भी बदले और कैलेंडर में तारीख हो गई 1 जनवरी 2025. इस मौके पर दुनियाभर में जश्न का माहौल रहा. लोगों ने एक-दूसरे को बधाई और शुभकामनाएं दी इसके साथ ही उन्होंने आने वाले साल में तरक्की की कामना भी की. इसी बीच बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी बीजेपी मुख्यालय में नववर्ष की शुभकामनाएं दीं, लेकिन उनके अंदाज-ए-बयां ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है.  

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सुधांशु त्रिवेदी की नए साल की बधाई के मायने समझिए
बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने एक जनवरी को नए साल के मौके पर बेहद अनोखे अंदाज में बधाई दी. नववर्ष की बधाई देने का उनका ये अंदाज इतना अनोखा था कि वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया. सुधांशु त्रिवेदी ने बीजेपी हेडक्वार्टर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि दोस्तों, आज एक जनवरी है. मैं आप सभी को बधाई देना चाहता हूं कि रोमन देवता जैनूस के नाम पर, रोमन राजा नुमा मेम्फालस के द्वारा मूलत: प्रतिपादित के नाम पर, जूलियस सीजर द्वारा शुरू किए गए और पोप ग्रेगरी 13वें द्वारा 1582 में करेक्टेड और अंग्रेजों द्वारा 1752 में अंगीकृत इस अंग्रेजी नववर्ष के पहले दिन की आप सभी को बधाई.

क्या है कैलेंडर का पूरा इतिहास
सुधांशु त्रिवेदी ने जिन पंक्तियों में नए साल की बधाई दी है, असल में वह इस ग्रेगेरियन कैलेंडर का पूरा इतिहास है जो बताता है कि, दिन-तारीख तय करने का यह काम इतना भी आसान नहीं रहा है कि, कैलेंडर बदला और तारीख बदल गई. समय-समय पर इसकी खामियां सामने आईं, उन्हें दूर किया गया और तब ही इसे अपनाया जा सका है. आज भी ग्रेगेरियन कैलेंडर में सभी 12 महीनों के दिन समान नहीं है. इसमें एक महीना 31 का तो अगला 30 दिनों का है, फरवरी में तो दिनों की संख्या और भी कम है. इसे सिर्फ 28 दिन नसीब हुए हैं. हर चार साल में फरवरी में एक दिन बढ़ाया जाता है. तब यह 29 दिनों का महीना हो जाता है और इसे लीप ईयर कहा जाता है.

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आइये जानते हैं, उस कैलेंडर का पूरा इतिहास जिसे लगभग पूरी दुनिया में कामकाज के लिए अपनाया गया है.

रोमन में अतीत और भविष्य के देवता जानूस
प्राचीन रोमन धर्म और माइथॉलजी में एक प्रसिद्ध देवता हैं जानूस. वैसे इनका असली नाम इयानस है, क्योंकि प्राचीन रोमन में J कैरेक्टर कभी था ही नहीं, जब लिपियां बदलीं और लैटिन से निकलकर अंग्रेजी के 26 कैरेक्टर अपनाए गए, तब यही 'इयानस बदलकर जानूस या जैनूस या जैनस' बन गया. रोमन मिथकों में इस देवता को अंत और प्रारंभ का देवता भी कहा जाता है. यही देवता स्वयं तो वर्तमान है, लेकिन इसके दो चेहरे हैं जो एक-दूसरे से विपरीत दिशाओं में हैं. प्राचीन रोमन मिथकों में इसके एक तरफ के चेहरे को डार्क दिखाया जाता है, और दूसरी ओर का चेहरा उजला है. कई तस्वीरों में तो एक तरफ के चेहरे पर घनी दाढ़ी उगी मिलेगी तो दूसरा चेहरा युवा दिखाई देगा. ये दोनों ही बिंब भूतकाल और भविष्य काल के हैं. भूतकाल को डार्क और घनी दाढ़ी के जरिए दिखाया जाता है तो वहीं भविष्य को युवा और उजले रूप में दिखाया जाता है.

