
भारतीय राजनीति में गांधी-परिवार की तीसरी पीढ़ी के दो युवा चेहरे इन दिनों सियासी चर्चा के केंद्र में हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी 'भारत जोड़ो यात्रा' से सुर्खियां बटोर रहे हैं तो बीजेपी सांसद वरुण गांधी ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर रखा है. राहुल की यात्रा से कांग्रेस की सियासी उम्मीदें परवान चढ़ रही हैं तो वरुण के तेवर को देखते हुए बीजेपी से उनकी विदाई तय मानी जा रही है. ऐसे में गांधी परिवार के दोनों युवा भाइयों के एक होने की चर्चा तेज हो गई है.
हालांकि, राहुल गांधी ने यह कहा है कि वरुण गांधी की विचारधारा अलग है और उनका राजनीतिक नजरिया अलग है. ऐसे में सवाल भी उठ रहे हैं कि कांग्रेस के सियासी आंगन में दोनों भाई कैसे साथ आएंगे, क्योंकि राहुल गांधी इन दिनों उसी विचाराधारा के खिलाफ झंडा उठाए हैं, जिसके छांव में वरुण गांधी की सियासत फली-फूली और आगे बढ़ी है. ऐसे में यह सवाल है कि राहुल गांधी और वरुण गांधी की सियासत किस तरह की रही है और दोनों ही नेता मौजूदा दौर में कहां खड़े हैं?
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को हुआ था, जबकि छोटे पुत्र संजय गांधी के बेटे वरुण गांधी का जन्म 13 मार्च 1980 को हुआ था. इस तरह से राहुल गांधी और वरुण गांधी रिश्ते में चचेरे भाई हैं, लेकिन दोनों ही नेताओं की सियासी राहें एक दूसरे से जुदा रही हैं. राहुल गांधी और वरुण गांधी की राजनीतिक पार्टी ही अलग-अलग नहीं रहीं, बल्कि विचारधारा और सियासत करने का अंदाज भी एक-दूसरे से भिन्न रहा है.
बचपन
दरअसल, वरुण गांधी महज तीन महीन के थे, जब उनके पिता संजय गांधी का विमान हादसे में निधन हो गया था. संजय गांधी के निधन के बाद मेनका गांधी ने अपनी सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का घर छोड़ा था तो उस समय वरुण गांधी की उम्र महज दो साल की थी. वरुण जब चार साल के हुए तो उनकी दादी इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई. छोटी सी उम्र में अपने पिता और दादी को खो देना वरुण की जिंदगी का सबसे बुरा दौर था. वरुण का लालन-पालन उनकी मां मेनका गांधी ने किया. इस तरह से वह बचपन में परिवार के प्यार से पूरी तरह महरूम रहे थे.
वहीं, राहुल गांधी पूर्व पीएम राजीव गांधी और सोनिया गांधी की पहली संतान हैं. उनका जन्म 19 जून 1970 को नई दिल्ली के होली फैमली हॉस्पिटल में हुआ. राहुल अपने पिता और अपनी दादी के बेहद करीब थे, लेकिन उनका बचपन सुरक्षा के घेरे में गुजरा है. 14 साल की उम्र में राहुल ने दादी इंदिरा गांधी को खोया तो 21 के उम्र में अपने पिता राजीव गांधी को भी खो दिया था. 21 मई 1991 को एक चुनावी सभा में राजीव गांधी की हत्या हो गई थी.
शिक्षा
वरुण गांधी की शुरुआती पढ़ाई ऋषि वैली स्कूल, मॉर्डन स्कूल और ब्रिटिश स्कूल से हुई. यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से वरुण गांधी ने अर्थशास्त्र में स्नातक किया. 20 साल की उम्र में साल 2000 में वरुण गांधी का पहला कविता संग्रह आया. इसके बाद 2015 में उनका दूसरा कविता संग्रह आया. साल 2018 में वरुण गांधी की भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी किताब लिखी है.
