
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को वन नेशन-वन इलेक्शन कमेटी की सिफारिशें स्वीकार कर ली हैं. देश में एक साथ चुनाव कराए जाने के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय कमेटी ने ये रिपोर्ट तैयार की है. हालांकि, इसे लेकर विवाद भी शुरू हो गया है. विपक्षी दल, एक देश-एक चुनाव पर सहमत नहीं हैं और कमियां गिना रहे हैं. कुछ पार्टियां समर्थन में भी आई हैं और खुलकर कमेटी की रिपोर्ट का बचाव कर रही हैं. आइए सवाल-जवाब में समझते हैं कोविंद कमेटी के सुझाव लागू होने के फायदे और नुकसान?
कमेटी में गृह मंत्री अमित शाह समेत आठ सदस्य हैं. 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' रिपोर्ट में कहा गया है कि हमने 62 राजनीतिक दलों से संपर्क किया, इनमें 47 ने अपना जवाब दिया है. 15 राजनीतिक दलों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. पैनल की रिपोर्ट के अनुसार, 32 राजनीतिक दलों ने एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव का समर्थन किया है. जबकि 15 ने इसका विरोध किया है.
कमेटी ने मार्च में राष्ट्रपति को सौंपी थी रिपोर्ट
कमेटी ने बताया कि राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP), बहुजन समाज पार्टी (BSP) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने प्रस्ताव का विरोध किया. जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) और नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) ने इसका समर्थन किया. इस कमेटी ने मार्च में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को रिपोर्ट सौंपी थी.
1. प्रस्ताव में क्या है?
- देश में एक साथ चुनाव को दो चरणों में लागू किया जाएगा. पहले चरण में लोकसभा, विधानसभा चुनाव कराए जाएं. दूसरे चरण में 100 दिन बाद नगर निकाय और पंचायत चुनाव कराए जाएं.
- सभी चुनाव के लिए एक ही वोटर लिस्ट तैयार की जाए. यानी अलग-अलग वोटर लिस्ट तैयार करने का झंझट खत्म हो जाएगा. अभी लोकसभा-विधानसभा के लिए अलग और नगर निकाय-पंचायतों के चुनाव में अलग वोटर लिस्ट तैयार होती है.
- यदि केंद्र या राज्य सरकार अपना बहुमत खोती है या भंग होती है तो ऐसी स्थिति में बची हुई अवधि के लिए ही चुनाव कराए जाएं.
- लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही राज्य विधानसभाओं के चुनाव भी कराए जाने पर विचार किया जाए.
- अगर किसी विधानसभा का चुनाव किसी कारणवश एक साथ नहीं हो पाता है तो बाद की तारीख में होगा, लेकिन कार्यकाल उसी दिन समाप्त होगा जिस दिन लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होगा.
- पूरे देश में विस्तृत चर्चा शुरू की जाए. एक कार्यान्वयन समूह का गठन किया जाए.
- परामर्श प्रक्रिया में 80 प्रतिशत लोगों खासकर युवाओं ने इसका समर्थन किया.
2. मोदी सरकार का क्या प्लान है?
मोदी 3.0 अपने इसी कार्यकाल में इसे लागू करवाने की तैयारी में है. केंद्रीय गृह मंत्री साफ यह बात साफ कर चुके हैं. एक क्रियान्वयन कमेटी गठित की जाएगी. सरकार का कहना है कि प्रस्ताव को लेकर सभी दलों के बीच सर्वसम्मति बनाई जाएगी. संसद का शीतकालीन सत्र दिसंबर में प्रस्तावित होता है, उस समय इसे पेश किया जाएगा. इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा. शीतकालीन सत्र के लिए अभी कुछ महीने का वक्त बचा है. इस दरम्यान क्रियान्वयन कमेटी इसे लागू करने के उपायों पर देशभर में चर्चा करेगी और उनकी चिंताओं और सुझावों पर विचार करेगी. सरकार आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी.
3. सरकार के सामने क्या चुनौतियां होंगी
एक देश-एक चुनाव विधेयक पर मुहर तभी लगेगी, जब संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाएंगे. इसके लिए संविधान में संशोधन जरूरी होगा. संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना होगा. सरकार के सामने बड़ी चुनौती संविधान संशोधन की होगी. इसके लिए दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है. आम चुनाव में संविधान बदलने का मुद्दा गरमाता रहा है. विपक्ष इसे हथियार बना सकता है और नैरेटिव सेट कर सकता है.
4. विपक्ष क्यों तैयार नहीं है?
