
बिहार और झारखंड में सियासी तापमान चढ़ा हुआ है. झारखंड में नई-नवेली चंपई सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करना है. वहीं, बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली नई एनडीए सरकार को भी 12 फरवरी के दिन बहुमत साबित करना है. दोनों ही राज्यों में संख्याबल सरकारों के पक्ष में नजर आ रहा है लेकिन फिर भी रिजॉर्ट पॉलिटिक्स तेज है और इसका केंद्र बनकर उभरा है दक्षिण भारत का तेलंगाना राज्य. झारखंड के 37 विधायक हैदराबाद पहुंचे थे जो चंपई सरकार के फ्लोर टेस्ट से ठीक पहले ही रांची लौटे हैं.
झारखंड के विधायक रांची लौटे तो अब कांग्रेस अपने बिहार के विधायकों को हैदराबाद भेज रही है. बिहार में कांग्रेस के 19 विधायक हैं जिनमें से 16 विधायकों को पार्टी ने हैदराबाद शिफ्ट कर दिया है. बाकी के तीन विधायकों के भी जल्दी ही हैदराबाद पहुंचने की बात कही जा रही है. हिंदी बेल्ट के दो राज्यों में दो फ्लोर टेस्ट होने हैं और इससे पहले विधायकों के छिपने-छिपाने का खेल जारी है. दोनों ही राज्यों में रिजॉर्ट पॉलिटिक्स जोरों पर है तो उसकी वजह क्या है?
रिजॉर्ट पॉलिटिक्स के पीछे क्या
झारखंड में कुछ विधायकों के टूटने में सत्ता की तस्वीर बदल सकती थी. ऐसे में विधायकों के छिटकने का डर समझ आता है लेकिन बिहार में जहां कांग्रेस विपक्ष में है और नंबर गेम पहले से ही सत्ता पक्ष के पक्ष में. ऐसे में यहां रिजॉर्ट पॉलिटिक्स की वजह क्या है? झारखंड से बिहार तक रिजॉर्ट पॉलिटिक्स के पीछे दो प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं- एकजुटता बनाए रखने की कोशिश और परसेप्शन की लड़ाई में पिछड़ने से बचने की कवायद.
राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि लोकसभा चुनाव में अब अधिक समय नहीं बचा है और बीजेपी ने जिस तरह से दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ लाने के लिए जिस तरह से स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया है, उसने विपक्ष की टेंशन बढ़ा दी है. बिहार और झारखंड में सियासी अफरातफरी जैसी स्थिति है और ऐसे माहौल में विधायकों के, नेताओं के पाला बदलने का खतरा सामान्य परिस्थितियों के मुकाबले कहीं अधिक रहता है.
नीतीश के जाने से इंडिया गठबंधन को पहले ही बड़ा झटका लग चुका है. चुनावी साल में बीजेपी की रणनीति विपक्ष को और झटके देने की हो सकती है जिससे परसेप्शन की लड़ाई में पार्टी अपरहैंड ले सके. ऐसे में कांग्रेस और उसके गठबंधन सहयोगियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपना कुनबा बचाए रखने, एकजुटता बनाए रखने की है. कांग्रेस अब अगर बिहार में सरकार के साथ बहुमत की तस्वीर साफ होने के बावजूद अपने विधायकों को हैदराबाद भेज रही है तो वह इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
क्या बिहार में खेला अभी बाकी है?
कांग्रेस अपने विधायकों को हैदराबाद शिफ्ट करने जा रही है तो इसका कनेक्शन नीतीश के पालाबदल के बाद से ही जारी बयानी जंग से भी जोड़ा जा रहा है. नीतीश की एनडीए में वापसी के बाद बिहार बीजेपी के नेता यह दावा कर रहे थे कि कांग्रेस के 10 विधायक हमारे संपर्क में हैं. वहीं, नीतीश सरकार में डिप्टी सीएम रहे तेजस्वी यादव ने भी कहा था कि बिहार में खेला अभी बाकी है.
आरजेडी की ओर से जीतनराम मांझी की पार्टी को डिप्टी सीएम पद का ऑफर दिए जाने की खबरें भी आई थीं. मांझी से लेकर उनके बेटे संतोष मांझी तक ने तब दो टूक कहा था कि हम एनडीए में हैं और एनडीए में ही रहेंगे. लेकिन अब मांझी एनडीए को तेवर दिखा रहे हैं. यह तेवर नीतीश कैबिनेट में भागीदारी बढ़ाने, लोकसभा चुनाव के लिए सीटें पाने की कोशिश में प्रेशर पॉलिटिक्स है या बिहार में खेला अभी बाकी है?