रोमन राजा नूमा पोंपिलियस ने रखा जानूस देवता के नाम पर जनवरी
रोमन मिथकों का यही देवता कैलेंडर का शुरुआती महीना है. इसके नाम पर ही ग्रेगेरियन कैलेंडर के पहले महीने का नाम जनवरी रखा गया है. रोमन राजा नूमा पोंपिलियस (Numa Pompilius) ने 713 ईसा पूर्व में कैलेंडर में सुधार किया और जनवरी को वर्ष का पहला महीना घोषित किया. उन्होंने ही इसे जेनस को समर्पित किया क्योंकि जेनस बदलाव और समय के देवता थे.

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जानूस का महीना है जनवरी
जनवरी को शुरुआत का महीना मानते हुए इसे जेनस (जानूस) का महीना कहा गया है. इस महीने को नई योजनाओं, संकल्पों और परिवर्तन का महीना माना जाता है, जो जेनस की विशेषताओं को भी सामने रखता है. जेनस (जानूस) के दो चेहरों की तरह, जनवरी पुराने साल के अंत और नए साल की शुरुआत को जोड़ने वाला महीना है.यह दोनों ओर देखता है.प्राचीन रोम में जनवरी के पहले दिन जेनस (जानूस) की पूजा की जाती थी. इस पूजा के जरिए नए साल की शुभ शुरुआत की प्रार्थना की जाती थी. जेनस के मंदिर में 12 वेदियां बनी थीं. रोमन राजा ने इन्हीं 12 वेदियों के आधार पर साल को 12 महीनों में बांटा था. 

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प्राचीन रोम का दूसरा राजा नूमा पोंपिलियस
नूमा पोंपिलियस (Numa Pompilius)- सुधांशु त्रिवेदी ने जिन नूमा पोंपिलियस (Numa Pompilius) का नाम लिया है, वह प्राचीन रोम के दूसरे राजा थे और उन्हें रोमन साम्राज्य के प्रारंभिक इतिहास में एक शांतिप्रिय और धार्मिक सुधारक के तौर पर देखा जाता है. नूमा को रोम के संस्थापक राजा रोमुलस के उत्तराधिकारी के तौर पर भी जानते हैं और उनका शासनकाल लगभग 715 ईसा पूर्व से 673 ईसा पूर्व तक माना जाता है.

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नूमा पोंपिलियस ने किया कैलेंडर में सुधार
साबाइन जनजाति में जन्मा नूमा पोंपिलियस सरल, विनम्र और धार्मिक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति था. रोमुलस के बाद जब नूमा को राजा चुना गया तो उसने युद्धप्रिय रोमुलस से उलट शांति और धर्म पर जोर दिया. रोमन इतिहासकार बताते हैं कि, नूमा का शासनकाल शांति और धार्मिक सुधारों के लिए प्रसिद्ध है. इसके अलावा नूमा ने रोम में कई धार्मिक संस्थानों और परंपराओं की स्थापना की. सबसे बड़ा काम जो नूमा ने किया था, वह रोमन कैलेंडर को व्यवस्थित करना था. उन्होंने वर्ष में 12 चंद्र मास जोड़े और जनवरी (Janus) व फरवरी (Februa) महीनों को शामिल किया. इस सुधार से रोमन कैलेंडर अधिक सटीक हुआ और धार्मिक उत्सवों का निर्धारण किया गया.

असल में, नूमा पोंपिलियस से पहले, रोमन कैलेंडर सरल भले ही था, लेकिन व्यावहारिक नहीं था. इस कैलेंडर रोम के संस्थापक राजा रोमुलस ने बनाया था. इसे रोमुलन कैलेंडर (Romulan Calendar) कहते थे जो उस दौरान भी खामियों से भरा था. इसमें तब साल में 10 ही महीने हुआ करते थे.

