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'बादाम खिलाए, कंधों पर उठाया...' रैट होल माइनर्स ने बताया सुंरग में फंसे मजदूरों से मिलने के बाद क्या हुआ?

ये हादसा दिवाली के दिन यानी 12 नवंबर को हुआ था. ये मजदूर इसी सुरंग में काम कर रहे थे. तभी सुरंग धंस गई और मजदूर 60 मीटर लंबी मलबे की दीवार के पीछे धंस गए. उसके बाद से ही इन मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए तेजी से ऑपरेशन चलाया जा रहा था.

फिरोज कुरैशी उन दो रैट माइनर्स में से पहले थे, जो सबसे पहले सुरंग के अंदर मजूदरों से मिले थे. फिरोज कुरैशी उन दो रैट माइनर्स में से पहले थे, जो सबसे पहले सुरंग के अंदर मजूदरों से मिले थे.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 29 नवंबर 2023,
  • अपडेटेड 11:24 PM IST

उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों को 17वें दिन सुरक्षित निकाल लिया गया. ये मजदूर 12 नवंबर से सुरंग में फंसे हुए थे. सुरंग में 17 दिनों तक फंसे इन मजदूरों के पास पहुंचने वाले रैट माइनर्स का अनुभव भी काफी दिलचस्प है. 

सुरंग में फंसे मजदूरों तक सबसे पहले पहुंचे रैट होल माइनिंग टेक्निक के दो एक्सपर्ट्स फिरोज कुरैशी और मोनू कुमार उस पल को याद करते हैं. कुरैशी बताते हैं, 'हम जैसे ही मलबे के आखिरी हिस्से तक पहुंचे, वैसे ही मजदूरों को हमारी आवाज सुनाई देने लगी. हमने जैसे ही सारा मलबा हटाया, उनके चेहरे हमें दूसरी तरफ से दिखने लगे.'

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कुरैशी कहते हैं कि 'मजदूर इतने खुश थे कि वे शुक्रिया अदा कर रहे थे. उन्होंने मुझे कंधों पर उठा लिया.' उन्होंने कहा कि उन्हें देखकर मैं उनसे ज्यादा खुश था.  

वहीं, मोनू बताते हैं कि मजदूर हमें देखकर इतने खुश थे कि उन्होंने मुझे बादाम दिए और मेरा नाम भी पूछा. थोड़ी ही देर में हमारे बाकी साथी भी आ गए और हम लोग आधे घंटे तक यहीं रहे.

मोनू ने बताया कि एनडीआरएफ की टीम उनके पीछे-पीछे ही थी. और उनके सुरंग में आने के बाद ही हम वापस आए. उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक ऑपरेशन का हिस्सा बनकर हमें खुशी हुई.

बता दें कि फिरोज और मोनू ने सुरंग का मलबा हटाने के लिए आखिरी दो मीटर की खुदाई हाथ से की थी. फिरोज कुरैशी दिल्ली के खजूरी खास इलाके में रहते हैं और रॉकवेल एंटरप्राइजेज में काम करते हैं. उन्हें टनलिंग के काम में महारत हासिल है. दिल्ली से आए कुरैशी और उत्तर प्रदेश के मोनू उन 12 लोगों में से एक थे, जिन्हें रैट माइनिंग के लिए बुलाया गया था.

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इस 12 सदस्यीय टीम के लीडर वकील हसन का कहना है कि इस रेस्क्यू ऑपरेशन में मदद के लिए उनसे चार दिन पहले संपर्क किया गया था. उन्होंने बताया कि 'ऑगर मशीन का मलबा हटाने की वजह से ऑपरेशन में देरी हुई. हमने सोमवार दोपहर तीन बजे ऑपरेशन शुरू किया था और मंगलवार शाम 6 बजे काम खत्म किया.'

हसन ने कहा कि हमने पहले ही कहा था कि इस काम को पूरा होने में 24 से 36 घंटे लगेंगे और हमने वक्त में ये सब कर दिखाया. उन्होंने कहा कि इस काम के लिए उन्होंने कोई पैसा भी नहीं लिया है.

12 नवंबर से फंसे थे मजदूर

सिल्क्यारा सुरंग में 12 नवंबर को सुरंग धंसने से ये मजदूर फंस गए थे. इन्हें सुरक्षित बाहर निकालने के लिए तेजी से ऑपरेशन चलाया जा रहा था. लेकिन बार-बार ऑपरेशन में रुकावट आ रही थी. सोमवार को भी अमेरिका से आई ऑगर मशीन खराब हो गई थी. इसके बाद रैट माइनिंग में एक्सपर्ट लोगों की मदद ली गई थी. इन रैट माइनर्स ने 36 घंटे से भी कम समय में 12 मीटर तक खुदाई कर दी थी. इनकी मदद से ही मजदूरों तक पहुंचा जा सका और उनका रेस्क्यू किया जा सका.

रैट माइनर्स ने बदल दी पूरी स्थिति

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सोमवार को 48 मीटर हॉरिजोंटल ड्रीलिंग के दौरान अमेरिका से आई ऑगर मशीन खराब हो गई थी. इसके बाद रैट माइनर्स को बुलाया गया था. रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी दो प्राइवेट कंपनियों ट्रेंचलेस इंजीनियरिंग सर्विसेस और नवयुग इंजीनियर्स ने रैट माइनिंग करने वाले 12 एक्सपर्ट्स को बुलाया था. 

सोमवार शाम से इन रैट माइनर्स एक्सपर्ट ने हॉरिजोंटल ड्रीलिंग साइड से ही हाथों से खुदाई शुरू की. और 24 घंटे में ही 12 मीटर तक खुदाई तक कर दी. इसी वजह से मजदूरों तक पहुंचना संभव हो सका. रैट माइनिंग का काम तीन चरणों में होता है. एक व्यक्ति खुदाई करता है, दूसरा मलबा जमा करता है और तीसरा उसे बाहर करता है.

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