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सबसे बड़ा सवाल, क्या विधायक बने BJP के 12 सांसदों की सेंट्रल पॉलिटिक्स खत्म हो गई है?

विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में कुल 21 सांसदों को मैदान में उतारा था. पार्टी की यह रणनीति काम कर गई और 12 सांसदों ने चुनाव जीता है. इनमें तीन केंद्रीय मंत्रियों के नाम शामिल हैं. पार्टी ने इन सभी नेताओं को केंद्र की राजनीति से दूर कर दिया है और उनके गृह राज्य की पॉलिटिक्स में भेजने का फैसला लिया है. माना जा रहा है कि पार्टी जल्द ही इन नेताओं को राज्यों में बड़ी जिम्मेदारी देने वाली है.

संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद बीजेपी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद बीजेपी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की.
उदित नारायण
  • नई दिल्ली,
  • 08 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 4:47 PM IST

पांच राज्यों के नतीजे आने के बाद बीजेपी ने 2024 के आम चुनाव की रणनीति पर अभी से काम करना शुरू कर दिया है. पार्टी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव जीतने वाले 12 सांसदों को उनके गृह राज्यों में जिम्मेदारी देने का फैसला लिया है. इन सांसदों में तीन केंद्रीय मंत्रियों प्रह्लाद सिंह पटेल, नरेंद्र सिंह तोमर और रेणुका सिंह के नाम शामिल हैं. बीजेपी के इस फैसले को बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि, बड़ा सवाल यही है कि क्या विधायक बने 12 सांसदों की सेंट्रल पॉलिटिक्स खत्म हो गई है?

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दरअसल, बीजेपी इस बार विधानसभा चुनाव में एक नई रणनीति के साथ मैदान में उतरी. पार्टी ने सबसे पहले उन सीटों पर फोकस किया, जहां उसे पिछले चुनाव में हार मिल रही थी. इन सीटों पर 100 दिन पहले उम्मीदवार उतारे. उसके बाद कमजोर सीटें चिह्नित की गईं. यहां आसपास की सीटों पर भी फोकस किया और चार राज्यों में 21 सांसदों को उम्मीदवार बनाकर उतारा. बीजेपी के इस फैसले से हर कोई चकित रहा. किसी ने इसे हार का डर बताया तो किसी ने सांसदों के कामकाज पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए. हालांकि, जब नतीजे आए तो काफी हद तक बीजेपी की ये रणनीति काम करती दिखी. बीजेपी के 21 में से 12 सांसद विधानसभा चुनाव जीतकर आए.

'कमजोर सीटों पर खेला गया दांव'

इतना ही नहीं, सांसद जिन सीटों पर चुनाव लड़ रहे थे, वहां आसपास की सीटों पर भी बीजेपी को बढ़त मिली तो कुछ पर जीत हासिल करने में भी मदद मिली. ऐसा भी नहीं है कि संगठन ने सांसदों को उनके संसदीय इलाके से अलग या दूर वाली सीटों पर खड़ा था. पार्टी ने इन नेताओं की उनकी संसदीय क्षेत्र में आने वाली कमजोर सीटों पर भेजा. यहां दांव काम भी कर गया है. बीजेपी के इस फैसले को अब एक नई लकीर के तौर पर देखा जा रहा है.

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'अब दो कदम आगे बढ़ी बीजेपी'

नतीजे पक्ष में आने के बाद अब BJP ने दो कदम और आगे बढ़ा दिए हैं. विधानसभा चुनाव में जो 12 सांसद जीतकर आए हैं, उन्होंने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. यानी ये नेता अब विधानसभा के सदस्य बने रहेंगे. इन केंद्रीय नेताओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद मुलाकात की. उनसे चुनाव के अनुभव जाने और अगले ही दिन इन सभी को उनके निर्वाचन क्षेत्र में भेज दिया. कहा जा रहा है कि पार्टी ने ये निर्णय 2024 के चुनाव को ध्यान में रखकर लिया है.

'आधे नेताओं को बाद में किया जा सकता है एडजस्ट'

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर डॉ. कौशल त्रिपाठी कहते हैं कि ये कुछ समय के लिए संदेश देने के लिए भी एक कदम हो सकता है. तीन राज्यों में 12 सांसद चुनाव जीते हैं. संभावना है कि इनमें से तीन-चार नेताओं को राज्य सरकारों में सीएम या डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है. अन्य नेता कैबिनेट का हिस्सा हो सकते हैं. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ नेताओं को 2024 के चुनाव में टिकट ना दिए जाने की संभावनाएं ना बनें. यह पार्टी के लिए उसी समय निर्भर करेगा कि संगठन के हित में क्या ठीक रहेगा.

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'केंद्र और प्रदेश की राजनीति अलग नहीं'

अगले कुछ महीने बाद ही आम चुनाव (Loksabha Election) होने हैं. एक अन्य राजनीति जानकार और जम्मू सेंट्रल यूनिवर्सिटी में न्यू मीडिया विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उमेश कुमार कहते हैं कि 2024 के चुनाव को ध्यान में रखकर पार्टी ने ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया, जो चुनाव जिता सकें और लोगों में बीजेपी को लेकर भरोसा बढ़ सके. केंद्र और प्रदेश की राजनीति दोनों अलग नहीं होती हैं. नेता किसी भी माध्यम या क्षेत्र से जनता की सेवा कर सकते हैं. इनकी केंद्रीय राजनीति की संभावनाएं बनी रहेंगी. क्योंकि ये राज्य सरकार की बहुत सारी कमेटियां केंद्र के साथ समन्वय में रहती हैं. संगठन को अगर जरूरत होगी तो उन्हें फिर से केंद्रीय राजनीति में भेज सकता है.

'लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए उठाया कदम?'

अंदरखाने के सूत्र कहते हैं कि बीजेपी ने विधानसभा चुनाव लड़ने वाले सांसदों को लेकर बहुत पहले ही निर्णय ले लिया था. यही वजह है कि इन नेताओं को खास रणनीति के तहत विधानसभा चुनाव में उतारा गया है. अगर पार्टी इन्हें केंद्रीय राजनीति में रखना चाहती तो स्थानीय चुनाव में ही नहीं उतारती. क्योंकि दिसंबर में विधानसभा चुनाव हुए हैं और तीन-चार महीने बाद यानी मार्च-अप्रैल 2024 तक लोकसभा चुनाव होने हैं. अगर यह नेता विधानसभा चुनाव जीतकर इस्तीफा देते तो विपक्ष हमलावर होता है और इसे ना सिर्फ टैक्सपेयर्स के पैसे की बर्बादी से जोड़ा जाता, बल्कि जनता में भी नकारात्मक संदेश जाता. क्योंकि उपचुनाव की घोषणा के समय तक लोकसभा के चुनाव भी करीब आ जाते. कहा जा रहा है कि लोगों को बीजेपी में भरोसा बढ़ा है, उसे बनाए रखने के लिए पार्टी किसी फैसले को लेने से पहले नफा-नुकसान को ध्यान में रख रही है.

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'राज्य सरकार में बड़ी जिम्मेदारी मिलना भी तय'

जानकार कहते हैं कि इसके अलावा बीजेपी के सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा हो जाता कि अगर इन नेताओं को 2024 का लोकसभा का चुनाव ही लड़वाना था तो फिर चार महीने पहले (नवंबर-दिसंबर 2023) विधानसभा में उम्मीदवार क्यों बनाया गया? इस सवाल का जवाब देना बीजेपी के लिए भी मुश्किलें पैदा करता. ऐसे में संगठन ने तय किया कि सबसे पहले हारी हुई सीटों को जीतना प्रमुख है. इसलिए बड़े चेहरों पर दांव लगाया. अब चूंकि वो चुनाव जीत गए हैं तो उन्हें राज्य की राजनीति में सक्रिय करके नया नेतृत्व खड़ा करने की तैयारी कर ली है. इन जीते हुए सांसदों को बड़ी जिम्मेदारी मिलना भी तय है. ये नेता केंद्रीय नेतृत्व के आंख-कान बनकर काम करेंगे और सक्रिय रहेंगे.

'अब नए चेहरों को मिलेगा केंद्रीय राजनीति में मौका'

बताते चलें कि जो 12 सांसद जीते हैं, उनमें कई नेता कई दशकों से केंद्रीय राजनीति में एक्टिव थे और लोकसभा चुनाव लड़कर जीत रहे थे. अब इन नेताओं के स्टेट पॉलिटिक्स में चले जाने से नए चेहरों को भी सेंट्रल की राजनीति करने का मौका मिल सकता है. इसका फायदा पार्टी को भी मिलेगा. युवा चेहरे भी देखने को मिलेंगे. केंद्रीय नेताओं का सहयोग मिलेगा. उनसे राजनीतिक अनुभव भी सीखने-समझने और जानने को मिलेंगे.

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'फिर से लोकसभ चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर विराम लगा'

विश्लेषक यह भी कहते हैं कि यह पार्टी पर निर्भर करेगा कि वो सेंट्रल पॉलिटिक्स से राज्यों में भेजे गए नेताओं (चुने गए विधायक) को 2024 के चुनाव में लोकसभा का टिकट देना चाहेगी या नहीं. यह उस समय के राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा. हालांकि, यह संभावना कम ही है कि जो नेता अभी चुनाव लड़े हैं, वो तीन महीने बाद फिर से चुनाव में जनता के बीच जाने में हिचकेंगे नहीं. क्योंकि पब्लिक भी ऐसे निर्णय पसंद नहीं करती है. वो नेताओं से लेकर पार्टी हाईकमान तक पर सवाल उठाती है. कई बार इस नाराजगी का खामियाजा भी उठाना पड़ा है.

'पहले भी केंद्रीय राजनीति से राज्यों में भेजे गए नेता'

अगर राजनीतिक इतिहास में देखें तो कई ऐसे मामले सामने हैं, जिनमें केंद्रीय नेताओं को राज्यों की राजनीति में भेजा गया, लेकिन उनकी दोबारा केंद्रीय राजनीति में वापसी नहीं हुई है. इनमें शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, रमन सिंह, केशव प्रसाद मौर्य, सैयद शाहनवाज हुसैन, जितिन प्रसाद के नाम प्रमुख हैं. योगी आदित्यनाथ भी पांच बार सांसद रहे हैं. बाद में 2017 में उन्हें यूपी का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया था.

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