
देश में एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर बहस शुरू हो गई है. ईवीएम को लेकर तमाम तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग इस तरह के सारे आरोपों को खारिज कर रहा है. ईवीएम को लेकर चल रही इस बहस के बीच कुछ समय पहले 'द लल्लनटॉप' के 'गेस्ट इन न्यूजरूम' कार्यक्रम में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के अध्यक्ष राजीव करंदीकर ने शिरकत की और तमाम सवालों के जवाब दिए.
दरअसल 2018 में, चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से संबंधित शिकायतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई थी. करंदीकर इस समिति के सदस्य थे, और इसकी रिपोर्ट ने अप्रैल 2019 में ईवीएम के इस्तेमाल को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज करने का आधार बनाया. इस साक्षात्कार में, करंदीकर ने ईवीएम और वोटर-वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल्स (वीवीपीएटी) के इतिहास और संचालन पर विस्तार से जानकारी दी है.
करंदीकर ने बताया कि कोई भी कैंडिडेट को अगर किसी तरह का शक होता है तो वह ईवीएम की रिकाउंटिंग की मांग कर सकता है. चुनाव रद्द केवल एक्सट्रीम सिचुएशन में किया जा सकता है. क्या रिमोट से कोई एक ईवीएम को हैक किया जा सकता है कि नहीं? इसका जवाब देते हुए कंरदीकर ने बताया कि नहीं ऐसा नहीं हो सकता है. उन्होंने कहा कि अगर एक मशीन हैक हो सकती है तो फिर तो और भी मशीनें हैक हो सकती है.
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समझाया पूरा प्रोसेस
ईवीएम के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए करंदीकर ने कहा, 'ईवीएम केवल एक चीज नहीं बल्कि दो चीजें हैं, एक तो वह है जहां पर वोटर जाकर प्रेस करता है.दूसरा वो है जैसे आप बूथ के अंदर जाते हैं तो वहां दो-तीन जगह आपका वैलिडेशन होता है जैसे कोई आपका नाम पूछता है, कोई स्याही लगाता है फिर लास्ट पर्सन सब कुछ देखकर कहता है जाइए, उसके पास एक मशीन रहती है, वो भी ईवीएम का ही पार्ट है. वह मशीन को इनेबल करता है ताकि मशीन एक और वोट एक्सेप्ट कर सके. वोट देने के दौरान अगर आपने अंदर रहते हुए 2-3 बटन एक साथ दबा दिए तो तो रिकॉर्ड में वहीं जाएगा जिस पर आपने सबसे पहले बटन दबाया. उसके बाद जो भी बटन दबाएंगे वो ब्लॉक हो जाएगा. बाहर जो बैठा है उसके पास कंट्रोल यूनिट है ईवीएम की. वीवीपैट लागू होने के बाद यह फीचर ऐड हुआ कि वोट देने वाला उसमें पर्ची को देख सकता है कि सही उम्मीदवार को ही वोट गया है कि नहीं.'
जिसे समझा कमजोरी वहीं बना EVM की ताकत
कंरदीकर ने बताया, '1977 में चुनाव आयोग ने वोटिंग मशीन को लेकर काम करना शुरू किया और 1982 में पहली बार केरल में चुनाव हुए जो बाद में रद्द हो गए क्योंकि कानून में उसका बैलेंस या अप्रूवल नहीं था. 1989 में लॉ भी अमेंड हो गया. इसके बाद, 1989 में रिप्रेंजेंटेटिव्स ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951 में संशोधन किया गया और EVM से चुनाव कराने की बात जोड़ी गई. उसके बाद 1999 में पहली बार चुनाव आयोग ने इसकी शुरुआत की.तब मैं पत्रकार था.जब चुनाव आयोग की इसे लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई तो मुझे भी लगा कि आज के जमाने में तो यह बड़ा बेकार डिजाइन है. आय़ोग ने तब पूरा प्रोसेस बताया था. मैंने सोचा या इसमें ना कोई नेटवर्किंग है और ना कुछ और है. मुझे लगा यह सब बेकार है...लेकिन आगे जाकर देखेंगे तो इसकी स्ट्रेंथ साबित हुए.'