यह 304 दिनों का साल था, और शेष 61 दिनों को कैलेंडर में गिना ही नहीं जाता था. ये 61 दिन सर्दियों के दौरान आते थे और उन्हें अनिश्चित और असंगठित माना जाता था.  
10 महीनों के नाम और उनकी लंबाई इस प्रकार थी:

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मार्टियस (Martius) – 31 दिन
अप्रिलिस (Aprilis) – 30 दिन
माईयस (Maius) – 31 दिन
जूनियस (Junius) – 30 दिन
क्विंटिलिस (Quintilis) – 31 दिन
सेक्सटिलिस (Sextilis) – 30 दिन
सेप्टेम्बर (September) – 30 दिन
ऑक्टोबर (October) – 31 दिन
नोवेम्बर (November) – 30 दिन
डिसेम्बर (December) – 30 दिन
पहला महीना मार्टियस (Martius) था, जिसे युद्ध के देवता मार्स (Mars) के नाम पर रखा गया था।

प्राचीन कैलेंडर में नहीं शामिल था सर्दियों का मौसम
सर्दियों के महीने (जनवरी और फरवरी) को कैलेंडर में शामिल नहीं किया गया था. इन महीनों को "समय के बाहर" माना जाता था, क्योंकि वे कृषि और सैन्य गतिविधियों के लिए महत्वहीन थे, लेकिन इसकी वजह से वर्ष का कुल समय सूर्य वर्ष (365.25 दिन) से मेल नहीं खाता था. शेष 61 दिन "समयहीन" रहते थे, जिससे सामाजिक और धार्मिक गतिविधियां असंगठित हो जाती थीं.

कैसे किया गया महीनों में बदलाव?
रोमन समाज भी कृषि पर आधारित था, लेकिन इस कैलेंडर में खेती और मौसम के बदलावों को सही ढंग से नहीं दर्शाया गया था. यह कैलेंडर न चंद्र वर्ष (354 दिन) से मेल खाता था और न ही सौर वर्ष (365.25 दिन) से. नूमा ने सर्दियों के 61 दिनों को दो नए महीनों, जनवरी (Januarius) और फरवरी (Februarius) में बांटा गया. इससे कैलेंडर को 12 महीनों और लगभग 355 दिनों का बनाया गया. नूमा ने कैलेंडर को चंद्रमा के चक्रों के करीब लाने की कोशिश की. उसने महीनों को 29 और 31 दिनों का बनाया. साल को सौर वर्ष के करीब लाने के लिए हर दूसरे साल में "मर्केडोनियस" (Mercedonius) नामक एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता था.

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हालांकि यह कैलेंडर भी पूरी तरह ठीक साबित नहीं हुआ लेकिन रोमुलस कैलेंडर के 10 महीनों के बजाय यह अधिक सुधरा हुआ था.

महीनों के नाम कैसे रखे गए थे?
मार्टियस (Martius): यह युद्ध के रोमन देवता मार्स (Mars) के नाम पर रखा गया. इसे वर्ष का पहला महीना मानते थे और इसे नई शुरुआत और सैन्य अभियानों के लिए शुभ माना जाता था.

अप्रिलिस (Aprilis): यह लैटिन शब्द "aperire" से बना था, जिसका अर्थ है "खिलना".  इस समय रोम में वसंत ऋतु में आती थी और रंगबिरंगे फूल खिलते थे.

माईयस (Maius): यह माह रोमन देवी माया (Maia) के नाम पर रखा गया था. माया उर्वरता और पृथ्वी की देवी थीं.

जूनियस (Junius): यह रोमन देवता जूनो (Juno) के नाम पर रखा गया था. जूनो विवाह, परिवार और महिलाओं का संरक्षक है.

क्विंटिलिस (Quintilis): इसका अर्थ है "पांचवां महीना" (लैटिन में "क्विंटस" यानी पांच). रोमुलन कैलेंडर में यह वर्ष का पांचवां महीना था. बाद में इसे ही जुलाई (July) नाम दिया गया. आधुनिक रोम के पहले सम्राट जूलियस सीज़र ने इसे अपने नाम पर बदलवाया था.

