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Waqf amendment bill: वक्फ बिल को लेकर अब कानूनी लड़ाई की बारी, क्या सुप्रीम कोर्ट रोक सकता है संसद से बना कानून?

संसद का काम कानून बनाना है और लोकसभा-राज्यसभा ने अपना काम कर दिया है. अब यह बिल संविधान के मुताबिक है या नहीं यह तय करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है. बिल को चुनौती देने वाले और इसका विरोध करने वाले बहुत हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस बिल को संविधान की कसौटी पर तौलेगा और फिर तय करेगा कि यह बिल संवैधानिक है या नहीं.

वक्फ बिल को अब कानूनी चुनौती वक्फ बिल को अब कानूनी चुनौती
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 04 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 7:02 PM IST

वक्फ संशोधन बिल के कानून बनने का रास्ता अब साफ हो चुका है. लोकसभा और फिर राज्यसभा से मंजूरी मिलने के बाद इस बिल पर सिर्फ राष्ट्रपति की मुहर लगने का इंतजार है. संसद और सड़क पर विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद सरकार दोनों सदनों से इस बिल को पारित कराने में सफल रही है. अब मुस्लिम संगठनों से लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में है. इस मामले में पहली रिट याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की जा चुकी है. बिहार के किशनगंज से कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कोर्ट में रिट पिटीशन दी है.

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वक्फ बिल पर कानूनी लड़ाई

कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने शुक्रवार को कहा कि कांग्रेस पार्टी जल्द ही इस बिल की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी. उन्होंने बताया कि पार्टी पहले ही नागरिकता कानून सीएए, आरटीआई कानून, चुनाव नियमों से जुड़े कानून को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दे चुकी है और ये सभी मामले कोर्ट में चल रहे हैं. इसके अलावा पूजा स्थल अधिनियम को भी कांग्रेस की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इस कड़ी में अगला नाम वक्फ संशोधन बिल का जुड़ने वाला है.

ये भी पढ़ें: वक्फ बिल के खिलाफ कांग्रेस भी जाएगी सुप्रीम कोर्ट, DMK पहले ही कर चुकी है ऐलान

कांग्रेस पार्टी के अलावा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) पहले ही वक्फ संशोधन बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान कर चुका है. बोर्ड के सदस्य मोहम्मद अदीब ने बुधवार को कहा कि जब तक यह कानून वापस नहीं हो जाता, हम चैन से बैठने वाले नहीं हैं. उन्होंने सरकार पर मुस्लिम संपत्तियों को जब्त करने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस कानून के खिलाफ किसान आंदोलन की तरह देशव्यापी विरोध प्रदर्शन होगा.

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सुप्रीम कोर्ट के पाले में गेंद

संसद का काम कानून बनाना है और लोकसभा-राज्यसभा ने अपना काम कर दिया है. अब यह बिल संविधान के मुताबिक है या नहीं यह तय करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है. बिल को चुनौती देने वाले और इसका विरोध करने वाले बहुत हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस बिल को संविधान की कसौटी पर तौलेगा और फिर तय करेगा कि यह बिल संवैधानिक है या फिर नहीं है. बिल की खिलाफत करने वाले भी इसे संवैधानिक आधार पर ही कोर्ट में चुनौती देने वाले हैं.

ऐसे में बिल प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी जा सकता है. विपक्ष का पहला तर्क यह है कि यह बिल धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है और वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिमों की एंट्री उस अधिकार का हनन है. हालांकि सरकार की दलील है कि वक्फ में किसी भी गैर मुस्लिम को जगह नहीं दी गई है बल्कि वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिम सदस्यों और महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान इस बिल में किया गया है. ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या वाकई इस बिल के प्रावधानों से धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का हनन हो रहा है?

वक्फ बाय यूजर हटाने का विरोध

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एक अन्य पहलू बिल में 'वक्फ बाय यूजर' को खत्म करना है. इस प्रावधान में कोई भी संपत्ति जिसका लंब अरसे से मस्जिद या कब्रिस्तान के रूप में धार्मिक कार्यों के लिए इस्तेमल हो रहा बगैर किसी दस्तावेज के वक्फ की संपत्ति के दायरे में आएगी. लेकिन सरकार ने अब इसे बदल दिया है. अब किसी भी संपत्ति को वक्फ बनाने के लिए उसके वैध दस्तावेज और रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया है. साथ ही 6 माह के भीतर वामसी पार्टल पर भी उस संपत्ति का रजिस्टर कराना होगा. 

