
Waqf Amendment Bill लोकसभा में पेश कर दिया गया है. केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री किरेन रिजीजू ने लोकसभा में इस बिल को पेश किया है. इस बिल को लेकर मुस्लिम समाज का एक तबका इसका समर्थन कर रहा है तो दूसरा तबका इस बिल का विरोध कर रहा है. कई मुस्लिम शख्सियतों का कहना है कि सरकार अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक मामले में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा रही है. और इसी मकसद से इस बिल को पास कराना चाहती है. लेकिन बिल का सपोर्ट कर रही सरकार का कहना है कि वक्फ संशोधन बिल के जरिए वह वक्फ से जुड़ी संपत्तियों का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करेगी.
केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री किरने रिजीजू ने कहा है कि किसी का हक छीनने की बात तो छोड़ दीजिए, यह बिल उन्हें हक देने के लिए लाया गया है जिन्हें आज तक उनका हक नहीं मिला है.
आइए अब हम इस बिल से जुड़े आपकी गलत आशंकाओं को दूर करते हैं.
मिथक 1: क्या वक्फ संपत्तियां खत्म कर दी जाएंगी?
तथ्य: कोई भी संपत्ति जिसे वैध रूप से वक्फ घोषित किया गया है, रद्द नहीं की जाएगी.
स्पष्टीकरण:
एक बार जब कोई संपत्ति वक्फ घोषित कर दी जाती है, तो वह स्थायी रूप से उसी रूप में बनी रहती है.
यह बिल केवल बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता के लिए नियमों को स्पष्ट करता है.
यह बिल जिला कलेक्टर को उन संपत्तियों की समीक्षा करने की अनुमति देता है जिन्हें गलत तरीके से वक्फ संपत्ति घोषित किया जा सकता है, खासकर यदि वे वास्तव में सरकारी संपत्ति हों.
वैध वक्फ संपत्तियां संरक्षित रहेंगी.
मिथक 2: क्या वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण नहीं होगा?
तथ्य: नहीं वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण होगा.
स्पष्टीकरण:
यह बिल सर्वे कमिश्नर के रोल को खत्म कर देता है और जिला कलेक्टर को ये जिम्मेदारी देता है.
जिला कलेक्टर मौजूदा राजस्व प्रक्रियाओं का उपयोग करके सर्वेक्षण करेगा.
इस बदलाव का उद्देश्य सर्वेक्षण प्रक्रिया को रोके बिना मौजूद रिकॉर्ड में सुधार करना है.
मिथक 3: क्या वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाएंगे?
तथ्य: नहीं, बोर्ड में गैर-मुस्लिम शामिल होंगे, लेकिन वे बहुमत में नहीं रहेंगे.
स्पष्टीकरण:
विधेयक में यह जरूरी किया गया है कि केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य बोर्डों में कम से कम दो सदस्य गैर-मुस्लिम हों.
बोर्ड के अधिकांश सदस्य अभी भी मुस्लिम समुदाय से ही होंगे.
इस परिवर्तन का उद्देश्य मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को कम किए बिना बोर्ड में विशेषज्ञों को बढ़ावा देना और पारदर्शिता को बढ़ावा देना है.
मिथक 4: क्या नए संशोधन के तहत मुसलमानों की निजी भूमि अधिग्रहित की जाएगी?
तथ्य: कोई व्यक्तिगत भूमि अधिग्रहित नहीं की जाएगी.
स्पष्टीकरण:
यह विधेयक केवल उन संपत्तियों पर लागू होगा जिन्हें वक्फ घोषित किया गया है.
यह निजी या व्यक्तिगत संपत्ति को प्रभावित नहीं करता है जिसे वक्फ के रूप में दान नहीं किया गया है.
केवल स्वैच्छिक और कानूनी रूप से वक्फ घोषित की गई संपत्तियां ही नए नियमों के अंतर्गत आएंगी.
मिथक 5: क्या सरकार इस बिल का उपयोग वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करने के लिए करेगी?
तथ्य: यह बिल जिला कलेक्टर को यह समीक्षा करने और सत्यापित करने का अधिकार देता है कि किसी संपत्ति को गलत तरीके से वक्फ प्रॉपर्टी के रूप में वर्गीकृत तो नहीं किया गया है. खासकर सरकारी संपत्ति के मामले मं.
लेकिन यह बिल वैध रूप से घोषित वक्फ संपत्तियों को जब्त करने को अधिकृत नहीं करता है.
मिथक 6: क्या यह विधेयक गैर-मुसलमानों को मुस्लिम समुदाय की संपत्ति पर नियंत्रण या प्रबंधन की अनुमति देता है?
तथ्य: हालांकि वक्फ संशोधन बिल में यह अनिवार्य किया गया है कि केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्प बोर्डों में कम से कम दो सदस्य गैर-मुस्लिम होने चाहिए. इन सदस्यों को बोर्ड में अतिरिक्त विशेषज्ञता और निगरानी लाने के लिए जोड़ा गया है. अधिकांश सदस्य मुस्लिम समुदाय से ही रहेंगे. जिससे धार्मिक मामलों पर समुदाय का नियंत्रण बना रहेगा.
मिथक 7: क्या ऐतिहासिक वक्फ स्थलों (जैसे मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तान) की पारंपरिक स्थिति प्रभावित होगी?
तथ्य: यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के धार्मिक या ऐतिहासिक स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं करता है. इसका उद्देश्य प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाना और धोखाधड़ी वाले दावों पर अंकुश लगाना है. इन स्थलों की प्रकृति में बदलाव करना नहीं है.
मिथक 8: क्या विधेयक का उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के अपने मजहबी मामलों का प्रबंधन करने के अधिकार में हस्तक्षेप करना है?
तथ्य: विधेयक का प्राथमिक लक्ष्य रिकॉर्ड को सुरक्षित और संरक्षित रखने की प्रक्रिया में सुधार करना. कुप्रबंधन को कम करना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है. यह मुस्लिम समुदाय के अपने धार्मिक संपत्ति को मैनेज करने के अधिकार को नहीं छीनता है; बल्कि, यह इन संपत्तियों को पारदर्शी और कुशलतापूर्वक मैनेज करने के लिए एक रूपरेखा प्रस्तुत करता है.
इन मिथकों के अलावा, विधेयक में कई आवश्यक पहलू भी शामिल हैं जिन पर अधिक स्पष्टता के लिए विचार किया जाना चाहिए जिससे कि गलत सूचनाओं का प्रसार न हो.
राज्य वक्फ बोर्ड संरचना का विस्तार
वक्फ बिल का ये संशोधन राज्य वक्फ बोर्डों में शिया, सुन्नी, बोहरा, अघाखानी और पिछड़े मुस्लिम समुदायों का व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है. यह अनिवार्य करता है कि शिया, सुन्नी और पिछड़े मुस्लिम समुदायों में से प्रत्येक से कम से कम एक सदस्य बोर्ड में होना चाहिए. इसका उद्देश्य मुस्लिम आबादी के विविध वर्गों को बोर्ड में जगह देना है. जिससे वक्फ संपत्ति प्रबंधन में सभी का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके.
कई सांसदों और अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद और जमात-ए-इस्लामी हिंद जैसे संगठनों सहित कई हितधारकों ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया है. उनका तर्क है कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25, 26 और 300 ए जैसे संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है, जो समानता, गैर-भेदभाव, धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकारों से संबंधित हैं.