सेक्सटिलिस (Sextilis): इसका अर्थ है "छठा महीना" (लैटिन में "सेक्सटस" यानी छह) यह रोमुलन कैलेंडर में छठा महीना था. बाद में इसे सम्राट ऑगस्टस के सम्मान में अगस्त (August) नाम दिया गया.

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सेप्टेम्बर (September):  इसका अर्थ है "सातवां महीना" (लैटिन में "सेप्टेम" यानी सात). रोमुलन कैलेंडर में यह सातवां महीना था.

ऑक्टोबर (October): इसका अर्थ है "आठवां महीना" (लैटिन में "ऑक्टो" यानी आठ).  रोमुलन कैलेंडर में यह आठवां महीना था.

नोवेम्बर (November): इसका अर्थ है "नौवां महीना" (लैटिन में "नोवेम" यानी नौ). रोमुलन कैलेंडर में यह नौवां महीना था.

डिसेम्बर (December): इसका अर्थ है "दसवां महीना" (लैटिन में "डिसेम" यानी दस). रोमुलन कैलेंडर में यह दसवां महीना था.

जनुअरियस (Januarius): यह द्वार और नई शुरुआत के देवता जेनस (Janus) के नाम पर रखा गया था. नूमा पोंपिलियस के सुधारों के बाद इसे वर्ष का पहला महीना बनाया गया, जो अतीत और भविष्य का प्रतीक था.

फेब्रुअरियस (Februarius): यह रोमन शुद्धिकरण संस्कार फेब्रुआ (Februa) के नाम पर रखा गया था. यह माह आत्मा और घर की शुद्धि के लिए होने वाले अनुष्ठान के देवता को समर्पित था.

जब इसी कैलेंडर को आधुनिक तौर पर अपनाया गया तब इन्हीं महीनों को जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई, जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर, अक्तूबर, नवंबर और दिसंबर के नाम से जाना गया.

...जब रोमन सम्राट सीजर ने बदला कैलेंडर
जूलियस सीज़र ने 45 ईसा पूर्व में रोमन कैलेंडर में महत्वपूर्ण और स्थायी बदलाव किए, जो आधुनिक जूलियन कैलेंडर (Julian Calendar) के रूप में प्रसिद्ध है. उनका यह सुधार रोमन कैलेंडर की खामियों को दूर करने और इसे सौर वर्ष (365.25 दिन) के करीब लाने का प्रयास था.

नूमा पोंपिलियस द्वारा सुधार के बावजूद, रोमन कैलेंडर 355 दिनों का था. इसे सौर वर्ष (365.25 दिन) से मेल खाने के लिए हर दूसरे वर्ष में एक अतिरिक्त महीना, मर्केडोनियस (Mercedonius), जोड़ा जाता था, लेकिन यह प्रणाली जटिल थी और अक्सर ठीक से लागू नहीं की जाती थी.

अतिरिक्त महीना जोड़ने का अधिकार रोमन पोंटिफ्स (पुजारियों) के पास था, जो इसे राजनीतिक लाभ के लिए बदल देते थे. इसके परिणामस्वरूप, त्योहार और मौसम गलत समय पर पड़ने लगे थे. जूलियस सीज़र ने मिस्र की यात्रा के दौरान खगोलशास्त्री सोसिजिनीज़ (Sosigenes) से सहायता ली, जिन्होंने खगोल विद्या के आधार पर अधिक सटीक सौर कैलेंडर को समझा था.

उन्होंने साल को 365.25 दिन का बनाया और कैलेंडर को सौर वर्ष के अनुरूप बदला. 365 दिनों के साथ हर चौथे साल में एक लीप वर्ष (366 दिन) जोड़ा गया. इसी दौरान पहली बार महीनों को 30 और 31 दिनों में विभाजित किया गया. फरवरी को 28 दिन का रखा गया और लीप वर्ष में इसे 29 दिन का बनाया गया.

