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मोदी सरकार के खिलाफ कब-कब सड़कों पर उतरे किसान?

किसानों से जुड़े तीन नए विधेयक संसद से पास हो चुके हैं, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार के फैसले पर किसान आक्रोशित और उग्र हैं. किसान संगठन विचारधारा से ऊपर उठकर, आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट हो गए हैं और आज भारत बंद बुलाया है. इससे पहले भी किसान कई बार मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर चुके हैं.

कृषि विधेयक के खिलाफ किसानों का आंदोलन कृषि विधेयक के खिलाफ किसानों का आंदोलन
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 25 सितंबर 2020,
  • अपडेटेड 9:06 AM IST
  • मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर किसान उतरे
  • 2014 से अभी तक किसान सरकार के खिलाफ
  • पंजाब-हरियाणा-यूपी में किसान ज्यादा नाराज हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान' का नारा दिया है. मोदी सरकार 2014 से लेकर अब तक किसानों को खुशहाल और समृद्ध बनाने का दावा करती रही है. इसके बावजूद पिछले छह सालों में मोदी सरकार के खिलाफ किसान कई बार सड़क पर उतरकर आंदोलन कर चुके हैं. हालांकि, इस बार संसद से पारित हो चुके कृषि संबंधी बिलों के खिलाफ किसानों ने आक्रोशित और उग्र रुख अख्तियार कर रखा है. देश के किसान संगठनों ने शुक्रवार को इन विधेयकों के विरोध में देशव्यापी बंद का आह्वान किया है. ऐसे में बताते हैं कि पिछले छह सालों में किसान कब-कब और किन-किन मांगों को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं. 

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भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसान 
देश की सत्ता पर नरेंद्र मोदी के विराजमान होते की सबसे पहले किसानों ने ही सड़क पर उतरकर मोर्चा खोलने का काम किया था. जनवरी 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए अध्यादेश लेकर आई थी, जिसके खिलाफ देश भर के किसान सड़क पर उतर आए थे. मोदी सरकार ने इस अध्यादेश को लोकसभा से पास भी करा लिया था, लेकिन किसानों का आंदोलन इतना ज्यादा बढ़ गया था कि सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा था. 

भाजपा के कई सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर प्रमुखता से उसके विरोध में उतर आए. शिवसेना ने तो इस मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. किसान संगठनों से लेकर अन्ना हजारे तक धरने पर बैठ गए थे. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसान विरोधी बताया था, क्योंकि 2013 के कानून के बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया बेहद जटिल हो गई थी, लेकिन किसानों के हित में थी. यही वजह थी कि किसानों ने मोदी सरकार के अध्यादेश के खिलाफ उग्र रूप अख्तियार कर लिया था. हालांकि, किसानों की नाराजगी को देखते हुए सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा था. 

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जंतर-मंतर पर महीनों किसान बैठे रहे
तमिलनाडु के किसान 2017 में  कर्ज माफी, सूखा राहत पैकेज और सिंचाई संबंधी समस्या के समाधान के लिए कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर महीनों धरने पर बैठे थे. इस दौरान तमिलनाडु के किसानों ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने से लेकर अपना मलमूत्र तक पिया था. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इन किसानों के प्रदर्शन में शामिल होकर अपना समर्थन दिया था. तमिलनाडु के किसानों ने जंतर मंतर पर अनोखे तरीके से प्रदर्शन कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था. इसे लेकर देश के तमाम किसान संगठन उनके समर्थन में खड़े हुए थे, लेकिन बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई.पलानिस्वामी द्वारा आश्वासन मिलने के बाद धरना खत्म कर दिया था. 

दिल्ली तक किसान क्रांति यात्रा 
भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में हजारों किसानों ने हरिद्वार से दिल्ली तक पैदल 'किसान क्रांति यात्रा' निकाली थी. इस दौरान किसानों की मांग गन्ना बकाया से लेकर स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने सहित कई मांग शामिल थी. साल 2018 में गांधी जयंती के मौके पर किसान गांधी समाधि पर कार्यक्रम करना चाहते थे, लेकिन किसानों को दिल्ली में दाखिल से पहले यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर रोक दिया था. किसानों ने बैरिकेडिंग तोड़ दी थी और हंगामा किया था.

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दिल्ली पुलिस ने पानी की बौछार के साथ किसानों पर आंसू गैस के गोले दागे थे और लाठी चार्ज किया था जिसमें कई किसान घायल भी हुए थे. किसानों को समर्थन देने पहुंचे आरएलडी मुखिया चौधरी अजित सिंह तो बेहोश हो गए थे. इसके बाद किसानों के एक दल की केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात हुई थी. सरकार से आश्वासन मिलने के बाद किसान लौट गए थे.  

जंतर पर किसान महासभा की रैली
साल 2018 के नवंबर माह में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले देश के 208 जनसंगठनों से जुड़े किसानों ने दिल्ली के रामलीला मैदान से संसद मार्च तक विशाल रैली निकाली था. इसके जरिए देश भर के किसानों ने मोदी सरकार तक अपनी बातें पहुंचाने की पहल की थी, जिसमें राजनीतिक दल भी उनके साथ हो लिए. कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, राकांपा, वामदल समेत कई दलों के नेता जंतर-मंतर से संसद तक किसानों के मार्च को समर्थन देने पहुंचे थे. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस आंदोलन को 'धार' देने पहुंचे थे. स्वामिनाथन रिपोर्ट लागू कराने, फसल ऋण माफी, और कृषि उत्पादों के बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य समेत अन्य मांगों को लेकर किसान सड़क पर उतरे थे. अरविंद केजरीवाल, फारुख अब्दुला, धर्मेंद्र यादव, शरद यादव सहित कई विपक्षी दल के नेता इस आंदोलन में शामिल हुए थे. 

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कृषि विधेयक के खिलाफ भारत बंद 
आजादी के बाद से अबतक भारत की खेती में बड़ा बदलाव हो गया है, सरकार तीन कृषि विधेयकों को कृषि सुधार में अहम कदम बता रही है तो किसान संगठन और विपक्ष इसके खिलाफ हैं. पीएम नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद जारी रहेगी, लेकिन किसानों को विश्वास नहीं हो रहा है. किसानों को लग रहा है सरकार उनकी मंडियों को छीनकर कॉरपोरेट कंपनियों को देना चाहती है और किसानों को लगता है सरकार का ये कदम किसान विरोधी है.
देश भर के किसान संगठन विचारधारा से ऊपर उठकर, आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट हो गए हैं और भारत बंद बुलाया है. किसानों की मांग है कि सरकार एमएसपी के लिए गारंटी कानून लेकर आए. किसानों की इस मांग का बीजेपी के सहयोगी दल और आरएसएस से जुड़े हुए संगठन भी समर्थन कर रहे हैं. पंजाब और हरियाणा में इस बिल का विरोध काफी पहले से जारी है.


 

 

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