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संकट, संयम और 41 जिंदगियों का साहस... पहाड़ के चेहरे पर सुरंग का मुहाना कितनी जद्दोजहद से खुला

उत्तराखंड में पहाड़ के चेहरे पर सुरंग का मुहाना कितनी जद्दोजहद के बाद खुला है, यह सिर्फ रेस्क्यू टीम के जांबाज जानते हैं. पहाड़ी इलाके में जहां वाहन बमुश्किल चल पाते हैं, वहां रेस्क्यू के लिए भारी भरकम मशीनें पहुंचाकर 24 घंटे जिंदगियां बचाने की जंग लड़ी गई और जीत हासिल की. यह जीत संकट के समय में संयम और साहस की बड़ी मिसाल है.

silkyara tunnel rescue operation. silkyara tunnel rescue operation.
अतुल कुशवाह
  • नई दिल्ली,
  • 29 नवंबर 2023,
  • अपडेटेड 1:40 PM IST

उत्तराखंड में सिल्क्यारा सुरंग से रेस्क्यू किए गए 41 श्रमवीरों का संयम, साहस सराहनीय है. इतनी मुश्किल घड़ी में भी हौसला नहीं खोया और आखिर पहाड़ के सीने में सुराख कर सभी को निकाल लिया गया. इस रेस्क्यू की राह में कई मुश्किलें आईं, लेकिन रेस्क्यू टीम के जांबाजों ने हार नहीं मानी. वे 24 घंटे जुटे रहे. पहाड़ के जिस दुर्गम इलाके में वाहन मुश्किल से चल पाते हैं, वहां इतनी बड़ी मशीनें पहुंचा दी गईं और एक साथ कई प्लान पर काम किया गया.

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जब मौके पर मौजूद मशीनों से काम नहीं हो सका तो दिल्ली से अमेरिकन ऑगर मशीन ले जाई गई. ऑगर मशीन के जरिये पहाड़ के सीने में सुराख करके जिंदगियां बचाने की जंग लड़ी. इसमें दिक्कत आई तो दूसरे तरीके अपनाए गए.

दरअसल, सिलक्यारा की इस सुरंग के अंदर 41 जिंदगियां बचाने के लिए जितनी जद्दोजहद हुई है, वो सिर्फ रेस्क्यू टीम के जांबाज ही जानते हैं. पहाड़ का वो इलाका जहां बड़े वाहन भी मुश्किल से चल पाते हैं, वहां सैकड़ों क्विंटल भारी मशीनरी को सुरंग के मुहाने तक पहुंचाना अपने आप में एक जंग थी. रेस्क्यू टीम ने युद्धस्तर पर सुरंग तक हर वो सहूलियत पहुंचाई, जिसकी जरूरत बताई गई.

12 नवंबर को धंस गई थी सुरंग, रेस्क्यू शुरू होते ही हो गया था ब्रेकडाउन

12 नवंबर को सुरंग धंसने के बाद जब मौके पर मौजूद सहूलियतों से रेस्क्यू शुरू किया गया तो चंद घंटे में ही मशीन ब्रेकडाउन हो गया था. रेस्क्यू टीम ने बड़ी मशीन की दरकार बताई. फौरन वायुसेना के विशेष विमान से दिल्ली से अमेरिकन ऑगर मशीन उत्तरकाशी पहुंचाई गई. पहाड़ के सीने में सुराख करके उसका मलबा सैकड़ों फीट बाहर तक फेंकने में सक्षम ये मशीन कोई मामूली मशीन नहीं थी.

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मशीन में 1750 हॉर्स पावर के इंजन की ताकत से घूमते हैं रोटर

1750 हॉर्स पावर वाले डीजल इंजन की ताकत से घूमने वाले रोटर जब पहाड़ के सीने में घुसते हैं तो सुराख ही करते चले जाते हैं. ये मशीन जो अपने आप में किसी कारखाने से कम नहीं है, जिसमें सैकड़ों नहीं हजारों की तादाद में कलपुर्जे होते हैं. इसकी असेम्बलिंग और डिसमैंटलिंग ही अपने आप में एक प्रोजेक्ट की तरह होती है. ऐसी मशीन को चंद घंटों में रेस्क्यू टीम के जांबाजों ने काम के लिए तैयार कर दिया.