कैलेंडर को सौर वर्ष से मेल कराने के लिए, 46 ईसा पूर्व को "अराजक वर्ष" (Year of Confusion) कहा गया, जिसमें 445 दिन थे. इस अतिरिक्त समय ने मौसम और त्योहारों को सही समय पर लाने में मदद की.

क्विंटिलिस का नाम बदलकर किया जुलाई
जूलियस सीज़र ने इस नए कैलेंडर को अपनाने से पहले क्विंटिलिस महीने का नाम बदलकर जुलाई (July) रख दिया. इस तरह अब एक सामान्य वर्ष 365 दिनों का बन गया. लीप वर्ष यानी हर चौथे साल में एक अतिरिक्त दिन (फरवरी में) जोड़ा गया. महीनों की लंबाई, जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, अगस्त, अक्टूबर, दिसंबर में 31 दिन की हुई और अप्रैल, जून, सितंबर, नवंबर 30 दिन के बनाए गए. इसी जूलियन कैलेंडर को पूरे रोमन साम्राज्य में अपनाया गया और यह यूरोप सहित कई क्षेत्रों में सदियों तक इस्तेमाल होता रहा.

पोप ग्रेगरी XIII के बदलाव
1582 में पोप ग्रेगरी XIII ने जूलियन कैलेंडर की खामियों को ठीक करने के लिए एक नया कैलेंडर पेश किया, जिसे आज ग्रेगोरियन कैलेंडर (Gregorian Calendar) कहा जाता है.

जूलियन कैलेंडर पहले की तुलना में अधिक सटीक था, लेकिन इसमें भी समस्या कम नहीं थी. जूलियन कैलेंडर में हर चौथे साल एक दिन जोड़ने का सिस्टम था. जिससे एक साल की औसत लंबाई 365.25 दिन होती थी. वास्तविक सौर वर्ष की लंबाई 365.24219 दिन है. इस छोटे से अंतर के कारण हर 128 साल में कैलेंडर एक दिन आगे बढ़ जाता था.

16वीं शताब्दी तक, यह त्रुटि 10 दिनों तक पहुंच गई थी. इससे ईस्टर, जो वसंत विषुव (Spring Equinox) के बाद पड़ता है, सही समय पर नहीं आ रहा था. पोप ग्रेगरी XIII ने इस समस्या को हल करने के लिए खगोलविदों और गणितज्ञों की एक टीम बनाई. उनके नेतृत्व में कैलेंडर में कई सुधार किए गए.

अंग्रेजों ने 1752 में अपनाया ग्रेगेरियन कैलेंडर
सबसे पहले तो 10 दिनों को हटाया गया. इसके लिए कैलेंडर को सौर वर्ष के साथ मिलाने के लिए, 4 अक्टूबर 1582 के बाद सीधे 15 अक्टूबर 1582 किया गया. इस प्रकार, 10 दिन हटा दिए गए. इस तरह आज जो कैलेंडर चलन में लाया जा रहा है, उसे  पोप ग्रेगरी XIII द्वारा किए गए बड़े सुधारों के बाद साल 1582 से अपनाया गया था. अंग्रेजों ने इसी कैलेंडर को साल 1752 में स्वीकार किया था, जिसे तबसे अंग्रेजी नववर्ष कहा जाता है.

भारतीय पंचांग अब भी सबसे सटीक
आजादी के बाद भारत में भी दफ्तरी कामकाज के लिए इसी कैलेंडर को अपनाया गया और भारतीय समाज आज भी अपने धार्मिक त्योहारों के लिए पंचांग को अपनाए हुए है. जो सौर और चंद्र कला के आधार पर तिथियों पर आधारित है. इसके हर महीने में 30 तिथियां हैं, जो दो पक्षों, आठ पहर, घटी, काल और मुहूर्त पर आधारित है. यह सबसे सटीक है जो की ग्रहों की गति के गणना के सापेक्ष है. इसमें बदलाव की जरूरत नहीं पड़ी है.

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