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सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ करेगी राजद्रोह कानून पर सुनवाई, केंद्र की मांग ठुकराई

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि यह मानते हुए कि वह कानून लागू हो जाता है तो ये भविष्य के मामलों को कवर करेगा. जहां तक  124ए से संबंधित है वो केस तो जारी रहेंगे. इसके लिए हमें पांच जजों की संविधान पीठ बनानी होगी. क्योंकि यह संवैधानिकता को कायम रखने वाले फैसले का मामला है.

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
संजय शर्मा
  • नई दिल्ली,
  • 12 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 5:51 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत राजद्रोह के औपनिवेशिक युग के प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया है.  मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के केंद्र के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया क्योंकि संसद दंड संहिता के प्रावधानों को फिर से लागू करने की प्रक्रिया में है. 

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सुप्रीम कोर्ट ने 1 मई को टाल दी थी मामले की सुनवाई
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को सीजेआई के समक्ष कागजात पेश करने का निर्देश दिया ताकि "कम से कम पांच न्यायाधीशों की ताकत" वाली पीठ के गठन के लिए फैसला लिया जा सके. शीर्ष अदालत ने एक मई को इन याचिकाओं पर सुनवाई तब टाल दी थी जब केंद्र ने कहा था कि वह दंड प्रावधान की फिर से जांच पर परामर्श के अंतिम चरण में है. 

इसलिए बनानी होगी पांच जजों की संविधानिक पीठ
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि यह मानते हुए कि वह कानून लागू हो जाता है तो ये भविष्य के मामलों को कवर करेगा. जहां तक  124ए से संबंधित है वो केस तो जारी रहेंगे. इसके लिए हमें पांच जजों की संविधान पीठ बनानी होगी. क्योंकि यह संवैधानिकता को कायम रखने वाले फैसले का मामला है. केदारनाथ बनाम सरकार के मामले में पांच जजों की संविधान पीठ ने राजद्रोह को बरकरार रखा था. ऐसे में अब बड़ा सवाल है कि क्या वर्तमान 3 जजों की बेंच वो फैसला पलट सकती है? 
 
राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई है अंतरिम रोक
जब तक केदारनाथ फैसला लागू है राजद्रोह का कानून वैध है. ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून पर अंतरिम रोक लगाई हुई है, लेकिन इस कानून पर फैसला तो करना ही है. सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकर नारायण ने कहा कि आप जो फैसला करेंगे उसका नए कानून पर असर पड़ेगा. केंद्र की ओर से SG तुषार मेहता ने आग्रह किया कि इस मामले में जल्दबाजी न की जाए. क्या इंतजार नहीं किया जा सकता? 

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सुधारों के दौर में है ये सरकारः सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत राजद्रोह के औपनिवेशिक युग के प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया है.  मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के केंद्र के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया क्योंकि संसद दंड संहिता के प्रावधानों को फिर से लागू करने की प्रक्रिया में है. 

राज्य सरकार नहीं है और सरकार राज्य नहीं है. 1973 में इसे संज्ञेय अपराध बना दिया गया. उससे पहले यह संज्ञान में नहीं था. इसलिए उन्होंने इसके इल्जाम में गिरफ्तारी शुरू कर दी.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हमने इस मामले में विस्तृत नोट दाखिल किया है. कोर्ट उस पर सुनवाई की तारीख तय कर दे. सीजेआई ने कहा कि औपनिवेशिक काल में, यह गैर संज्ञेय था और हमने इसे संज्ञेय बनाया. 

बता दें कि, 11 अगस्त को, औपनिवेशिक युग के आपराधिक कानूनों में बदलाव को लेकर केंद्र ने लोकसभा में IPC, CRPC और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को बदलने के लिए तीन विधेयक पेश किए थे, जिसमें अन्य बातों के अलावा राजद्रोह कानून को निरस्त करने और एक कानून पेश करने का प्रस्ताव था. इसके साथ ही अपराध की व्यापक परिभाषा के साथ नया प्रावधान लाने का भी विधान था. पिछले साल 11 मई को, शीर्ष अदालत ने राजद्रोह पर दंडात्मक कानून पर तब तक रोक लगा दी थी जब तक कि एक इसकी दोबारा जांच नहीं पूरी हो जाती.  

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अंग्रेजी शासन के दौर का है पीनल कोड 
केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि वे इस प्रावधान को लागू करते हुए कोई नई FIR दर्ज न करें. शीर्ष अदालत ने कहा था कि एफआईआर दर्ज करने के अलावा, चल रही जांच, लंबित मुकदमे और देश भर में राजद्रोह कानून के तहत सभी कार्यवाही भी स्थगित रहेंगी. राजद्रोह पर कानून, जो "सरकार के प्रति असंतोष" पैदा करने के लिए आईपीसी की धारा 124 ए के तहत अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करता है, आजादी से पूरे 57 साल पहले यानी 1890 में दंड संहिता में लाया गया था और इसके लगभग 30 साल बाद, आईपीसी अस्तित्व में आया.

 

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