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'पस्त' पड़ी कांग्रेस में नई धार कैसे लाएंगे प्रशांत किशोर? जानिए क्या होंगी चुनौतियां

प्रशांत किशोर कांग्रेस में शामिल होने की पठकथा लिखी जा रही है. पीके ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सियासी नैया पार लगाने का फॉर्मूला शीर्ष नेतृत्व को दिया है, लेकिन इस राह में कई सियासी चुनौतियां भी है. कांग्रेस का संगठन बिखरा पड़ा है और जनाधार खिसक चुका है. पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की लिस्‍ट बढ़ती जा रही है, नेतृत्‍व का संकट है. ऐसे में कांग्रेस की रिवाइव कर पाएंगे?

प्रशांत किशोर और राहुल गांधी प्रशांत किशोर और राहुल गांधी
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 18 अप्रैल 2022,
  • अपडेटेड 3:14 PM IST
  • कांग्रेस के खोए हुए मुकाम को हासिल करने का चैलेंज
  • कांग्रेस नेताओं की गुटबाजी को कैसे दूर कर पाएंगे
  • 2024 में कांग्रेस के अगुवाई में गठबंधन बनाने की चुनौती

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास दस जनपथ पर राहुल और प्रियंका गांधी समेत पार्टी के शीर्ष नेताओं की बैठक हुई. इस बैठक में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ लंबी चर्चा हुई. पीके ने इस दौरान कांग्रेस को बीजेपी के मुकाबले लड़ाई के लिए तैयार करने का एक फॉर्मूला रखा, जिस पर गहन मंथन हुआ. कांग्रेस के सियासी आधार को दोबारा से वापस दिलाने के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया है, जिसे कांग्रेस का 'हाथ' थामकर वो जमीन पर उतारने का काम करेंगे, लेकिन उनके लिए यह करना आसान भी नहीं है. 

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देश के मौजूदा राजनीतिक हालात में कांग्रेस की नैया लगातार डूबती जा रही है. इस डूबती हुई नैया को पीके किनारे लगा पाएंगे, अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. प्रशांत किशोर के लिए कांग्रेस को बीजेपी के मुकाबले खड़ करने की दिशा में कई सियासी चुनौतियां भी हैं, जिनसे पार पाए बिना संभव नहीं है. पीके एक से एक चुनावी रणनीति बना सकते हैं, लेकिन लगातार हार से निराश कांग्रेस कैडर को कैसे रिवाइव करेंगे. कांग्रेस का संगठन बिखरा पड़ा है और जनाधार खिसक चुका है. पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की लिस्‍ट बढ़ती जा रही है, नेतृत्‍व का संकट लोकसभा चुनाव के बाद से ही है, जिसे तीन साल हो रहे हैं. ऐसे में प्रशांत किशोर महज दो साल के भीतर कांग्रेस की इन कमियों को कैसे दूर कर बीजेपी के खिलाफ मजबूती से खड़ा कर पाएंगे.

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मोदी नैरेटिव को तोड़ पाने की चुनौती 
2024 लोकसभा चुनाव अभी दो साल दूर है, लेकिन विपक्षी दल की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोई खास चुनौती देते नहीं दिख रहे हैं. पीएम मोदी की अगुवाई में बीजेपी केंद्र से लेकर 18 राज्यों की सत्ता पर काबिज या फिर सहयोगी दल के तौर पर है. देश में पीएम मोदी के सियासी कद से सामने न तो राहुल गांधी टिक पाते हैं और न ही सोनिया गांधी. ऐसे में देश में नरेंद्र मोदी के सियासी नेरेटिव के लिए सबसे बड़ी सियासी चुनौती होगी. सोनिया गांधी ने हाल ही में कहा था कि आगे की राह पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. कांग्रेस के कुछ नेता भले ही सार्वजनिक रूप से न कहें, लेकिन निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि जनता को महंगाई की परवाह कम है और बीजेपी का ध्रुवीकरण का एजेंडा पटरी पर है. ऐसे में पीके को जनता का ध्यान कांग्रेस की ओर आकर्षित करने के लिए एक नया नैरेटिव तैयार करने होगा

कांग्रेस की साख बचाने की चुनौती
कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. एक समय देश भर के राज्यों में सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है. कांग्रेस के हाथ से राज्‍य दर राज्‍य सत्ता छिनती जा रही है. राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सत्ता पर कांग्रेस अपने दम पर काबिज है तो महाराष्ट्र और झारखंड की सरकार में सहयोगी है. पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक में कांग्रेस पूरी तरह साफ हो चुकी है. कांग्रेस का संगठन पूरी तरह पस्त पड़ा है तो चुनावी हार से हताशा पार्टी के दिग्गज नेता लगातार पार्टी छोड़ते जा रहे हैं. राहुल गांधी की कोर टीम भी पूरी तरह बिखर चुकी है. ऐसे में बीजेपी जैसी कैडर वाली पार्टी के सामने कांग्रेस को खड़े करना के साथ उसके पुराने साख को बरकरार रखने की चुनौती है. 

