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क्यों लेफ्ट के भविष्य पर सवालिया निशान है कन्हैया कुमार का कांग्रेस में जाना 

कन्हैया कुमार बहुत ही कम समय में लेफ्ट की सियासत में अच्छी खासी चर्चा बटोरने में कामयाब रहे हैं. यही नहीं उन्होंने कम समय में ही पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के कद के बराबर अपना मुकाम स्थापित कर लिया था. ऐसे में अब वामपंथियों के आंखों का तारा बन चुके कन्हैया कुमार का कांग्रेस में शामिल हो जाना, लेफ्ट के भविष्य पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है. 

कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 28 सितंबर 2021,
  • अपडेटेड 7:20 PM IST
  • कन्हैया कुमार ने कांग्रेस का दामन थाम लिया
  • लेफ्ट राजनीति को क्यों कन्हैया ने त्याग दिया
  • वामपंथी विचाराधारा वाले नेता घर बैठ जाते थे

छात्र राजनीति से अपनी सियासी पारी शुरू करने वाले वामपंथी नेता कन्हैया कुमार ने मंगलवार को राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम लिया है. राहुल ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई. कन्हैया कुमार बहुत ही कम समय में लेफ्ट की सियासत में अच्छी खासी चर्चा बटोरने में कामयाब रहे हैं. यही नहीं बहुत ही कम समय में उन्होंने पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के कद के बराबर अपना मुकाम स्थापित कर लिया था. ऐसे में अब वामपंथियों के आंखों का तारा बन चुके कन्हैया कुमार का कांग्रेस में शामिल हो जाना, लेफ्ट के भविष्य पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है. 

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कन्हैया कुमार का लेफ्ट छोड़कर जाने पर जेडीयू नेता केसी त्यागी कहते हैं कि वामपंथी विचाराधारा से जुड़े हुए परिपक्व जो लोग थे, वो अपने घर तो बैठ जाते थे, लेकिन पार्टी नहीं छोड़ पाते थे. अतुल अंजान, अमरजीत कौर, सुभाषनी अली जैसे तमाम बड़े नेता है, जो घर बैठ गए पर किसी दूसरी पार्टी में नहीं गए. मौजूदा सियासत में अवसरवाद की राजनीति का प्रभाव बढ़ा है, उसके चलते लेफ्ट का दायरा सिमट रहा है. सियासी मुकाम पाने के लिए कन्हैया कुमार वैचारिक समझौता कर, जो जो कदम उठाया है वो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. भारत में पहले की तरह वामपंथी नेता भी नहीं बचे हैं और जो नई पीढ़ी है उसके अंदर सहनसीलता और संघर्ष का जज्बा नहीं है. 


...सीमित हो रहा लेफ्ट का दायरा

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं कि भारत में अब वामपंथी राजनीति में किसी के लिए कोई बड़ी संभावना नहीं दिख रही है. लेफ्ट का दायरा भी सीमित होता जा रहा है. बंगाल में पूरी तरह सफाया हो गया है और त्रिपुरा से भी सत्ता से बाहर हो गई है. केरल ही एकलौता राज्य बचा है. ऐसे में कोई युवा नेताओं को लेफ्ट की राजनीति में अपना भविष्य बनता नहीं दिख रहा है. इसलिए कन्हैया कुमार ने अपने लिए नए विकल्प तलाशा है.

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कन्हैया कुमार के कांग्रेस की सदस्यता दिलाते राहुल गांधी


CPI और कन्हैया कुमार

अरविंद मोहन कहते हैं कि सीपीआई भी कन्हैया कुमार को सियासी तौर पर आगे बढ़ाने में रुचि नहीं ले रही थी. पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में जब लेफ्ट का आरजेडी और कांग्रेस के साथ गठबंधन बढ़िया बन गया था. तो ऐसे में पार्टी ने कन्हैया कुमार को प्रमोट नहीं किया और न ही चुनाव लड़ाया. विधानसभा चुनाव से पहले कन्हैया कुमार ने जो बिहार का जो दौरा  शुरू किया था उसे भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने रुकवा दिया था. जिसके बाद कन्हैया कुमार के पास दो ही रास्ते बचते थे कि वो घर बैठ जाएं या फिर दूसरी पार्टी के साथ अपनी सियासी पारी को आगे बढ़ाएं. ऐसे में कन्हैया कुमार ने कांग्रेस के साथ जाना बेहतर समझा. 

