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किसानों का दिल्ली कूच, जानें कब-कब मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे अन्नदाता

कृषि कानून के खिलाफ धरना देने के लिए 'दिल्‍ली चलो' मार्च के तहत पंजाब और हरियाणा के हजारों किसान दिल्ली की तरफ पैदल कूच कर रहे हैं. हरियाणा में कई जगहों पर किसानों को रोकने की तमाम कोशिशें की गई है. न मानने पर पानी की बौछारें, आंसू गैस के गोले भी छोड़े जा रहे हैं और सड़कें खोद दी गई हैं. इसके बाद भी किसान दिल्ली की तरफ बढ़ते जा रहे हैं. पढ़ें, मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश के किसान कब-कब सड़क पर उतरे हैं?

कृषि कानून के खिलाफ किसानों का दिल्ली कूच कृषि कानून के खिलाफ किसानों का दिल्ली कूच
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली,
  • 27 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 11:58 AM IST
  • कृषि कानून के खिलाफ किसानों का 'दिल्ली चलो' मार्च
  • नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान कई बार किसान सड़क पर उतरे
  • पंजाब-हरियाणा के किसान सबसे ज्यादा आक्रोशित

केंद्र की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार 2014 से लेकर अब तक किसानों को खुशहाल और समृद्ध बनाने का दावा करती रही है. इसके बावजूद पिछले छह सालों में मोदी सरकार के खिलाफ देश के किसान कई बार सड़क पर उतरकर आंदोलन कर चुके हैं. हालांकि, इस बार कृषि संबंधी कानूनों के खिलाफ किसान आक्रोशित हैं. ऐसे में हम बताते हैं कि पिछले छह सालों में किसान कब-कब और किन-किन मांगों को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं. 

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कृषि कानून के खिलाफ किसानों का दिल्ली कूच

कृषि कानून के खिलाफ धरना देने के लिए 'दिल्‍ली चलो' मार्च के तहत पंजाब और हरियाणा के हजारों किसान दिल्ली की तरफ पैदल कूच कर रहे हैं. हरियाणा में कई जगहों पर किसानों को रोकने की तमाम कोशिशें की गई हैं. न मानने पर पानी की बौछारें, आंसू गैस के गोले भी छोड़े जा रहे हैं और सड़कें खोद दी गई हैं. इसके बाद भी किसान दिल्ली की तरफ बढ़ते जा रहे हैं. किसानों की मांग है कि सरकार एमएसपी के लिए गारंटी कानून लेकर आए. ऐसे में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसान अपना धरना खत्म कर दें और तीन दिसंबर को वो वार्ता करेंगे, लेकिन किसान कह रहे हैं कि अब दिल्ली में ही वार्ता होगी. 

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बता दें कि मोदी सरकार ने इसी साल सिंतबर में कृषि से जुड़े हुए तीन कानून बनाए हैं. सरकार इसे कृषि सुधार में अहम कदम बता रही है, लेकिन किसान संगठन इसके खिलाफ हैं. पीएम नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद जारी रहेगी, लेकिन किसानों को इस पर विश्वास नहीं हो रहा है. किसानों को लग रहा है सरकार उनकी कृषि मंडियों को छीनकर कॉरपोरेट कंपनियों को देना चाहती है. इसी के विरोध में किसान पिछले दो महीने से पंजाब में आंदोलन कर रहे हैं और अब वे दिल्ली आकर अपनी आवाज बुलंद करना चाहते हैं. 

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसान 
देश की सत्ता पर नरेंद्र मोदी के विराजमान होते की सबसे पहले किसानों ने ही सड़क पर उतरकर मोर्चा खोलने का काम किया था. जनवरी 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए अध्यादेश लेकर आई थी, जिसके खिलाफ देश भर के किसान सड़क पर उतर आए थे. मोदी सरकार ने इस अध्यादेश को लोकसभा से पास भी करा लिया था, लेकिन किसानों का आंदोलन इतना ज्यादा बढ़ गया था कि सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा था. 

बीजेपी के कई सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर प्रमुखता से उसके विरोध में उतर आए. शिवसेना ने तो इस मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. किसान संगठनों से लेकर अन्ना हजारे तक धरने पर बैठ गए थे. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसान विरोधी बताया था, क्योंकि 2013 के कानून के बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया बेहद जटिल हो गई थी, लेकिन किसानों के हित में थी. यही वजह थी कि किसानों ने मोदी सरकार के अध्यादेश के खिलाफ उग्र रूप अख्तियार कर लिया था. हालांकि, किसानों की नाराजगी को देखते हुए सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा था. 

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जंतर-मंतर पर महीनों किसान बैठे रहे
तमिलनाडु के किसान 2017 में  कर्ज माफी, सूखा राहत पैकेज और सिंचाई संबंधी समस्या के समाधान के लिए कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर महीनों धरने पर बैठे थे. इस दौरान तमिलनाडु के किसानों ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने से लेकर अपना मलमूत्र तक पिया था. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इन किसानों के प्रदर्शन में शामिल होकर अपना समर्थन दिया था. तमिलनाडु के किसानों ने जंतर मंतर पर अनोखे तरीके से प्रदर्शन कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था. इसे लेकर देश के तमाम किसान संगठन उनके समर्थन में खड़े हुए थे, लेकिन बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी द्वारा आश्वासन मिलने के बाद धरना खत्म कर दिया था. 

दिल्ली तक किसान क्रांति यात्रा 
भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में हजारों किसानों ने हरिद्वार से दिल्ली तक पैदल 'किसान क्रांति यात्रा' निकाली थी. इस दौरान किसानों की मांग गन्ना बकाया से लेकर स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने सहित कई मांग शामिल थी. साल 2018 में गांधी जयंती के मौके पर किसान गांधी समाधि पर कार्यक्रम करना चाहते थे, लेकिन किसानों को दिल्ली में दाखिल से पहले यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर रोक दिया था. किसानों ने बैरिकेडिंग तोड़ दी थी और हंगामा किया था.

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दिल्ली पुलिस ने पानी की बौछार के साथ किसानों पर आंसू गैस के गोले दागे थे और लाठीचार्ज किया था, जिसमें कई किसान घायल भी हुए थे. किसानों को समर्थन देने पहुंचे आरएलडी मुखिया चौधरी अजित सिंह तो बेहोश हो गए थे. इसके बाद किसानों के एक दल की केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात हुई थी. सरकार से आश्वासन मिलने के बाद किसान लौट गए थे.  

जंतर पर किसान महासभा की रैली
साल 2018 के नवंबर माह में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले देश के 208 जनसंगठनों से जुड़े किसानों ने दिल्ली के रामलीला मैदान से संसद तक विशाल रैली निकाली था. इसके जरिए देश भर के किसानों ने मोदी सरकार तक अपनी बातें पहुंचाने की पहल की थी, जिसमें राजनीतिक दल भी उनके साथ हो लिए. कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, एनसीपी, वामदल समेत कई दलों के नेता जंतर-मंतर से संसद तक किसानों के मार्च को समर्थन देने पहुंचे थे. 

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस आंदोलन को 'धार' देने जंतर-मंतर पहुंचे थे. स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू कराने, फसल ऋण माफी और कृषि उत्पादों के बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य समेत अन्य मांगों को लेकर किसान सड़क पर उतरे थे. अरविंद केजरीवाल, फारुक अब्दुला, धर्मेंद्र यादव, शरद यादव सहित कई विपक्षी दल के नेता इस आंदोलन में शामिल हुए थे और मोदी सरकार पर जमकर हमले किए थे. 

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