ये भी पढें: वक्फ बिल में 'वक्फ बाय यूजर' क्या है? सरकार ने क्यों हटाया ये प्रावधान, विपक्ष की नाराजगी की क्या है वजह

विरोधियों का तर्क है कि इस प्रावधान को हटाकार सरकार मुकदमेबाजी का रास्ता खोल रही है और जमीनों को छीनने का प्रयास कर रही है. मुस्लिम संगठनों का भी मानना है कि कई जमीनें जिनपर मस्जिद या कब्रिस्तान बने हैं, हजारों साल पुरानी हैं और उनके वैध दस्तावेज मौजूद नहीं हैं. ऐसे में इन संपत्तियों पर सरकार कब्जा कर सकती है. हालांकि सरकार ने इस प्रावधान में राहत देते हुए तय किया है कि पुरानी संपत्तियों को इस दायरे में नहीं लाया जाएगा और सिर्फ वह संपत्ति जिनपर पहले ही अदालती मामले चल रहे हैं, उन्हें कोर्ट के फैसले पर छोड़ा जाएगा और सरकार इसमें कोई दखल नहीं देगी. 

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'वक्फ बाय यूजर' को बिल से हटाने को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. क्योंकि विरोधियों की दलील है कि सिर्फ मुस्लिम समाज नहीं बल्कि सैकड़ों मंदिर, गुरुद्वारे और चर्च का इस्तेमाल भी बाय यूजर के आधार पर किया जाता है. क्योंकि ये संपत्तियां बहुत पुरानी हैं और उनमें विभिन्न धर्मों के कर्मकांड होते आए हैं, लेकिन इनके लीगल दस्तावेज आज के समय में किसी के पास मौजूद नहीं हैं.  

संघीय ढांचे पर प्रहार का दावा

विरोधियों का एक तर्क यह भी है कि इस बिल से संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचता है. जमीन राज्य का विषय है लेकिन वक्फ बिल में संपत्ति का निर्धारण और रेगुलेशन का अधिकार कलेक्टर को दिया गया है जो कि अधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार के अधीन आता है. ऐसे में वह राज्य सरकारों को वक्फ संपत्ति के बारे में फैसले लेने से रोक सकता है. इस प्रावधान को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

ये भी पढ़ें: 'यह ऐतिहासिक क्षण, हाशिए पर पड़े लोगों को मदद मिलेगी...' वक्फ विधेयक पारित होने पर बोले PM मोदी

ऐसे में अब संसद की बहस से इतर इस बिल का भविष्य अब सुप्रीम कोर्ट में तय होने वाला है. बिल को कोर्ट में चुनौती देना आसान है लेकिन विरोधियों को यह साबित करना होगा कि यह बिल संविधान के दायरे से बाहर है. पहले भी कई कानून ऐसे हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है लेकिन अदालत ने हर बार उस कानून को संविधान के तराजू पर तौलते हुए फैसला सुनाया है. अदालत संसद से पारित हो चुके किसी कानून को तभी खारिज कर सकती है जब वह संविधान के दायरे से बाहर हो और यह देखना सर्वोच्च अदालत का काम है.

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कानून को रोक सकती है कोर्ट?

अगर सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों की बात करें तो वह संसद की ओर से बनाए गए किसी कानून की व्याख्या कर सकता है. लेकिन अगर वह कानून किसी को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानता है तो ऐसी स्थिति में सर्वोच्च अदालत के पास उसपर रोक लगाने का अधिकार भी है. लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब संसद से पारित कानून संवैधानिक अधिकारों का हनन करता हो. कोर्ट ही यह तय करेगा कि इस कानून से संविधान में निहित अधिकारों का कैसे हनन हो रहा है. हालांकि इसके बाद संसद के पास दो तिहाई बहुमत के जरिए संविधान संशोधन लाकर उस बिल को फिर से पास कराने का अधिकार भी है. 

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