मशीन के बाइब्रेशन से हिलने लगा था इलाका

ऑगर का भारी भरकम रोटर जब पहाड़ के सीने में छेद करता चला गया तो एक दिन में ही 24 मीटर तक का सुराख रेस्क्यू के लिए किया जा चुका था. लेकिन रेस्क्यू को मुश्किल बनाने के लिए कई बाधाएं राह में आईं. ऑगर मशीन के रास्ते में एक बड़ी सी चट्टान आ गई, जिसने रास्ता रोक लिया था. चट्टान से ऑगर मशीन के टकराने के बाद इलाके में कंपन होने लगा तो ड्रिलिंग रोकनी पड़ी थी, क्योंकि मजदूरों ने सुरंग के अंदर से बताया था कि और मलबा गिर रहा है. इसके बाद फौरन ड्रिलिंग रोकनी पड़ी थी.

ऑगर से भी ताकतवर टीबीएम मशीन

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हालांकि, ये ऑगर मशीन सुरंग बनाने में इस्तेमाल होने वाली भारी भरकम टीबीएम मशीन से छोटी ही थी, क्योंकि टीबीएम मशीन जब चलती है तो रास्ते में आने वाली कोई भी रुकावट उसका रास्ता नहीं रोक पाती. बोतल के घूमते ढक्कन की तरह टीबीएम के कटर्स पहाड़ चट्टान रेत मिट्टी सबको काटते चले जाते हैं और साथ में सुरंग के चारों तरफ फ्रेमिंग भी करते जाते हैं, ताकि सुरंग धंसे नहीं. लेकिन सिलक्यारा के इस टनल में टीबीएम नहीं थोड़ी छोटी ऑगर मशीन लगाई गई थी, जो सिर्फ खुदाई करके मलबा बाहर निकालने का काम करती है.

सुराख में डाले गए 900 मिलीमीटर के पाइप

मशीन से बनाए गए सुराख में लंबे-लंबे 900 मिलीमीटर के व्यास वाले पाइप अंदर डाले गए, जिनके रास्ते मजदूरों को बाहर निकालने की तैयारी की गई. सुरंग से मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने का ये मिशन कितना मुश्किल था, इसका अंदाजा ऐसे भी लगा सकते हैं कि सिर्फ 12 मीटर की दूरी तय करने में भी 12 घंटे का वक्त लगने की बात कही गई. सिल्क्यारा की सुरंग जिंदगी और संकट के बीच के फासले को खत्म करने के लिए रेस्क्यू टीम लगातार जुटी रही. पूरा देश दुआएं कर रहा था कि वो फासला जल्द से जल्द खत्म हो जाए.

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बंद सुरंग में बरकरार रहा हौसला

पहाड़ के चेहरे पर खुला एक सुरंग का मुहाना... दिन रात आती जाती मशीनें, मजदूर, इंजीनियर और सुरंग के अंदर चलती एक जद्दोजहद. 41 मजदूरों की जिंदगी बचाने के लिए बाहर क्या हो रहा है, इसकी खबर भर सुरंग के अंदर तक पहुंचती थी. वो 41 मजदूर जिनकी दिवाली अंधेरे में गुजर गई, जिनकी सांसें सुरंग की बंधक बनी हुई थीं, जिन्हें पाइप से आ रही एक-एक आवाज से जिंदगी की उम्मीदें जगती थीं, उन्हीं के हौसलों से बाहर रेस्क्यू टीम का जज्बा बढ़ता था.

17 दिन बाद जब सिल्क्यारा की सुरंग में फंसे मजदूरों की साफ तस्वीरें दुनिया के सामने आईं थीं, तब उन मजदूरों के जीवट का पता चला था. सुरंग के बाहर लोगों की मानसिक हालत चाहे जैसी रही, लेकिन सुरंग के अंदर मौजूद मजदूरों ने संयम और साहस दिखाया. सिल्क्यारा की सुरंग में पहली बार में 12 मजदूरों की साफ तस्वीरें सामने आईं तो सभी मजदूरों के परिवार की उम्मीदें मजबूत हुईं.

सुनी जा रही थी देवी-देवताओं से लगाई गुहार

दो हफ्ते तक अपनों की जान संकट में फंसी देख मजदूरों के घरवालों का हौसला भी टूटता जा रहा था, लेकिन पहली तस्वीर आते ही परिजनों की उम्मीदें मजबूत हुईं. देवी-देवताओं से लगाई गुहार भी सुनी जा रही थी.

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टनल के अंदर फंसे लोगों की तस्वीरें देखकर बाहर इंतजार कर रहे मजदूरों के घरवालों को पक्का भरोसा हो गया था कि अब उनके लाडले को जरूर सुरक्षित निकाल लिया जाएगा. लखीमपुर खीरी के मजदूर मंजीत के पिता तो अपने बच्चे की पुरानी हरकतों का जिक्र भी करते दिखे थे.

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