वहीं, राहुल गांधी ने शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल से की और फिर देहरादून के दून स्कूल गए, लेकिन उन्हें कुछ सुरक्षा कारणों के चलते फिर घर पर ही रहकर शिक्षा प्राप्त करनी पड़ी. 1989 में राहुल गांधी ने दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज में एडमिशन लिया, लेकिन यहां भी सुरक्षा कारणों से उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और आगे की शिक्षा के लिए राहुल ने यूएस की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया, लेकिन उसके एक साल बाद 1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई. ऐसे में उन्हें वहीं भी पढ़ाई छोड़नी पड़ी और बाद में उन्होंने फ्लोरिडा के रोलिन्स कॉलेज में दाखिला लिया और 1994 में स्नातक की परीक्षा दी. इसके बाद 1995 में राहुल गांधी ने ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एमफिल किया.
सियासत
राहुल गांधी और वरुण गांधी ने अपनी-अपनी सियासी पारी एक ही समय में शुरू की. वरुण गांधी ने पढ़ाई के बाद राजनीति में आने का फैसला किया और अपनी मां मेनका गांधी की छांव में अपनी सियासत शुरू की. 1998 के लोकसभा चुनाव के बाद मेनका गांधी ने बीजेपी का दामन थामा था, उससे पहले तक जनता दल और निर्दलीय चुनी जाती रही हैं. ऐसे में 1999 के चुनाव में वरुण गांधी ने अपनी मां मेनका गांधी के लिए चुनाव प्रचार किया और 2004 में बीजेपी की सदस्यता ले ली. 2009 के आम चुनावों में वरुण ने पहली बार पीलीभीत से चुनाव लड़ा और सांसद बने. 2013 में उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव चुना गया और वह पार्टी के इतिहास में सबसे युवा महासचिव बने थे.
साल 2013 में वरुण गांधी को पश्चिम बंगाल बीजेपी का प्रभारी बनाया गया. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनावों में वरुण गांधी ने सुल्तानपुर से जीत दर्ज की और 2019 के चुनाव में एक बार फिर पीलीभीत से सांसद चुने गए, लेकिन एक बार भी मंत्री नहीं बन सके हैं. फायर ब्रांड नेता के तौर पर बीजेपी में कुछ समय तक वरुण गांधी तेजी से उभरे. 2017 यूपी के विधानसभा चुनावों से पहले मुख्यमंत्री पद के लिए भी वरुण गांधी ने जोर-आजमाइश की थी, लेकिन सत्ता की कमान योगी आदित्यनाथ को मिली. इसके बाद से बीजेपी से सांसद हैं, लेकिन मन नहीं लगा रहा.
वहीं, राहुल गांधी ने 2004 में देश की सियासत में कदम रखा और पुश्तैनी अमेठी लोकसभा सीट से पहला चुनाव लड़ा और जीतकर संसद पहुंचे. उस समय राहुल गांधी की उम्र 34 साल थी. इसके बाद 2009 और 2014 में अमेठी सीट से सांसद चुने गए, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में अमेठी और केरल की वायनाड सीट से किस्मत आजमाई. राहुल गांधी अमेठी में बीजेपी की स्मृति ईरानी से चुनाव हार गए, लेकिन वायनाड से जीतने में सफल रहे.
राहुल गांधी 2007 में कांग्रेस महासचिव नियुक्त किए गए तो उन्होंने पार्टी को जमीनी स्तर पर फिर से सक्रिय करने और पार्टी के सहयोगी संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र पर जोर दिया. राहुल गांधी साल 2013 में कांग्रेस उपाध्यक्ष बने और 2017 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. राहुल गांधी की अगुवाई में साल 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा गया, लेकिन पार्टी को सत्ता में नहीं ला सके. ऐसे में राहुल गांधी ने कांग्रेस की कमान छोड़ी थी जबकि पार्टी ने उन्हें मनाने की तमाम कोशिश कीं. इसके बाद भी राहुल अपने फैसले पर अढ़े रहे.
विचाराधारा
वरुण गांधी और राहुल गांधी चचेरे भाई हैं, लेकिन दोनों ही नेताओं की विचारधारा और भाषा शैली में गहरा अंतर है. राहुल गांधी जहां कांग्रेस की विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं जबकि वरुण गांधी बीजेपी के हिंदुत्व की विचारधारा के साथ रहे और वो अपने विवादित बयानों को लेकर भी सुर्खियां बटोरते रहे हैं. 2009 में बीजेपी ने वरुण गांधी को पीलीभीत से लोकसभा का टिकट दिया था तो उस समय ही उन्होंने कहा था, 'अगर कोई हिंदुओं की ओर हाथ बढ़ाता है या फिर ये सोचता हो कि हिंदू नेतृत्वविहीन हैं, तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूं कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा.'