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नहीं हो सकती हैक
करंदीकर बताते हैं, 'अगर EVM में नेटवर्किंग स्ट्रेंथ है तो कोई माइ का लाल ये सर्टिफाई नहीं कर सकता है कि ये हैक नहीं होगा. उदाहरण- जैसे कोई यह नहीं कह सकता है कि बिना चाबी के कोई ताला नहीं तोड़ सकता है. हैकिंग भी ऐसे ही चीज है जिसमें आप गारंटी नहीं दे सकते हैं कि नहीं हो सकती है.अगर नॉन नेटवर्किंग है तो फिर गारंटी है कि हैक नहीं हो सकती है. आयोग का क्लेम है कि इसमें कोई नेटवर्किंग डिजाइन नहीं है, उसमें कोई ब्लूटूथ नहीं है, उसमें वाईफाई नहीं है, कुछ नहीं कर सकते. वो आप सर्टिफाईड कर देंगे तो वह काफी है. यह पूरी तरह से स्टैंड अलोन डिवाइस है.
अमेरिका, फ्रांस जैसे कई वैश्विक देश जो पहले ईवीएम का प्रयोग कर रहे थे, वो वापस पेपर बैलेट पर आ गए हैं. जबकि भारत में ऐसा नहीं है, इस सवाल के जवाब में कारंदीकर ने बताया, 'ये तो ऐसी तुलना हो गई कि वो एप्पल नहीं खा रहे हैं तो आप क्यों खा रहे हैं .उनके यहां के डिजाइन वो मॉर्डन थे. उनके यहां सबमें नेटवर्किंग है. मतलब अगर नेटवर्किंग हैं तो समस्या बनी रहेगी. जो वहां पर हुआ, उसके बाद जो मैं यहां अपनी वीकनेस मान रहा था, वो हमारी स्ट्रेंथ साबित हुई. उनके यहां सारी मशीनें नेटवर्किंग से जुड़ी हुी थी. वैसे ईवीएम अमेरिका में अभी भी कई जगहों पर यूज हो रही है.'
उन्होंने उस सवाल का भी जवाब दिया जिसमें मांग की जा रही थी कि वोट देने के बाद की पर्ची मतदाता को दे दी जाए. करंदीकर ने बताया कि अगर पर्ची दे भी दी जाए तो इससे तो खरीद फरोख्त को ही बढ़ावा मिलेगा. वोटर पर्ची लेकर उम्मीदवार को कहेगा कि आपको वोट दिया है, वो वोट खरीद सकता है. दूसरा फिर ऐसा होता तो वीवीपैट के साथ मिलान कैसे होगा.
पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-
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ईवीएम का इतिहास
आपको बता दें कि भारत में पहली बार चुनाव आयोग ने 1977 में सरकारी कंपनी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (ECIL) को EVM बनाने का टास्क दिया. 1979 में ECIL ने EVM का प्रोटोटाइप पेश किया, जिसे 6 अगस्त 1980 को चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को दिखाया. इसके बाद, मई 1982 में पहली बार केरल में विधानसभा चुनाव EVM से कराए गए. उस समय EVM से चुनाव कराने का कानून नहीं था. इसलिए सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम द्वारा मतदान को चुनौती दी गई, जिसके बाद उन चुनावों को रद्द कर दिया गया.इसके बाद, 1989 में रिप्रेंजेंटेटिव्स ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951 में संशोधन किया गया और EVM से चुनाव कराने की बात जोड़ी गई. हालांकि, कानून बनने के बाद भी कई सालों तक EVM का इस्तेमाल नहीं हो सका.
1998 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की 25 विधानसभा सीटों पर EVM से चुनाव कराए गए. 1999 में 45 लोकसभा सीटों पर भी EVM से वोट डाले गए. फरवरी 2000 में हरियाणा के चुनावों में भी 45 सीटों पर EVM का इस्तेमाल हुआ.मई 2001 में पहली बार तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल की सभी विधानसभा सीटों पर EVM से वोट डाले गए. 2004 के लोकसभा चुनाव में सभी 543 सीटों पर EVM से वोट पड़े. तब से ही हर चुनाव में सभी सीटों पर EVM से वोट डाले जा रहे हैं