
पश्चिम बंगाल में पिछली दिनों हुई हिंसा के मामले में बीजेपी की पांच सदस्यीय फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने शनिवार को केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. इसमें कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में अराजकता की स्थिति है. वहां सत्ता का खुलेआम दुरुपयोग किया गया है. जांच टीम ने दावा किया कि बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे. लेकिन सरकारी सिस्टम ने अधिकारों का पूरी तरह दुरुपयोग किया और कार्यकर्ताओं की पिटाई की है. जांच टीम ने ये भी बताया है कि उन्होंने बंगाल में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ लंबी बातचीत की, जिसके बाद रिपोर्ट तैयार की गई है. मामले में सीबीआई जांच जरूरी है.
बता दें कि 13 सितंबर को बीजेपी ने ममता सरकार के खिलाफ मार्च निकालने की तैयारी की थी. लेकिन पुलिस को पहले से जानकारी थी, ऐसे में हावड़ा से सचिवालय की ओर जाने वाली सभी रोड पर बैरिकेडिंग लगा दी थी. बाद में बैरिकेडिंग पार करने की वजह से बीजेपी कार्यकर्ता और पुलिस के बीच झड़प हो गई. पुलिस ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया, आंसू गैस के गोले दागे. इस पर बीजेपी कार्यकर्ता भड़क गए. जवाबी कार्रवाई में कई पुलिसकर्मी जख्मी हो गए. कोलकाता पुलिस के असिस्टेंट कमिश्नर देबजीत चटर्जी के तो हाथ में फ्रैक्चर हो गया और उनका अस्पताल में इलाज जारी है.
बीजेपी ने बंगाल भेजी थी जांच टीम
इस घटना के बाद बीजेपी ने ममता सरकार पर सत्ता और अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगाया था. बीजेपी का कहना था कि पुलिस अधिकारियों ने क्रूर रवैया अपनाया और हिंसा को अंजाम दिया है. ये मामला दिल्ली तक पहुंचा और बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पांच सदस्यीय जांच टीम बनाई और पश्चिम बंगाल भेजी थी.
नागरिकों की रक्षा करने में विफल रही जांच टीम
शनिवार को हिंसा की जांच करने वाली टीम ने दिल्ली लौटकर नड्डा से मुलाकात की और उन्हें अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल अराजकता की स्थिति में है, जहां संवैधानिक तंत्र पूरी तरह से चरमरा गया है. राज्य सरकार अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ रही है. राज्य में मौजूदा पुलिस तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है. भ्रष्टाचार को आगे बढ़ाकर विपक्ष को खत्म करने की कोशिश की जा रही है.
जांच टीम ने इन लोगों से बातचीत की है...
टीम ने कहा कि उसने बंगाल में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ लंबी बातचीत की और कुछ गैर-राजनीतिक व्यक्तियों और कुछ कार्यकारी अधिकारियों, जैसे स्टेशन हाउस कार्यालय और सेंट्रल कोलकाता के हरे स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के सहयोगियों से बात की है. कमेटी ने दावा किया है कि बंगाल में मौजूदा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ बीजेपी के कार्यकर्ता शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे. लेकिन राज्य सरकार ने इनसे निपटने के लिए सत्ता और अधिकार का दुरुपयोग किया है.
13 सितंबर को मनमानी गिरफ्तारियां की गईं...
आगे कहा- सत्ता का ऐसा ही एक स्पष्ट दुरुपयोग रेलवे स्टेशन पर देखा गया, जहां राज्य पुलिस ने रेलवे प्लेटफार्मों में घुसे और धमकी दी. इसके साथ ही गलत तरीके से भाजपा कार्यकर्ताओं को अभियान में हिस्सा लेने से रोका. हजारों अवैध गिरफ्तारियां की गईं. नबन्ना चलो अभियान के दिन 13 सितंबर 2022 को एक भी बस को कोलकाता में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई थी.