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कांग्रेस को पूर्णकालिक अध्यक्ष की जरूरत
कांग्रेस के पास करीब तीन साल से कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है. 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद इस्‍तीफा दिया था, जिसके बाद से अभी तक पार्टी पूर्णकालिक अध्‍यक्ष नहीं तलाश सकी. अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी पार्टी को चला रही हैं. कांग्रेस सीडब्ल्यूसी की बैठकों में बार-बार राहुल गांधी को अध्‍यक्ष बनने की मांग उठती है, लेकिन वो मना कर देते हैं.
कांग्रेस की कमान न तो गांधी परिवार से कोई संभाल रहा है और न ही किसी दूसरे के हाथों में दी जा रही है. पार्टी की कमान को लेकर पसोपेश की स्थिति है, जिसे लेकर सवाल भी उठते रहे हैं. ऐसे में प्रशांत किशोर अगर कांग्रेस का दामन थामते हैं तो सबसे पहले उनके सामने पार्टी के अध्यक्ष के चुनाव को लेकर फैसला करना होगा. उन्हें ऐसे अध्यक्ष की तलाश करनी होगी, जिसकी विश्वसनीयता हो और पीएम मोदी के सियासी कद को भी चुनौती दे सके. 

2024 में कांग्रेस के सामने है बड़ी चुनौती
2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के सामने बहुत बड़ी चुनौती है. कांग्रेस 2024 लोकसभा चुनाव में अपने दम पर बीजेपी को हराने की स्थिति में नहीं दिख रही है. कांग्रेस मजबूत गठबंधन के सहारे ही बीजेपी के सामने चुनौती तो खड़ी कर सकती है, लेकिन सत्ता हासिल कर पाएगी ये आसान नहीं है. 2024 में केंद्र की सत्ता पर कांग्रेस का दावा तभी मजबूत होगा जब वो अपने दम पर कम से कम 150 सीटें जीत कर लाए. ऐसा तभी संभव है कांग्रेस जब अपने वोटों में 10 फीसदी का इजाफा करे. 2004 में 28.30 फीसदी वोट हासिल करने पर ही कांग्रेस 143 सीटें जीत पाई थी. कांग्रेस को इस स्थिति में लाने के लिए प्रशांत किशोर को नाको चने चबाने पड़ेंगे. 

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कांग्रेस को केंद्र में रखकर विपक्षी गठबंधन
प्रशांत किशोर लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी एकता हो और इस एकता के केंद्र में कांग्रेस रहे है. कांग्रेस ख़ुद को मज़बूत करके की केंद्र की सत्ता के लिए दावेदारी पेश कर सकती है. मज़बूत कांग्रेस के साथ ही क्षेत्रीय दल आ सकते हैं, लेकिन क्षेत्रीय दलों की भी अपनी-अपनी सियासी महत्वाकांक्षाएं है, जिसके चलते ममता बनर्जी से लेकर केसीआर, अरविंद केजरीवाल, मायावती तक अपनी-अपनी सियासी बिसात बिछाने में जुटे हैं. इन फेहरिश्त के शरद पवार को छोड़कर बाकी नेता कांग्रेस के साथ खड़े नजर नहीं आते हैं. ऐसे में पीके इन दलों को कांग्रेस के साथ लाने की सियासी चुनौती होगी, क्योंकि इनके बिना केंद्र की सत्ता पर काबिज होना आसान नहीं है. राहुल गांधी के नाम पर कोई भी विपक्षी और सहयोगी दल तैयार नहीं दिख रहा है. ऐसे में पीके को राहुल की स्वीकार्यता को भी मजबूत करना होगा और गंभीर नेता के तौर पर पेश करने की चुनौती होगी. 