बता दें कि कन्हैया कुमार सीपीआई के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से अपनी सियासी पारी का आगाज किया. जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे. कन्हैया कुमार चर्चा में तब आए थे, जब उन पर आरोप लगा गया था कि उन्होंने जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाए थे. इस मामले में उन्हें जेल भी जाना पड़ा था, लेकिन यह आरोप अभी तक साबित नहीं हो पाया है. इस मुद्दे पर बीजेपी ने उन्हें घेरा तो कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर पर हीरो बन कर उभरे. मोदी विरोधी चेहरे के तौर वो पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे. 

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बेगुसराय संसदीय सीट का चुनाव

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार के बेगूसराय संसदीय सीट चुनाव लड़ा था, लेकिन बीजेपी के उम्मीदवार गिरिराज सिंह से हार गए थे. लोकसभा चुनाव लड़कर कन्हैया कुमार ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था और उनके समर्थन में देश के तमाम बड़ी हस्तियां चुनाव प्रचार करने बेगुसराय पहुंची थी. कन्हैया कुमार भले ही चुनाव हार गए थे, पर देश भर में उनकी एक मजबूत पहचान बनी.

कन्हैया कुमार

कन्हैया कुमार अपने जोरदार भाषण और हिंदीभाषी राज्य से कनेक्शन के चलते जनसभाओं में भीड़ खींचने वाले नेता माने जाने लगे थे. ऐसे में लेफ्ट में भी उनका सियासी कद काफी तेजी से बढ़ा और भविष्य के नेता के तौर पर उन्हें देखा जाने लगा था. कन्हैया कुमार के राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोशन को लेकर लेफ्ट के भीतर मतभेद पैदा हो गए थे. 


कन्हैया कुमार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव

हैदराबाद में हुई सीपीआई की एक बैठक में तो अनुशानहीता का आरोप लगाकर कन्हैया कुमार खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया था. इसी घटना के बाद कन्हैया कुमार ने पार्टी मुख्यालय का अपना दफ्तर भी खाली कर दिया. हालांकि, लेफ्ट में जिस तरह से कम उम्र में वो अपनी पहचान बनाया, उससे पार्टी के बड़े नेताओं को असहज कर दिया है. कन्हैया अपने लिए पार्टी में एक प्रमुख भूमिका चाहते थे, लेकिन नेतृत्व इस पर तैयार नहीं हुआ. ऐसे में लेफ्ट को अलविदा कह कर कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं. 
 
हालांकि, पिछले दिनों कन्हैया के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चाओं के बीच पिछले सप्ताह सीपीआई महासचिव डी. राजा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे महज अफवाह बताया था. उन्होंने कहा था कि कन्हैया कुमार लेफ्ट में है और कहीं नहीं जा रहे हैं. दिल्ली में पार्टी के दफ्तर में कन्हैया को बुलाया गया था. केंद्रीय नेता उनका इंतजार कर रहे थे, पर कन्हैया नहीं पहुंचते. पार्टी नेताओं के मैसेज और फोन कॉल्स का भी जवाब नहीं दिया था और मंगलवार को कांग्रेस की सदस्यता ग्राहण कर लिया है. 

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कन्हैया के जाने से खड़े होंगे सवाल...

केसी त्यागी कहते हैं कि कन्हैया कुमार के जाने से निश्चित तौर पर सवाल खड़े होंगे, क्योंकि पार्टी के भविष्य का चेहरा माने जाते थे. हालांकि, यूएसएसआर के विघटन के बाद ही मार्क्सिस्ट-लेनिन राजनीतिक फिलॉसफी थी, उसी समय सवालिया निशान लग गए. इसका असर सबसे पहले ईस्ट युरोपियन देशों पर पड़ा, जहां तख्तापलट हो गया. दुनिया भर के मजदूरों एक हो का नारा था. वो सिद्धांत खत्म हो गया. इसका उसका सबसे ज्यादा राजनीतिक असर भारत के वामपंथी सियासत पर भी पड़ा. 

वह कहते हैं कि लेफ्ट में वैचारिक और मजबूत नेता नहीं रहे और युवाओं का जुड़ाव भी वामपंथी विचाराधार से कम हुआ है. ऐसे में कन्हैया कुमार जैसे नेताओं का पार्टी छोड़कर चलाना जाना एक बड़ा धक्का है. हालांकि, वह कहते हैं कि सीपीआई एक ऐसी पार्टी है जो व्यक्ति विशेष की बजाय कैडर बेस पार्टी है, जो राजनीति और अपनी विचारधारा पर जोर देती है. ऐसे में कन्हैया कुमार का जाना केवल एक अस्थायी झटका है, क्योंकि नए लड़कों में अब पहले की तरह वामपंथी नेताओं की तरह संघर्ष करने का जज्बा नहीं है. त्यागी कहते हैं कि देश में जब तक गैर-बराबरी और आर्थिक आसमानता रहेगी तब लेफ्ट रहेगा. 

 

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