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क्या है सरबत खालसा जिसे अपनी ढाल बनाना चाहता है भगौड़ा अमृतपाल सिंह?

फरार अमृतपाल सिंह ने सरबत खालसा बुलाने की मांग की है. उसने एक वीडियो जारी कर कहा कि पंजाब को बचाने के लिए सिखों को एकजुट होना होगा. असल में सरबत खालसा एक तरह से सभा होती है जिसमें देश-विदेश से सिख जुटते हैं, मसलों पर चर्चा करते हैं और प्रस्ताव पास करते हैं.

अमृतपाल सिंह. (फोटो- Rahul Gupta/aajtak.in) अमृतपाल सिंह. (फोटो- Rahul Gupta/aajtak.in)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 30 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 9:40 PM IST

'वारिस पंजाब दे' संगठन के मुखिया और खालिस्तानी समर्थक अमृतपाल सिंह ने अपनी फरारी के दौरान एक वीडियो जारी किया है. वीडियो में अमृतपाल ने अपने खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को 'सिख समुदाय पर हमला' बताते हुए अकाल तख्त जत्थेदार से 'सरबत खालसा' बुलाने की अपील की है. उसने कहा, 'अगर हमें युवाओं और पंजाब को बचाना है तो सरबत खालसा का हिस्सा बनना चाहिए.' 

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क्या है सरबत खालसा?

सरबत खालसा असल में एक सभा है, जिसमें दुनियाभर से सिख समुदाय के संगठनों को बुलाया जाता है. इसमें कुछ मसलों पर चर्चा होती है और फैसले लिए जाते हैं. इन फैसलों को सभी मानते हैं. सरबत का मतलब 'सभी' और खालसा का मतलब 'सिख' होता है यानी सभी सिखों की एक सभा. जरूरी नहीं कि सभी सिख खालसा हों, पर हर खालसा सिख होता है. 

बताया जाता है कि सबसे पहले 1708 में सरबत खालसा बुलाई गई थी. इसे सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने बुलाया था. 

इसके बाद साल 1723 में सरबत खालसा बुलाई गई थी. उस समय तत खालसा और बंदै के बीच संघर्ष हो गया था. इसे सुलझाने के लिए सरबत खालसा बुलाई गई थी.

तीन साल बाद 1726 में भाई तारा सिंह के निधन के बाद सरबत खालसा बुलाई गई. इसी में 'गुरमाता' की परंपरा भी शुरू हुई. गुरमाता यानी सरबत खालसा के फैसले.

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मुगल सरकार ने जब पंथ को नवाबशिप और जागीर का प्रस्ताव दिया तो इस पर चर्चा करने के लिए 1733 में सरबत खालसा बुलाई गई. फिर 1745 में सरबत खालसा बुलाई गई. इसमें तय हुआ कि 25 जत्थे बनेंगे और हर एक में 100 सिख होंगे.

1748 में बैसाखी के मौके पर बुलाई गई सरबत खालसा में सिखों की 11 मिसलों को पुनर्गठन करने का फैसला लिया गया. मिसल यानी मिलिट्री यूनिट.

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अमृतपाल जब दुबई में था तब वो पगड़ी भी नहीं पहनता था. (फाइल फोटो)

जब 120 साल तक नहीं हुई सरबत खालसा

1805 में आखिरी बार सरबत खालसा हुई थी. उस समय पंजाब के महाराज रणजीत सिंह ने इस पर रोक लगा दी थी. 

120 साल बाद 1925 में सरबत खालसा हुई. ये इसलिए हुई थी क्योंकि अंग्रेजों ने गुरुद्वारों का प्रबंधन करने के लिए अपने अधिकारी नियुक्त कर दिए थे.

आजादी के बाद सरबत खालसा का इतिहास काफी तनाव भरा रहा है. 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद 1986 को अकाल तख्त ने सरबत खालसा बुलाई थी.

कौन बुला सकता है सरबत खालसा?

ऐसा माना जाता है कि सरबत खालसा बुलाने का अधिकार अकाल तख्त के पास है, क्योंकि वही सिखों की सर्वोच्च संस्था है. अकाल तख्त की स्थापना सिखों के छठवें गुरु गुरु हरगोबिंद सिंह ने की थी.

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हालांकि, 2015 में सरबत खालसा को लेकर खासा विवाद हो गया था. 10 नवंबर 2015 को अमृतसर के बाहरी इलाके में स्थित छाबा गांव में सरबत खालसा बुलाई गई थी. ये सरबत खालसा शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के नेता सिमरनजीत सिंह मान और यूनाइटेड अकाली दल के नेता मोहकाम सिंह ने बुलाई थी.

दावा किया जाता है कि इस सरबत खालसा में लगभग 6 लाख सिख शामिल हुए थे. पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनकी पार्टी शिरोमणि अकाली दल समेत कई सारे सिख संगठनों ने इसका विरोध किया था. 

इस सरबत खालसा में 13 प्रस्ताव पास हुए थे. हालांकि, कुछ सिख संगठनों ने इन प्रस्तावों को मानने से इनकार कर दिया था.

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क्या है प्रक्रिया?

आमतौर पर सरबत खालसा साल में दो बार बैशाखी और दिवाली पर बुलाई जाती है. सरबत खालसा की शुरुआत अरदास से होती है.

अरदास यानी प्रार्थना के बाद पंज प्यारे (पांच सदस्य) चुने जाते हैं. ये पंज प्यारे अकाल तख्त पर गुरु ग्रंथ साहिब के बगल में बैठते हैं. 

इसके बाद इसमें शामिल हुए सिख संगठन अपने प्रस्ताव रखते हैं. उन पर वोटिंग होती है. जो प्रस्ताव पास होता है उसे 'गुरमाता' कहा जाता है.

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