कांग्रेस के मठाधीशों के साथ संतुलन बनाना
कांग्रेस अगर सबसे ज्यादा किसी समस्या से जूझ रही है तो वो पार्टी के अंदर गुटबाजी है. राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक के संगठन में कांग्रेस के बड़े नेताओं के अपने-अपने गुट हैं. पंजाब और उत्तराखंड में कांग्रेस की हार में एक बड़ी वजह पार्टी नेताओं की गुटबाजी रही है. कांग्रेस के अंदर आंतरिक कलह भी चरम पर है. जी-23 गुट के नेता रह-रहकर कांग्रेस नेतृत्‍व के लिए असहज स्थितियां पैदा करता है, जिसमें गुलाम नबी आजाद से लेकर कपिल सिब्बल, संदीप दीक्षित, मनीष तिवारी, भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे बड़े नेता हैं. 

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कांग्रेस के पुराने और दिग्गज चेहरे पीके की भूमिका कैसे स्वीकार करेंगे, इसे लेकर असमंजस की स्थिति है. जी-23 पहले से ही नाराज चल रहा है और बार-बार अपनी भूमिका के लिए सवाल कर रहा है. ऐसे में पीके का बढ़ता कद वरिष्ठ नेताओं के लिए स्वीकार करना सहज नहीं होगा. प्रशांत किशोर अगर कांग्रेस में शामिल होते हैं तो उनके सामने सबसे पहले कांग्रेस नेताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है और उनके बीच अपनी उपयोगिता को भी साबित करना होगा. कांग्रेस में असंतुष्ट लोगों का एक ऐसा धड़ा स्थापित हो गया है, जो शीर्ष नेतृत्व पर सवाल कर रहा है और नेताओं को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं है. ऐसे में प्रशांत किशोर की बातों को कितना तवज्जो देंगे?  माना जा रहा है कि कांग्रेस की संस्कृति में अपनी पैठ बनाने के लिए पीके को खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है.

कांग्रेस के हाथ से खिसकते राज्यों में आधार
एक के बाद एक राज्य से कांग्रेस का सियासी जनाधार खिसकता जा रहा है तो बीजेपी का नक्शा लगातार बढ़ रहा. कांग्रेस की सियासी जमीन कहीं बीजेपी तो कहीं क्षेत्रीय पार्टियां कब्जा रही हैं. प्रशांत किशोर 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कोई करिश्मा नहीं कर पाए थे. उनकी रणनीति के बावजूद कांगेस दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई थी और अब दो सीटों पर सिमट गई है. वहीं, अभी तक किसी राज्य में ऐसा नहीं हुआ कि प्रशांत किशोर ने सत्ता से बाहर किसी पार्टी को सत्ता में लाने का करिश्मा दिखाया हो. वो हमेशा सत्ताधारी पार्टी के लिए ही चुनावी रणनीति बनाकर सुर्खियां बटोरते रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस के लिए प्रशांत किशोर को राज्यों में सियासी संजीवनी देने की चुनौती होगी. ऐसे में सबसे बड़ा चैलेंज जनता का विश्वास जीतने का है. अगर कांग्रेस लगातार हारती रही तो फिर वह 2024 का चुनाव में कैसे बीजेपी को टक्कर दे पाएगी. 

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गांधी परिवार का एक पावर सेंटर
कांग्रेस में अभी कई पावर सेंटर हैं, जिनमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बीच नेता बंटे हुए हैं. ऐसे में प्रशांत किशोर के सामने कांग्रेस में एक मजबूत पावर सेंटर को स्थापित करना होगा, जो संयुक्त हो. कांग्रेस में हाईकमान कल्चर के चलते यह स्थापित नहीं हो पाता, जिसके चलते पार्टी कई धड़ों में बंटी हुई दिखती है. ऐसे में गांधी परिवार कांग्रेस पर पकड़ को मजबूती को बनाए रखते हुए किस दिशा में कदम बढ़ाएगी.

प्रशांत किशोर ने साफ किया कि क्योंकि वह अब सिर्फ चुनाव रणनीतिकार और प्रबंधक के तौर पर नहीं बल्कि राजनीतिक तौर पर सक्रिय होना चाहते हैं. ऐसे में एक पावर सेंटर उनका भी होगा. पीके चाहते हैं कि सिर्फ अपनी कार्ययोजना को लागू करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए. उसमें कोई ढील उन्हें मंजूर नहीं होगी क्योंकि अगर उनकी कार्ययोजना पूरी तरह लागू नहीं हो पाई तो उसके वो अपेक्षित नतीजे नहीं निकलेंगे जिसके लिए वह कांग्रेस में आएंगे. प्रशांत ने कहा था कि इसके लिए कांग्रेस को वापस जमीन पर आना होगा, पुनर्जन्म लेना होगा. आत्मा, विचार और विचारधाराएं अपनी जगह हैं और बनी रहती हैं, लेकिन बाकी सब कुछ नया होना चाहिए. 

 

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