एक देश-एक चुनाव से विपक्षी दलों में कई आशंकाएं हैं. एक आशंका यह है कि क्षेत्रीय पार्टियों का प्रभुत्व खतरे में आ जाएगा या खत्म हो जाएंगी. क्योंकि लोग देश के मुद्दों को ध्यान में रखकर वोट करेंगे और क्षेत्रीय पार्टियों को इससे नुकसान होगा. क्षेत्रीय मुद्दों की बजाय वोटर राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह दे सकते हैं. विधानसभा चुनाव में भी क्षेत्रीय पार्टियों के सामने संकट हो सकता है. वोटर्स के फोकस में राष्ट्रीय पार्टियां ही रहेंगी.
5. विधेयक पारित के लिए क्या प्रक्रिया जरूरी?
लोकसभा में इस विधेयक को पास कराने के लिए कम से कम 362 और राज्यसभा में 163 सदस्यों का समर्थन जरूरी होगा. संसद से मंजूरी के बाद इस विधेयक को करीब 15 राज्यों के विधानसभा का अनुमोदन भी जरूरी होगा. उसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होंगे और कानून बन सकेगा. जबकि लोकसभा में कुल 543 में से एनडीए के पास 293 सदस्य हैं. राज्यसभा में 119 सदस्यों का समर्थन है. यानी एनडीए सरकार को संविधान संशोधन के लिए विपक्ष को भी भरोसे में लेना होगा. 21 राज्यों में फिलहाल एनडीए की सरकार है, इसलिए राज्यों की मंजूरी में कोई पेच नहीं फंसने वाला है. लोकसभा में इंडिया ब्लॉक के 234 सदस्य हैं. राज्यसभा में 85 सदस्यों का समर्थन है.
इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि एनडीए के कुछ दल इस विधेयक का विरोध भी कर सकते हैं. हालांकि, कुछ अन्य दल समर्थन में भी साथ खड़े हो सकते हैं. लेकिन दोनों ही सदनों में जादुई आंकड़ा जुटाना टेढ़ी खीर साबित होगा.
6. सिस्टम के सामने क्या चुनौतियां आएंगी?
सरकार को शुरुआती दौर में मैनेजमेंट से लेकर मैनपावर की कमी से जूझना पड़ सकता है. इसके साथ ही बजट का एक बड़ा हिस्सा भी एक साथ खर्च करना होगा. लाखों की संख्या में ईवीएम और पेपर ट्रेलर मशीनें खरीदनी होंगी और स्टोरेज के लिए जगह बनानी होगी. इसमें हजारों करोड़ का अतिरिक्त खर्चा बढ़ेगा. पोलिंग बूथ की संख्या भी बढ़ जाएगी. अमूमन, ईवीएम 15 साल तक चलती है. एक चुनाव कराने पर इनका इस्तेमाल तीन या चार बार ही हो सकेगा. उसके बाद फिर नई मशीनें खरीदनी होंगी. हालांकि, लॉ कमीशन ने एक रिपोर्ट में कहा था कि एक्स्ट्रा खर्च भी धीरे-धीरे कम हो जाएगा.
7. एक-देश, एक चुनाव से क्या फायदा होगा?
फायदा यह होगा कि देश को बार-बार चुनाव के भंवर में नहीं फंसना पड़ेगा. विकास कार्यों की रफ्तार सुस्त नहीं पड़ेगी. अभी आचार संहिता के चलते विकास कार्य ठहर जाते हैं. पुलिस से लेकर अन्य सरकारी अफसर चुनावी तैयारियों में व्यस्त हो जाते हैं. आम लोगों को तमाम मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. अभी राज्यों में चुनाव होते हैं तो केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को विपक्षी पार्टी की सरकार का खुला विरोध करना होता है और वहां के विकास कार्यों में रोड़ा अटकाने के आरोप लगाकर हमला करते देखा जाता है. एक देश, एक चुनाव से केंद्र और राज्य के बीच तनाव की स्थिति नहीं बनेगी. संसाधन से लेकर धन तक की बचत होगी. बड़ा तर्क पैसों की बचत का दिया जा रहा है. लोकसभा चुनाव का खर्च केंद्र और विधानसभा चुनाव का खर्च राज्य सरकार उठाती है. अगर किसी राज्य में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हों तो फिर केंद्र और राज्य मिलकर खर्चा उठाते हैं.
8. कौन पार्टियां प्रस्ताव के समर्थन में?
AIADMK, ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, अपना दल (सोने लाल), असम गण परिषद, बीजू जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी (R), मिजो नेशनल फ्रंट, नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी, शिवसेना, जनता दल (यूनाइटेड), सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा, शिरोमणि अकाली दल और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल ने प्रस्ताव का समर्थन किया.
9. विरोध में कौन-कौन दल?