पुलिस के साथ अन्य लोगों ने भी किया हमला
उन्होंने कहा- 'पुलिस अधिकारियों ने ड्रेस में नाम-टैग को ढंककर क्रूरता बरती और हिंसा को अंजाम दिया है, जिनमें से कई टीएमसी के गुंडों के साथ गैर पुलिस कर्मी भी शामिल थे. राज्य के पुलिस अधिकारी और तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने नागरिकों (पुरुष और महिला दोनों) को निशाना बनाने के लिए पूरी तरह से कानून का उल्लंघन किया.
विपक्ष की आवाज दबाने के लिए धारा 144 लागू की
जांच टीम ने कहा कि सुवेंदु अधिकारी को राहुल सिन्हा और लॉकेट चटर्जी के साथ संतरागाछी से गिरफ्तार किया गया, जहां रैली में आंसू गैस के गोले दागे गए और लोगों को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया गया. सुकांत मजूमदार को हावड़ा मैदान से गिरफ्तार किया गया. विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए सतरागाछी और हावड़ा मैदान में सरकार ने मनमाने ढंग से सीआरपीसी की धारा 144 लागू करने का आदेश दिया था.
हिंसा में 750 नागरिक और कार्यकर्ता घायल हुए
रिपोर्ट पर कहा गया है कि बड़ी कार्रवाई के बाद वर्तमान में सैकड़ों कार्यकर्ता अस्पताल में भर्ती हैं. हिंसा इतनी गंभीर थी कि करीब 750 नागरिक और कार्यकर्ता घायल हो गए, जिनमें से कई ना सिर्फ पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में हैं, बल्कि बड़ी संख्यामें पड़ोसी राज्यों में भी आईसीयू में भर्ती हैं. मार्च निकालने से पहले और उसके दौरान करीब 550 मनमानी गिरफ्तारियां की गईं और 60 कार्यकर्ता अभी भी पुलिस हिरासत में हैं. करीब 45 कार्यकर्ताओं के ठिकानों के बारे में अभी भी पता नहीं चल पाया है.
अभिषेक के बयान में झलकती है फासीवादी मानसिकता
रिपोर्ट में तृणमूल कांग्रेस के सांसद और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी की निंदा की गई है. कहा- नेशनल टीवी पर अभिषेक बनर्जी ने कोलकाता के कुछ पुलिस अधिकारियों पर कथित हमले का जिक्र किया और कहा कि अगर वह मौके पर मौजूद होते तो प्रदर्शनकारियों के सिर में गोली मार देते. टीएमसी के सेकेंड इन कमांड का ये बयान उनकी पार्टी की फासीवादी मानसिकता के साथ-साथ इस तथ्य को भी उजागर करता है कि 13 सितंबर को राज्य पुलिस ने राजनीतिक आकाओं के शह पर अधिकारों का दुरुपयोग किया है.
मामले में सीबीआई से जांच करवाई जाए
आगे कहा- इस घटना में राज्य पुलिस द्वारा निष्पक्ष जांच संभव नहीं है. क्योंकि वे अपने सियासी दलों के नेताओं से प्रभावित हैं. टीएमसी नेता ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार में गृह मंत्री हैं. कमेटी ने सिफारिश की है कि इस पूरे प्रकरण की जांच केंद्रीय एजेंसी सीबीआई द्वारा करवानी चाहिए. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए. इसके साथ ही कोलकाता पुलिस और तृणमूल कांग्रेस के गुंडों द्वारा मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन और क्रूरता की जांच के लिए कोलकाता जाना चाहिए.
आईपीएस अफसरों पर भी टिप्पणी
टीम ने 19वीं सदी के इतिहासकार, राजनेता और लेखक लॉर्ड एक्टन के विचारों को भी कोड किया. जिन्होंने कहा था- 'सत्ता मनुष्य को भ्रष्ट करती है और पूर्ण शक्ति बिल्कुल भ्रष्ट करती है.' रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी सिद्धनाथ गुप्ता, दमयंती सेन और प्रवीण कुमार त्रिपाठी को सार्वजनिक रूप से अपने कर्तव्यों की अनदेखी करते हुए और बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करते देखा गया. इसमें कहा गया है कि उनकी निष्क्रियता राज्य सरकार द्वारा सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करती है.