वरुण गांधी ने महात्मा गांधी की एक विश्व प्रसिद्ध अहिंसावादी टिप्पणी को भी गलत करार दिया था. उन्होंने कहा था, "मैं इसे बेवकूफीपूर्ण मानता हूं कि कोई अगर आपके गाल पर एक चांटा मारे तो आप दूसरा गाल आगे कर दें. उसके हाथ काट दो ताकि वो किसी दूसरे पर भी हाथ न उठा सके.' इतना ही नहीं वरुण मुस्लिम नामों की हंसी उड़ाते और लादेन को पकड़ने का दावा करते भी नज़र आए थे. इन बयानों के चलते वरुण को जेल भी जाना पड़ा था, लेकिन बाद में अदालत से बरी हो गए थे. हालांकि, वह एक कट्टर हिंदू नेता की छवि बनाने में जरूर कामयाब हो गए थे. इतना ही नहीं बीजेपी में रहते हुए वरुण गांधी पर आरएसएस की विचाराधारा का भी प्रभाव रहा है.
हालांकि, वरुण गांधी ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि वह न तो कांग्रेस के विरोधी हैं और न ही पंडित जवाहर लाल नेहरू की विचाराधारा के खिलाफ हैं. राजनीति का मकसद सेवा करना है और हम भाई के खिलाफ भाई को लड़ने के खिलाफ हैं. इस बयान के बाद ही वरुण गांधी के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा तेज हो गई थी, क्योंकि उनके विचारों में बदलाव साफ दिख रहा था.
वहीं, राहुल गांधी कांग्रेस की विचाराधारा को लेकर चल रहे हैं और नेहरू-गांधी की नीतियों से प्रभावित हैं. आरएसएस की विचाराधारा के मुख्य विरोधी हैं. राहुल गांधी सर्वधर्म समभाव की बात करते हैं और संघ की हिंदुत्व की सियासत को लेकर इन दिनों आक्रामक हैं. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि मैं वरुण को गले लगा सकता हूं लेकिन उनकी विचारधारा को स्वीकार नहीं कर सकता. मैं आरएसएस दफ्तर कभी नहीं जा सकता, चाहे मेरा सिर काट दिया जाए. वरुण ने एक अलग विचारधारा को अपनाया है और मैं उनकी विचारधारा को कैसे स्वीकार कर सकता हूं.
सामाजिक मुद्दों पर वरुण गांधी और राहुल गांधी भले ही अलग-अलग विचाराधारा से जुड़े रहे हों, लेकिन किसानों के मुद्दे पर एक मत नजर आते हैं. वरुण गांधी ने भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए खुले तौर पर जन लोकपाल बिल का समर्थन किया था. अन्ना हजारे को उनकी भूख हड़ताल के लिए अपना सरकारी आवास देने की बात भी कही थी. वरुण गांधी नेता होने के साथ ही लेखक एवं स्तंभकार भी हैं, किसानों से जुड़े तमाम मुद्दों पर अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं. वह चाहे किसान आंदोलन रहा हो या फिर गन्ना किसानों के भुगतान का मामला.
वहीं, राहुल गांधी भी शुरू से किसानों की लड़ाई लड़ रहे हैं और उनके हक में आवाज उठा रहे हैं. भट्टा परसौल में किसानों के भूमि अधिग्रहण का मामला रहा हो या फिर ओडिशा में वेदांता को जमीन देने का मुद्दा रहा हो. मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही भूमि अधिग्रहण के लिए अध्यादेश लाया था, तब राहुल गांधी सड़क पर उतर गए थे. इसके बाद मोदी सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा था. इसके अलावा मंदसौर में किसान आंदोलन के दौरान गोली चलाई गई थी तब भी राहुल पहुंचे थे. किसानों की जब-जब बात आई है, राहुल गांधी किसानों के साथ खड़े नजर आए हैं. इस तरह से किसानों के मुद्दे पर राहुल और वरुण एक साथ दिखे हैं.