राज्य स्तरीय पार्टियों में AIUDF, तृणमूल कांग्रेस, AIMIM, CPI, DMK, नगा पीपुल्स फ्रंट और सपा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. समाजवादी पार्टी ने कहा, अगर एक साथ चुनाव कराए जाते हैं तो राज्य स्तरीय पार्टियां चुनावी रणनीति और खर्च के मामले में राष्ट्रीय पार्टियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगी, जिससे इन दोनों पार्टियों के बीच मतभेद बढ़ेंगे. अन्य दलों में सीपीआई (ML) लिबरेशन और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया ने इसका विरोध किया.
राष्ट्रीय लोक जनता दल, भारतीय समाज पार्टी, गोरखा नेशनल लिबरल फ्रंट, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा, राष्ट्रीय लोक जन शक्ति पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार) भी विरोध करने वालों में शामिल थे.
10. किन दलों ने प्रतिक्रिया नहीं दी?
भारत राष्ट्र समिति, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस, जनता दल (सेक्युलर), झारखंड मुक्ति मोर्चा, केरल कांग्रेस (एम), नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, तेलुगु देशम पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी समेत अन्य ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
BSP का स्टैंड सकारात्मक
BSP ने इस प्रस्ताव का स्पष्ट रूप से विरोध नहीं किया, लेकिन देश के बड़े क्षेत्रीय विस्तार और जनसंख्या के बारे में चिंताओं को उजागर किया है, जो इसके कार्यान्वयन को चुनौतीपूर्ण बना सकता है. बसपा प्रमुख मायावती ने बयान में कहा, देश में लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय का चुनाव एक साथ कराने वाले प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंजूरी दिए जाने पर हमारी पार्टी का स्टैंड सकारात्मक है, लेकिन इसका उद्देश्य देश और जनहित में होना जरूरी है.
समर्थन में आए दल क्या फायदे गिना रहे?
रिपोर्ट के मुताबिक, 32 राजनीतिक दलों ने ना सिर्फ प्रस्ताव का समर्थन किया, बल्कि संसाधनों को बचाने, सामाजिक सद्भाव की रक्षा करने और आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए इसे अपनाने की वकालत भी की. बीजेपी का कहना है कि देश में 1951 से लेकर 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते रहे हैं. लेकिन उसके बाद विधानसभाओं के बीच में भंग होने से इनमें बदलाव आया. मौजूदा समय में स्थिति यह हो गई है कि देश के किसी ना किसी हिस्से में चुनाव होते रहते हैं. इसका असर देश के विकास पर पड़ता है.
विरोध में पार्टियां क्या नुकसान बता रहीं?
प्रस्ताव का विरोध करने वाली पार्टियां ने आशंका जताई कि इसे अपनाने से संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन हो सकता है. यह लोकतंत्र विरोधी और संघीय व्यवस्था विरोधी हो सकता है. क्षेत्रीय दलों को हाशिए पर डाल सकता है. राष्ट्रीय दलों के प्रभुत्व को बढ़ावा दे सकता है और इसके कारण राष्ट्रपति शासन की सरकार का सिस्टम बन सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, AAP, कांग्रेस और CPI(M) ने प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज किया कि ये लोकतंत्र और संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करता है.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कहते हैं कि यह व्यवहारिक नहीं है. जब भी चुनाव आते हैं तो बीजेपी ध्यान भटकाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाती है. ऐसा करना संविधान और संघवाद के खिलाफ है. देश इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पूछा, ये योजना चुनावों का निजीकरण करके नतीजे बदलने की तो नहीं है? ऐसी आशंका जन्म ले रही है, क्योंकि कल को सरकार कहेगी कि इतने बड़े स्तर पर चुनाव कराने के लिए उसके पास मानवीय और अन्य जरूरी संसाधन नहीं हैं, इसलिए हम चुनाव कराने का काम भी ठेके पर दे रहे हैं.
2019 में 16 पार्टियों ने किया था एक देश-एक चुनाव का समर्थन
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2019 में एक सर्वदलीय बैठक में सरकार में महत्वपूर्ण सुधारों पर चर्चा करने के लिए 19 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था. इसमें एक साथ चुनाव कराए जाने पर भी चर्चा हुई थी और 16 दलों ने इसका समर्थन किया था. इनमें बीजेपी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), YSR कांग्रेस, बीजू जनता दल, भारत राष्ट्र समिति, लोक जनशक्ति पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, अपना दल, ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा, नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी, नेशनल पीपुल्स पार्टी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का नाम शामिल था. सीपीआई (M), AIMIM और RSP ही ऐसी पार्टियां थीं, जिन्होंने इसका विरोध किया था.